विचार मित्र

दुर्व्यवस्था के कलंक, छुपाने की नहीं, मिटाने की ज़रुरत ?

तनवीर जाफ़री

गत वर्ष सितम्बर माह में अमरीका के ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ नामक एक आयोजन को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने भी पीएम मोदी के साथ मंच साझा किया था। ‘हाउडी मोदी’ के दौरान ही प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रम्प को भारत आने का न्यौता दिया था। उसी निमंत्रण को स्वीकार करते हुए राष्ट्रपति ट्रम्प 24 और 25 फ़रवरी को अपनी पत्नी मेलानिया ट्रम्प के साथ अपने दो दिवसीय भारत दौरे पर पधार रहे हैं। अहमदाबाद में ‘हाउडी मोदी’ की तर्ज़ पर ही ‘केम छो ट्रम्प’ कार्यक्रम में उनका स्वागत व संबोधन होगा। अपनी इस भारत यात्रा के दौरान राष्ट्रपति ट्रम्प व प्रधानमंत्री मोदी 24 फ़रवरी को अहमदाबाद पहुंचेंगे। यहां दोनों नेताओं द्वारा एक रोड शो किया जाना प्रस्तावित है। कार्यक्रम के अनुसार अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से इंदिरा ब्रिज की ओर से इन नेताओं का क़ाफ़िला गुज़रेगा। इस मार्ग के किनारे अहमदाबाद एअरपोर्ट से हासोल सर्कल के बीच झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले ग़रीब लोग भी रहते हैं। इन झुग्गियों के ‘दर्शन’ मुख्य मार्ग से भी किये जा सकते हैं। कहा जा सकता है कि दशकों से अहमदाबाद के इस अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के मुख्य मार्ग पर बनी यह झुग्गी झोपड़ी बस्ती ‘वाइब्रेंट गुजरात’ तथा विकास के गुजरात मॉडल को बेनक़ाब कर रही हैं। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री मोदी व गुजरात सरकार यह नहीं चाहते कि तथाकथित ‘विकसित गुजरात’ और ‘वाइब्रेंट गुजरात’ के नाम पर एक ‘बदनुमा दाग़’ सी नज़र आने वाली ग़रीबों की झुग्गी झोपड़ियों पर अति विशिष्ट अतिथियों की नज़र पड़े। इसीलिए झुग्गीवासियों के लिए स्थाई मकान बनाने या कोई अस्थाई व आकर्षक दिखाई देने वाला कोई वैकल्पिक प्रबंध करने के बजाए ऐसे अवसरों पर इस झुग्गी बस्ती को छुपाने का प्रबंध किया जाता रहा है। अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से हासोल सर्कल के किनारे लगभग आधा किलोमीटर लम्बी एक पक्की दीवार बना रही है। दीवार बन जाने से ट्रम्प के क़ाफ़िले में शामिल लोग इन इलाक़ों में पड़ने वाले ग़रीब लोगों को व उनकी झोपड़ी और कच्चे मकान नहीं देख सकेंगे। इन झुग्गियों में तक़रीबन दो हज़ार लोग रहते हैं। करोड़ों रूपये की लागत से बनने वाली यह विशाल दीवार झुग्गियों को समाप्त तो नहीं कर सकेगी परन्तु विशिष्ट अतिथियों की नज़रों से झुग्गियां दूर ज़रूर हो जाएंगी । इस ग़ैर ज़रूरी निर्माण के बाद एक बार फिर यह सवाल किया जाने लगा है कि जितनी लागत से यह अस्थाई दीवार बनाई जा रही है उन्हीं पैसों से क्या झुग्गी वासियों के लिए आवास की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं की जा सकती थी ? इसके पहले भी जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, चीन के शी जिनपिंग और इज़रायल के नेतेन्याहू अहमदाबाद आए थे तब भी बार बार हरे रंग के पर्दे से इन्हीं झुग्गियों को छुपाया जाता रहा है। ग़रीब झुग्गीवासी बार बार इस तरह अपना अपमान होते देख बेहद दुखी व आक्रोशित हैं।
