विचार मित्र

शाहीन बाग कोई रास्ता तो निकलना ही चाहिए!

राजेश माहेश्वरी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय वार्ताकार शाहीन बाग का गतिरोध खत्म करने में सफल होते नहीं दिख रहे हैं। वो अलग बात है कि अभी दोनों पक्षों की एक ही मुलाकात हुई है। अमूमन बातचीत से मसले हल करने में थोड़ा वक्त लग जाता है। लेकिन जिस तरह का व्यवहार शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी कर रहे हैं, उससे इस बात की उम्मीद कम ही है कि बातचीत से ये मसला हल हो पाएगा। असल में शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी एक सोची-समझी रणनीति के तहत धरने पर बैठे हैं।
इस सारे प्रदर्शन के पीछे एक लाॅबी काम कर रही है। इसी लाॅबी का एक हिस्सा सोशल मीडिया के माध्यम से नागरिकता कानून को लेकर एक खास समुदाय के लोगों के दिलों में खौफ, भ्रम पैदा कर रहा है। और उन्हें गुमराह कर रहा है, जो बेहद शर्मनाक है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कानूनमंत्री सहित कई केंद्रीय मंत्री सार्वजनिक मंचों से ऐलान कर चुके हैं कि नागरिकता कानून किसी को नागरिकता देने का कानून है।
ये कानून किसी की नागरिकता लेता नहीं है। बावजूद इसके इस कानून को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। इस कानून को कई दूसरे कानूनों से जोड़कर एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है केंद्र सरकार मुस्लिम विरोधी है।

शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी दो महीने से मुख्य सड़क घेरकर करके बैठे हैं। रास्ता बंद होने से प्रतिदिन उस रास्ते से गुजरने वाले लाखों लोगों को परेशानी हो रही है। ऐसे में सवाल यह है कि संविधान ने सभी नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन का अधिकार दिया है, लेकिन किसी को भी रास्ता बंद करने का अधिकार नहीं है। इस मौलिक अधिकार के लिए कोई भी, कहीं भी, रास्ता रोक कर बैठ नहीं सकता। यदि ऐसे ही जारी रहा तो पूरा शहर ही एक दिन बंद हो जाएगा। यदि सड़क बंद कर देंगे तो ऐसा कैसे चलेगा? तो क्या उसे जारी रहने दें? इससे अराजकता फैल जाएगी। यदि शाहीन बाग में धरना-प्रदर्शन चलता रहा तो कल कोई भी नेशनल हाई-वे पर जाकर बैठ सकता है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शाहीन बाग से करीब 10 लाख लोग प्रभावित हो रहे हैं। करीब 70 हजार वाहन हर रोज कालिंदी कुंज रोड से गुजरते हैं। यही सड़क नोएडा और फरीदाबाद (हरियाणा) से जोड़ती है और इसी पर धरना-प्रदर्शन, पुलिस के बैरिकेड्स मौजूद हैं। इसी मुद्दे पर याचिका सर्वोच्च अदालत में दी गई थी। 15 दिसंबर, जिस दिन से ये प्रदर्शन शुरू हुआ है, उस दिन से ही कालिंदी कुंज ब्रिज और शाहीन बाग के बीच की सड़क को दिल्ली पुलिस ने बंद कर दिया है।
ओखला बर्ड सेंचुरी, मेट्रो स्टेशन के राउंडअबाउट पर, कालिंदी कुंज ब्रिज, आम्रपाली रोड, जीडी बिरला मार्ग, विश्वजी सड़क और अपोलो अस्पताल के पास बैरिकेडिंग लगा दी गई है। इसका नतीजा ये हुआ है कि अपोलो अस्पताल से नोएडा, फरीदाबाद से नोएडा और नोएडा से सरिता विहार जाने वालों को डायवर्जन से होकर गुजरना पड़ रहा है। डीएनडी फ्लाईवे, मथुरा रोड, अक्षरधाम रोड आने जाने वालों के लिए वैकल्पिक मार्ग बन गए हैं, जो सुबह-शाम में पीक आवर के दौरान खचाखच भर जाते हैं और जाम की स्थिति पैदा हो जाती है।

फरीदाबाद और नोएडा को जोड़ने वाली बसों को भी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. वह शाहीन बाग से होकर नहीं गुजर पा रही हैं। ओखला बर्ड सेंचुरी पर भारी भीड़ देखी जा सकती है, क्योंकि शाही बाग की वजह से बंद रोड से बचने के लिए बहुत से लोग मेट्रो का सहारा ले रहे हैं. बहुत से लोगों ने कहा है कि वह रोज इतनी लंबी दूरी तय कर-कर के और पैसे खर्चते-खर्चते थक चुके हैं. दिल्ली पुलिस का मानना है कि आश्रम वाली रोड बंद होने से सबसे अधिक दिक्कत हो रही है, जहां से पीक आवर्स में रोजाना करीब 3.5 लाख गाड़ियां गुजरती हैं।
लोकतंत्र में विचारों की अभिव्यक्ति, विरोध प्रकट करने और मौलिक अधिकारों की भी लक्ष्मण-रेखाएं हैं। आप अपने अधिकार के लिए दूसरों के अधिकारों का हनन या अतिक्रमण नहीं कर सकते। विरोध-प्रदर्शन उसी जगह करें, जो सरकार और प्रशासन ने इसके लिए चिह्नित की है। यह शाहीन बाग धरने पर सर्वोच्च न्यायालय के कथनों का सारांश भाव है।

