विचार मित्र

हार पर इतनी खुश क्यों कांग्रेस

प्रो. एनके सिंह
केजरीवाल के हाथों भाजपा और कांग्रेस की कड़ी पराजय के बाद उस मफलर मैन को अजीब लग रहा है कि हमारी धारणा और विचार में कुछ गड़बड़ है। इस बार भाजपा को इस तरह की बड़ी पराजय की संभावना नहीं थी, लेकिन यह विषय अलग से जांचने योग्य है और मैंने पहले भी इस मुद्दे का उल्लेख किया था। भयावह स्थिति कांग्रेस की है जिससे शानदार प्रदर्शन की उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन यह संभावना भी नहीं थी कि वह शून्य पर ही रुक जाएगी। इस तरह की बड़ी पराजय पर आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया यह है कि उसके नेता भाजपा की हार पर बेहद खुश हैं, चाहे उनका अपना प्रदर्शन निराशाजनक ही क्यों न रहा हो।
यह नफरत का पारंपरिक मामला है जो वह भाजपा के प्रति रखते हैं। कांग्रेस के प्रमुख नेता पी. चिदंबरम आम आदमी पार्टी की जीत पर इस तरह खुश हो रहे हैं जैसे उन्होंने कोई बड़ा चमत्कार किया है। उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि उनकी अपनी पार्टी की बुरी तरह पराजय हुई है। एक पार्टी जिसने पूरे भारत पर शासन किया, उसके 63 प्रतिशत उम्मीदवारों की जमानत ही जब्त हो गई। शर्मिष्ठा मुखर्जी जैसी कनिष्ठ नेता को यह बताने के लिए आगे आना पड़ा कि पार्टी की शून्य उपलब्धि आप की जीत पर खुश होने से ज्यादा निराशाजनक है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के पास भी बोलने के लिए कुछ नहीं था।
हाल ही में सलमान खुर्शीद, जो कभी-कभी समझदारी से टिप्पणी करते हैं, ने कांग्रेस को फिर से याद दिलाया कि सभी दलों को गंभीरता से सर्वसम्मति विकसित करनी चाहिए और राष्ट्र हित के लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए, बजाय इसके कि वे अलग-अलग होकर चुनाव लड़ें। राहुल और सोनिया का भी प्रियंका ने सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व किया जो भाजपा को हुए नुकसान पर खुश हो रही हैं। अगर कांग्रेस ने इतनी बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तो उसे थोड़ी गंभीरता दिखानी चाहिए थी, लेकिन हर समय उसके उम्मीदवारों और नेताओं ने उदासीनता दिखाई। वे केवल अपने प्रतिद्वंद्वी के पतन का आनंद ले रहे थे। कांग्रेस को यह एहसास नहीं है कि ये उनके वोट हैं जो आप को खिसक गए हैं।
जैसा कि इतिहास रहा है, कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों पर भरोसा किया, अन्य वोटों की उसने परवाह नहीं की क्योंकि पार्टियों और जातियों ने ऐसा बिखराव साबित किया कि इसने मुस्लिम वोटों के बड़े हिस्से को कम नहीं किया। लेकिन उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि उनकी खुद की रणनीति की कमी के कारण मतदाता ने पुराने समूह के शीर्ष पर टिकने के बजाय आप में अधिक विश्वास दिखाया है। कांग्रेस ने रणनीति अपनाई कि सत्ता को हासिल करने के लिए उसने दूसरे या तीसरे नंबर का सहयोगी बनना स्वीकार कर लिया।
देश की सत्ता हासिल करने के लिए वह अपनी मासंपेशियों में माकूल ताकत के बिना ही सत्ता से चिपकी रहना चाहती है। उसने कर्नाटक में सबसे खराब रणनीति अपनाई जहां उसने अपने से कम विधायक होने के बावजूद कुमारस्वामी को समर्थन दे दिया और उनके साथ मिलकर सरकार बना ली।
लोकतांत्रिक बहुमत के सिद्धांत को फेंक दिया गया और परिणाम बाद में यह रहा कि कुछ ही समय में इस सरकार का पतन हो गया। फिर भी सरकार के गठन को महागठबंधन के जन्म के रूप में मनाया गया, एक नई आशा जो अंतत: विफल रही। कांग्रेस को सिद्धांतों पर एक पुरानी और सम्मानित पार्टी के रूप में खड़ा होना चाहिए। इसे अपने चार्टर और मूल्यों को फिर से परिभाषित करना चाहिए जो पार्टी के भविष्य को नियंत्रित करते हैं, लेकिन पार्टी इससे बच रही है।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ खुले रूप से सिंधिया के साथ भिड़ रहे हैं। राजस्थान में सचिन पायलट गहलोत से नाखुश हैं।
कैप्टन अमरिंदर सिंह को सिद्धू से बड़ी मुश्किल से छुटकारा मिल पाया है और कई अन्य राज्य मुश्किल में हैं। यहां तक कि हिमाचल जैसा एक छोटा राज्य भी पार्टी संभाल नहीं पा रही है और उसका प्रबंधन ठीक ढंग से नहीं किया जा रहा है। यह पार्टी का पुराना गढ़ रहा है, जो अब भाजपा के नियंत्रण में है। इस राज्य पर कांग्रेस का नियंत्रण स्थापित हो सकता है अगर ठीक ढंग से प्रबंध किया जाए। कोई भी यह नहीं समझ पा रहा है कि पार्टी अपने अमूल्य संसाधनों का प्रयोग क्यों नहीं कर रही है। पार्टी ने ठाकुर कौल सिंह और विप्लव ठाकुर जैसे परखे हुए नेताओं का प्रयोग क्यों नहीं किया।
इसके बजाय यह भुरभुरा चुके हथियारों पर निर्भर है और उसके पास ठोस हथियार नहीं हैं। दिल्ली की तरह यहां पार्टी में सक्षम नेतृत्व का अभाव है। दिल्ली हार का जश्न मनाते समय कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ने इतना बुरा नहीं किया जितना राहुल सोचते हैं। उसने लगभग 40 फीसदी वोट हासिल किए और उसके अधिकतर उम्मीदवार कम अंतर से हारे हैं। उनकी कांग्रेस की तरह जमानत जब्त नहीं हुई। मैंने उनके नेताओं से कहा था कि अगर उनके पास कोई प्रभावी नेता होता या वे पहचान वाले चेहरे को सामने लाते तो वे जीत जाते। अगर मैं निर्णय लेने वाले लोगों में शामिल होता तो मैं पार्टी के बड़े नेताओं को कहीं बाहर सात दिनों के लिए ले जाता जहां वे पार्टी के नेताओं और आम लोगों के संपर्क से भी दूर रहते। पार्टी के चार्टर, मिशन और उद्देश्यों को निर्धारित करने के लिए हमने कोई योजना बनाई होती। इसे सही लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और सही लोगों का चयन करना चाहिए। क्या राहुल या प्रियंका या खुर्शीद ऐसा करेंगे? या क्या पार्टी अपने अस्तित्व की तुलना में भाजपा के लिए नफरत पैदा करने के लिए अधिक प्रतिबद्ध है?

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