विचार मित्र

सोशल मीडियाः अश्लील विज्ञापनों से सावधान

योगेश सोनी
मौजूदा दौर के हर इंसान की जिन्दगी का अहम हिस्सा बन चुका है सोशल मीडिया। हालत यह है कि इंसान एक समय की रोटी खाये बिना रह सकता है लेकिन मोबाइल के बिना अपने को अधूरा महसूस करता है।

बदलते परिवेश में इसके तमाम तरह के फायदे हैं लेकिन कई बार यह जिंदगी के लिए खतरा भी बन गया। इसकी चपेट में सबसे ज्यादा स्कूल व कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे आ रहे हैं। यदि फेसबुक के विषय में बताएं तो सबसे ज्यादा यूजर्स इस आयुवर्ग के हैं। फेसबुक पर कम आयु के बच्चों के भी अकाउंट देखने मिलते हैं। हालांकि फेसबुक पर अकाउंट बनाने के लिए 18 वर्ष की अनिवार्यता है लेकिन गलत वर्ष डालकर इसका प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है। इस विषय में किसी भी प्रकार की जांच पड़ताल का नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है।
दरअसल, आजकल सोशल मीडिया पर कई तरीके के अश्लील विज्ञापन आने लगे हैं, जिनमें बेहद गंदी भाषा का प्रयोग कर स्लोगन दिये जा रहा हैं। बच्चों पर इन विज्ञापनों और उनकी भाषा का बेहद गंभीर असर पड़ रहा है। कुछ बच्चे तो माता-पिता से इस विषय में बात कर लेते हैं लेकिन कुछ नहीं कर पाते। दोनों ही स्थिति में इस तरह की बातें जानने के लिए बच्चों में जिज्ञासा बढ़ जाती है। देसी भाषा में कहा जाता है- ‘यह उम्र कच्ची मिट्टी की तरह होती है, जैसे ढालो वैसी बन जाती है।’ सोशल मीडिया की वजह से न जाने कितने बच्चों की जिंदगी खराब हो रही है। महानगरों में इसकी संख्या में लगातार इजाफा होना चिंता का विषय है। इसका मुख्य कारण यह है कि माता-पिता दोनों ही अपनी व्यस्तता का हवाला देकर बच्चों को मोबाइल दे देते हैं। यदि कुछ अभिभावक मोबाइल न दें तो बच्चे अपना होमवर्क व अन्य महत्वपूर्ण चीजों का हवाला देकर उनसे मोबाइल ले लेते हैं। ऐसे में वह संबंधित जरूरी काम कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा लगे रहते हैं। आजकल स्कूल व कॉलेजों में होमवर्क या असाइनमेंट मेल या व्हाट्सएप पर आते हैं तो स्मार्टफोन की अनिवार्यता बढ़ गई है।
कई घटनाओं में देखा गया है कि दोस्ती के नए-नए एपों पर दोस्ती कर बच्चे अपनी जिंदगी खराब कर रहे हैं। ऐसी खबरें रोजाना देखने को मिल रही हैं। लेकिन अब अत्यंत घटिया भाषा वाले ऐसे विज्ञापनों की बाढ़, बेहद चिंताजनक है। लालच के चक्कर में सोशल माध्यम ऐसे एपों का विज्ञापन देकर बेहद गलत कर रहे हैं। हिन्दुस्तान जैसे देश जो आज भी संस्कारों व संस्कृतियों के लिए जाना जाता है, यहां ऐसा करना अपराध के समान है। इसपर सुझाव यही है कि सरकार व एजेंसियों को कोई ठोस कदम उठाना चाहिए। किसी भी सोशल माध्यम पर हर 2-3 पोस्ट के बाद अश्लील विज्ञापनों से पश्चिमी देशों की उन्मुक्तता के रंग में रंगने का खतरा है। हमारे देश में सबसे ज्यादा सोशल मीडिया पर विद्यार्थी हैं इसलिए यह सबसे ज्यादा प्रभावित भी इसी वर्ग को करता है।

एक अध्ययन के अनुसार सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल याददाश्त कमजोर करता है और मस्तिष्तक में कुछ भी सुरक्षित नहीं रह पाता। मानसिक चिकित्सकों के अनुसार खाली समय में मस्तिष्क जानकारियों को सुरक्षित करने का काम करता है। लेकिन फ्री समय में ऑनलाइन गतिविधियों के संपर्क की वजह से मस्तिष्क को आराम नहीं मिलता। लोग हर वक्त फोन रखते हैं और बार-बार नोटिफिकेशन की वजह से मोबाइल उठाकर देखा जाना भी मस्तिष्क के लिए खतरनाक है।
बहरहाल, मौजूदा दौर में बच्चों का विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। तकनीकी दुनिया में इन चीजों से चाहे-अनचाहे वास्ता तो पड़ेगा ही लेकिन यहां माता-पिता की सतर्कता बेहद जरूरी है।

खेल स्पष्ट है, यह हमारे हाथ में है कि हम किसी भी चीज से फायदा लेना चाहते हैं या नुकसान। यदि हम अपनी व अपनों की सुरक्षा का जिम्मा स्वयं ले लेगें तो निश्चित तौर इससे होने वाले खतरों को बेअसर किया जा सकता है।

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