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गद्य को बुलंदी पर पहुंचाने का संघर्ष जारी: डॉ हरिओम

राज्‍य कर्मचारी साहित्‍य संस्‍थान आगामी 15 मार्च को करेगा विशाल सम्‍मान कार्यक्रम

लखनऊ. राजधानी में शनिवार को राज्‍य कर्मचारी साहित्‍य संस्‍थान द्वारा एक दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया. जिसमें ‘21 वीं सदी में कहानी’ और ‘आज के संकट और हिंदी’ विषयों पर अन्‍य प्रदेशों से आए कहानीकारों ने अपने विचार प्रस्‍तुत किए. इस आयोजन पर प्रकाश डालते हुए संस्‍थान के अध्‍यक्ष आईएएस डॉ. हरिओम ने बताया कि इस आयोजन का मकसद 21 वीं सदी में कविताओं के साथ-साथ गद्य की विधाओं खासकर ‘कहानी’ को राष्‍ट्रीय स्‍तर के मंच पर हाईलाइट करना है. इस आयोजन के माध्‍यम से हमारा प्रयास है कि इसमें कथा-लेखन और समीक्षक क्षेत्र के बड़े नाम सम्मिलित हों और गद्य की विधाओं को बुलंदी तक पहुंचाने में योगदान दें. उन्‍होंने इस मौके पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि कहानीकार की कथनी-करनी समान होनी चाहिए. तभी सच समझने के बाद आवाज में बुलंदी पैदा होती है. लिखना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण यह है कि उससे कौन लोग प्रभावित हो रहे हैं, किसे लाभ हो रहा और समाज को बदलने में उसका कितना महत्व है. उन्होंने सभी साहित्यकारों का परिचय देते हुए सबका स्वागत किया.  इस आयोजन के दौरान योगेन्‍द्र आहूजा, अरुण होता, प्रियदर्शन मालवीय, कैलाश बनवासी, विभव शुक्‍ला, बजरंग बिहारी तिवारी, विनोद तिवारी, किरन सिंह, मनोज पांडेय, प्रियम अंकित समेत अन्‍य वक्‍ताओं ने अपने विचार साझा किए. इस कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथिगणों द्वारा माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ. प्रथम सत्र की अध्यक्षता वरिष्‍ठ साहित्यकार शिवमूर्ति एवं संचालन प्रेमशंकर (आगरा) द्वारा किया गया. वहीं द्वितीय सत्र की अध्यक्षता वरिष्‍ठ कहानीकार अल्पना मिश्र (दिल्ली) ने की और संचालन ब्रजराज सिंह (आगरा) द्वारा किया गया.

साहित्‍यकारों ने कहा- बढ़ा है कहानी का पैनापन 

इस मौके पर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार शिवमूर्ति ने कहा कि झूठ सच को आंख दिखा रहा है इसलिए कहानी ने भी अपनी शैली, सामर्थ्‍य और पैनापन बढ़ाया है. आज के युवा कथाकार इस चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और उल्लेखनीय कहानियों का सृजन कर रहे हैं.

वहीं आगरा से आए वरिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रेमशंकर ने बताया कि 21वीं सदी की कहानी को पिछली सदी की सर्वश्रेष्‍ठ उपलब्धियों की परंपरा से आत्मसात करना है. इसके साथ ही बीसवीं सदी के आखिरी दशक में भारतीय समाज में भूमंडलीकरण द्वारा पैदा की गई चुनौतियों का रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना है. बाजार ने हमारे मानसिक जगत को जकड़ लिया है. रचना और कहानी का क्षेत्र इस जकड़न को तोड़ सकने में समर्थ है.

छत्‍तीसगढ़ रायपुर से आए वरिष्‍ठ साहित्‍यकार कैलाश वनवासी ने बताया कि आज कहानियों में अपने समय के इन बदलावों, अंतर्विरोधों, विडंबनाओं, षडयंत्रों और बर्बरताओं को निडरतापूर्वक  दर्ज कर पाना वाकई किसी चुनौती से कम नहीं है. अब अनुभववाद या यथार्थ को अपनी भाषा में सरलता से प्रस्तुत कर देने की शैली नाकाफ़ी हो चली है. कथाकारों को चीजों को अब अधिक गहराई, ज्यादा निश्‍छलता और संपूर्णता के साथ देखना होगा. कहानी महज चंद बातें बताकर  समाप्त न हो जाए. वह पाठक के भीतर किसी शूल सा धंसे,  उनमें तेज़ाबी बेचैनी पैदा करे और यथास्थिति के खिलाफ एक ठोस आक्रोश जगाए.

राज्‍य कर्मचारी साहित्‍य संस्‍थान के महामंत्री दिनेश चंद्र अवस्‍थी ने बताया कि जयशंकर प्रसाद पुरस्‍कार के अंतर्गत आगामी 15 मार्च को हिंदी संस्‍थान के यशपाल सभागार में 24 राज्‍य कर्मचारियों का सम्‍मान होगा। इसके अलावा 21 हजार रुपये और 11 हजार रुपये की सम्‍मान राशि का एक-एक पुरस्‍कार व 5100 की सम्‍मान राशि के कुछ पुरस्‍कारों का भी वितरण किया जाएगा।

राज्‍य कर्मचारी साहित्‍य संस्‍थान के अध्‍यक्ष आईएएस डॉ. हरिओम ने इस कार्यक्रम में पधारे लगभग 80 अतिथियों, साहित्यकारों, श्रोताओं एवं उपस्थित महानुभावों को आभार एवं धन्यवाद व्यक्त किया.

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