दरअसल दुर्व्यवस्था के कलंक को छुपाने की हमारी ‘परम्परा’ बहुत पुरानी है। स्वदेशी मेहमानों से लेकर विदेशी मेहमानों तक को गुमराह करने या सीधे शब्दों में कहें तो बेवक़ूफ़ बनाने में हमें पूरी महारत हासिल है। हमारे देश में किसी ऐसी समस्या का स्थाई हल ढूढ़ने के बजाए अस्थाई समाधान निकालने पर ज़्यादा भरोसा किया जाता है। अहमदाबाद में झुग्गी झोपड़ी बस्ती को दीवार से छुपाने का प्रयोग भी कोई नया नहीं है।याद कीजिये 2010 में 3 से 14 अक्टूबर के मध्य दिल्ली में आयोजित हुए कॉमन वेल्थ देशों के खेल के दौरान भी दिल्ली में भी ‘गोबर को चांदी के वर्क़ से ढकने’ के इसी तरह के कई समाचार सामने आए थे। उस समय भी अपने अधूरे विकास कार्यों को छुपाने के लिए या गन्दगी ढकने की ख़ातिर या नज़रों को खटकने वाली चीज़ों को छुपाने के लिए दिल्ली में मुख्य मार्गों पर बड़े पैमाने पर रंग बिरंगे आकर्षक फ़्लेक्स लगाए गए थे। गोया उस समय भी अपने ऐब या नाकामियों को छुपाने की ऐसी ही कोशिश की गयी थी जिसकी मीडिया ने भी तीब्र आलोचना की थी। आज जो टी वी न्यूज़ चैनल राष्ट्रपति ट्रम्प के ‘सम्मान’ में अहमदाबाद में झुग्गियों को छुपाने हेतु बनने वाली दीवार की ख़बरें दिखाने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं 2010 में यही टी वी चैनल कॉमन वेल्थ देशों के खेल के दौरान गाला फाड़ फाड़ कर इसे कांग्रेस की नाकामी बता रहे थे। इतना ही नहीं बल्कि यह चैनल अपने कैमरों से फ़्लेक्स के पीछे भी झांक झांक कर छुपाए जाने वाले दृश्य भी ख़ूब दिखा रहे थे।
ज़रा ग़ौर कीजिये की जब कभी सौभाग्यवश आप के शहर,गांव या क़स्बे में मुख्यमंत्री महोदय का आगमन हो जाए उस समय मुख्यमंत्री महोदय के आने से पूर्व उस पूरे क्षेत्र का विशेषकर जिधर जिधर से माननीय मुख्यमंत्री महोदय के क़ाफ़िले को गुज़रना है उस पूरे रास्ते का काया कल्प हो जाता है। दस बीस वर्षों से सड़कों के जो गड्ढे ठीक नहीं हुए वह भी भर दिए जाते हैं। उस क्षेत्र में बिजली पानी की आपूर्ति माननीय मुख्यमंत्री महोदय के क्षेत्र में रहने तक सुचारु रूप से बनी रहती है। सड़कों पर चूना व दवाइयां छिड़की जाती हैं। सड़कों को ऐसा साफ़ सुथरा व चमका दिया जाता है मानो यह सड़क कभी गड्ढेदार व कूड़ा करकट से पटी थी ही नहीं। यह सब भी सरकारी कर्मचारियों द्वारा इसी लिए किया जाता है ताकि अतिथि महोदय यह देख सकें कि उनके शासन में सब कुछ ‘ठीक ठाक’ है। अपने विशिष्ट अतिथियों को मूर्ख बनाने की इसी परम्परा का नतीजा है कि हमारी लगभग पूरी की पूरी शासन व्यवस्था दुर्व्यवस्था के कलंक को छुपाने में पूरी महारत रखती है। ‘ढोल में पोल’ रखने वाली इस अस्थाई व्यवस्था को अपने ‘अतिथि के स्वागत की तैयारियां’ का नाम दिया जाता है। क्या देश की आम जनता को रोज़मर्रा की जिंदिगी में इसी प्रकार के साफ़ सुथरे वातावरण में जीने का हक़ नहीं? क्या आम लोग इस तरह के चमचमाते माहौल में रहने के इच्छुक नहीं ? प्रत्येक अतिथि को उस भारत की असली तस्वीर देखनी चाहिए जो गांव,मोहल्लों और क़स्बों तथा झुग्गियों में रहता है। ग़रीबी दूर करने से लेकर बेघरों को पक्के मकान देने व शहरों,मुहल्लों व क़स्बों की सड़कों, गलियों व नाली नालों की सफ़ाई की समुचित व चाक चौबंद व्यवस्था होनी चाहिए। दुर्व्यवस्था के इन इन कलंकों को छुपाने की नहीं, बल्कि मिटाने की ज़रुरत है।

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