बहरहाल शीर्ष अदालत ने एक प्रयोग किया था कि मध्यस्थता से यह गतिरोध समाप्त किया जाए, लेकिन अदालत को यह भी कहना पड़ा है कि यदि बातचीत मध्यस्थता नाकाम रहती है, तो फिर प्रशासन अपना काम करे। यह असमंजस और अनिर्णय की स्थिति है। सर्वोच्च न्यायालय ने 10 फरवरी की सुनवाई में केंद्र और दिल्ली सरकारों तथा दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजे थे।
दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से हलफनामा भी मांगा गया है। यह कानूनी काम की प्रक्रियाएं हो सकती हैं, लेकिन शाहीन बाग इतना सामान्य और आसान मामला नहीं है। धरने वालों की एक ही मांग है कि सरकार ‘काला कानून’ वापस ले, लेकिन वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कह दिया है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) किसी भी सूरत में वापस नहीं लिया जाएगा। स्पष्ट है कि सरकार और शाहीन बाग के दरमियान टकराव के कारण अब भी मौजूद हैं।

देश से जुड़े मसले पर अगर कोई विरोध या गतिरोध हो तो मध्यस्थता से रास्ता निकालना चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि चंद सैकड़ा लोग यदि किसी भी सार्वजनिक स्थल पर डेरा जमाकर बैठ जाएं तो उन्हें बलपूर्वक हटाने की बजाय मध्यस्थ नियुक्त किये जाने का चलन बन जाएगा और उसके लिए सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था को आधार बनाया जाएगा।
सर्वोच्च अदालत ने कोई प्रत्यक्ष फैसला नहीं दिया है। दरअसल अदालत की चाह रही होगी कि उसे कोई आदेश न देना पड़े और प्रदर्शनकारी शाहीन बाग को खाली कर दें। यदि प्रशासन और पुलिस को अंततः प्रदर्शन करने वालों को खदेड़ना पड़ा, तो एक और नया टकराव पैदा हो जाएगा। नतीजतन राजनीतिक विष-वमन भी होगा। शाहीनबाग के प्रदर्शकारियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मध्यस्थ समझाने-बुझाने में नाकाम ही साबित हुए हैं। मोटे तौर पर देखा जाए तो शाहीन बाग का प्रदर्शन किसी कानून की बजाए मोदी सरकार के विरोध अधिक दिखाई देता है। प्रदर्शनकारी अगर मामला सुलझाना चाहते तो कोई डेलीगेशन वो बनाते, लेकिन अब तक कोई डेलीगेशन वो बना नहीं पाए हैं। पिछले दिनों इन प्रदर्शकारियों ने गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की बात मीडिया के माध्यम से सामने आई थी। बाद में इसका खंडन गृह मंत्रालय ने किया था। असल में बिना किसी प्रतिनिधि मंडल के बातचीत संभव ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मध्यस्थों को भी डेलीगेशन के अभाव मे वार्ता में परेशानी का सामना करना पड़ा। भीड़ से बात करके मुद्दे नहीं सुलझाए जा सकते, ये बात तय मानिए।

अभी शाहीन बाग का प्रदर्शन खत्म होता नहीं दिख रहा है. बल्कि हर गुजरते दिन के साथ ये प्रदर्शन और बड़ा ही होता जा रहा है। दरअसल धरने वालों ने यह मान लिया है कि अंततः मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी, जबकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। धरने वालों में 80-85 साल की बूढ़ी औरतें और 2-4 साल के बच्चे भी हैं। असल में धरने में शामिल ज्यादातर लोगों को कानून की जानकारी ही नहीं है। बस एक राग रटा हुआ है कि काला कानून वापस लो।
यह शब्दावलि अंग्रेजों की हुकूमत के दौरान की है। अब गणतंत्र भारत में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कानून ‘काला’ कैसे कहा जा सकता है? यह ज्ञान और विवेक प्रदर्शनकारियों में नहीं है। वार्ता से पूर्व सामाजिक कार्यकत्री शीतल सीतलवाड़ जिस तरह से प्रदर्शनकारी महिलाओ को समझा-बुझा रही थी वो भी सवाल खड़े करता है। वास्तव में शाहीन बाग के प्रदर्शकारी घोर सांप्रदायिक और दुराग्रही हो चुके हैं। अब चूंकि वार्ताकारों के समझाने बुझाने के बाद भी आन्दोलनकारी नहीं माने हैं तो इस हालत में अब सर्वोच्च न्यायालय के अगले आदेश पर सबकी नजरें टिकी हैं। आम दिल्लीवासियों के परेशानी को देखते हुए इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को कोई उचित व्यवस्था देनी चाहिए। आखिरकार ये गतिरोध समाप्त होना चाहिए।

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