विचार मित्र

राजनीति में दागी क्यों?

कुलिन्दर सिंह यादव
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, यहां पर चुनाव सुधारों की बात होना आम है। अभी हाल ही में विधि मंत्रालय के साथ भारतीय निर्वाचन आयोग ने लंबित बड़े सुधारों को लागू कराने को लेकर चर्चा की। चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों की ओर से गलत हलफनामा देने और चुनाव से जुड़ी फर्जी खबरों को अपराध की श्रेणी में रखने का प्रस्ताव दिया है। जिससे निर्वाचित होने के बाद दोषियों की सदस्यता समाप्त की जा सके। इसके साथ ही मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने का भी सुझाव दिया गया है और अब अंतिम निर्णय करना केंद्र सरकार के हाथ में है। यह पहली बार नहीं है जब भारत में चुनाव सुधारों की बात की गई हो। दशकों पूर्व किए गए चुनाव सुधार के अनुरोध आज भी केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है। जिससे स्पष्ट हो जाता है कि केंद्र सरकार चुनाव सुधारों के पक्ष में नहीं दिखती हैं।

आज समय की आवश्यकता है कि चुनावों में फर्जी मतदान को रोककर पारदर्शिता को बनाए रखा जाए। भारत में लाखों की संख्या में लोग ऐसे हैं जिनके नाम एक से अधिक मतदाता सूची में शामिल है। जिसके कारण वे एक से अधिक बार अलग-अलग क्षेत्रों में मतदान करते हैं। चुनाव आयोग ने इस समस्या से निजात पाने के लिए मतदाता पहचान पत्र से आधार को जोड़ने की बात की है। निश्चित तौर पर यदि मतदाता पहचान पत्र से आधार कार्ड को जोड़ा जाता है तो फर्जी मतदान पर अंकुश लगेगा। लेकिन आधार कार्ड से संबंधित निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसले को देखते हुए इसकी संभावना कम ही लगती है। अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को ही आधार से जोड़ने की स्वीकृति दी थी। हालांकि निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार आधार को मतदाता पहचान पत्र से लिंक करने पर एकमत हैं। विश्व आज तकनीकी के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग को फर्जी मतदान को रोकने के लिए अन्य तकनीकी विकल्पों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

मौजूदा समय के चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा गलत जानकारी देना भी एक ज्वलंत समस्या बन गया है। इसके लिए निश्चित तौर पर चुनाव आयोग के पास कुछ शक्तियां होनी चाहिए जिससे उस व्यक्ति विशेष का निर्वाचन निरस्त किया जा सके। जब भी इस तरह के मामले सुप्रीम कोर्ट में जाते हैं, तो न्याय में देरी के कारण उम्मीदवारों का निर्वाचन समय से निरस्त नहीं हो पाता है। समय की आवश्यकता है कि चुनाव आयोग को भी इस तरह की शक्तियां दी जाए। जिससे इस तरह के मामलों में समय रहते फैसला लिया जा सके। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2013 और 2015 में इस तरह के मामलों से निपटने के लिए कानून बनाया था। लेकिन जमीनी स्तर पर चुनाव आयोग द्वारा उनका क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं किया जा रहा है। मौजूदा समय के चुनाव में धन-बल का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। जिसमें सभी राजनैतिक पार्टियों की सहमति होती है। आज सभी राजनीतिक पार्टियां आपराधिक प्रवृति के लोगों को टिकट देने के साथ उनको संरक्षण भी दे रही हैं। यदि जनता ऐसे प्रत्याशियों को नकार भी देती है तो राजनीतिक पार्टियां पिछले दरवाजों से उनको राज्यसभा या विधान परिषद में बैठा देती हैं।

हमारे देश का यह दुर्भाग्य ही है कि आज अपराधिक प्रवृति के लोग संसद में बैठकर नीति निर्धारण में अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। ऐसे आपराधिक प्रवृति के लोगों से महिला सुरक्षा, अपराध नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषयों पर बेहतर कानूनों की आस रखना बेमानी होगा। फिर भी भारत की मासूम जनता इन अपराधिक प्रवृति के लोगों से उम्मीद लगाए बैठी है। आवश्यकता है कि अब जनता को स्वयं अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना होगा क्योंकि विगत सरकारों के समान मौजूदा केंद्र सरकार भी चुनाव सुधारों पर ज्यादा कुछ करने को तैयार नहीं है। मौजूदा समय में चुनाव सुधारों में यदि सबसे ज्यादा आवश्यकता किसी बात की है तो वह यह है कि अपराधिक प्रवृति के लोगों को पूर्णतया चुनाव लड़ने से रोका जाए। राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण के कारण ही स्वच्छ छवि के लोग अब राजनीति से दूरी बनाने लगे हैं।मौजूदा लोकसभा में यदि आपराधिक प्रवृत्तियों के सांसदों की उपस्थिति को देखें। तो स्पष्ट होता है कि अब सभी राजनैतिक पार्टियां भी अब अपराधियों की चरण वंदना करने लगी हैं।

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