विचार मित्र

बजरी माफिया के आगे सरकार का समर्पण

बाल मुकुन्द ओझा
राजस्थान में बजरी खनन पर सियासी घमासान शुरू हो गया है। ऐसा लगता है जैसे बजरी माफिया के आगे सरकार ने समर्पण कर दिया है। पक्ष और विपक्ष में एक दूसरे पर संगीन आरोप लगाए जा रहे है। देश की सर्वोच्च अदालत ने राज्य में बजरी खनन पर रोक लगा रखी है। इसके बावजूद अवैध खनन धड़ल्ले से हो रहा है। सरकारी मिलीभगत के आरोप सरेआम लगाए जा रहे है।
बजरी माफिया में भी अवैध खनन और वर्चस्व को लेकर आपसी मारकाट मची है। सरपट दौड़ते अवैध वाहनों से आये दिन सड़क दुर्घटनाएं हो रही है। निर्दोष लोग कुचले जा रहे है। इसी बीच प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछली वसुंधरा सरकार पर बजरी माफिया को संरक्षण देने और करोड़ों रुपयों की धनराशि की माहवारी वसूलने का आरोप जड़ कर सियासी सनसनी फैला दी। मुख्यमंत्री गहलोत ने आरोप लगाया है की पिछली वसुंधरा सरकार में भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा था और बजरी माफिया से प्रतिमाह पांच करोड़ रुपया वसूला जा रहा था। उन्होंने विधानसभा में कहा 25 हजार का बजरी का ट्रक 60 हजार में मिल रहा है। जनता लूट रही है।
गौरतलब है सुप्रीम कोर्ट ने पूरे राजस्थान में बजरी खनन पर रोक लगा रखी है। मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे की अध्यक्षता वाली सुप्रीम अदालत की एक पीठ ने हाल ही में राजस्थान सरकार, कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को अवैध रेत खनन पर रोक के लिए तत्काल कदम उठाने को कहा है । न्यायालय ने चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने का भी राज्य सरकार को निर्देश दिया। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अवैध रेत खनन से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होने की संभावना है। न्यायालय राजस्थान में अवैध रेत खनन को लेकर कई याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई कर रहा है। इसके बावजूद अवैध खनन धड़ल्ले से हो रहा है। सरकार इस अवैध खनन को रोकने के लिए रस्मी तौर पर कार्रवाई कर रही है, लेकिन इसे रोकने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही बजरी खनन को लेकर लगी रोक को हटाने से मना कर दिया हो लेकिन प्रदेशभर में निरंतर हो रहे निर्माण कार्यों ने सरकार की कार्य प्रणाली की पोल खोल दी है।
अगर बजरी खनन पर रोक है तो फिर लगातार निर्माण कार्य कैसे हो रहे है। प्रदेश में सर्वत्र बजरी के ढेर लगे हैं। निजी निर्माण के साथ सरकारी निर्माण कार्य धड़ल्ले से चल रहे है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि रोक के बाद सरकार की नाक के नीचे आखिर बजरी आ कहां से रही है? सही बात तो यह है कि सम्बद्ध जिम्मेदार अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मालामाल हो गए हैं। लगभग हर जिले में पुलिस और खान अधिकारियों ने बजरी खनन की आड़ में अपनी भागीदारी तय कर रखी है। इसके चलते प्रदेश में बजरी खनन की आड़ में संगठित गिरोह पनप गया है।
राजस्थान में बजरी खनन को लेकर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2017 में आदेश दिया था कि बिना पर्यावरण स्वीकृति चल रही बजरी खानें बंद की जाए। कोर्ट ने कहा था कि बिना पर्यावरणीय मंजूरी और अध्ययन रिपोर्ट के खनन की इजाजत नहीं दी जा सकती है। इसके बाद से राजस्थान में बजरी खनन पर रोक लगी हुई है। रोक के बावजूद प्रदेश में अवैध बजरी खनन शुरू हो गया और बजरी के दाम आसमान पर चढ़ गए। इस समय राजस्थान में बजरी खनन बहुत बडा मुद्दा बना हुआ है।
अवैध रूप से चलने वाले बजरी के ट्रक राजस्थान मे कई लोगों की जान ले चुके हैं। राजस्थान पुलिस के कई अधिकारी और सिपाही इन ट्रक चालकों से अवैध वसूली के मामले में पकड़े गए हैं और यह मामला पुलिस तथा खनन विभाग मे भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जरिया बन गया है।
बजरी माफिया राजस्थान में इस हद तक बेखौफ हो गया है कि बजरी खनन रोकने वाले अधिकारियों पुलिस कर्मचारियों और आम जनता पर हमला तक कर देता हैं। दूसरी तरफ भाजपा नेताओं का कहना है कांग्रेस सरकार की सांठगांठ से राजस्थान में भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा है। परिवहन घोटाले के तार सरकार से जुड़े हुए है। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद सरकारी संरक्षण से बजरी खनन हो रहा है और बजरी माफिया दूने- चौगुने दामों पर राजधानी सहित प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर बजरी परिवहन का कार्य बेखौफ कर रहे है। सरकार की नाक के नीचे राजधानी जयपुर में बजरी का नंगा नाच देखा जा सकता है। बजरी की आपूर्ति बिना रोक टोक चैड़ेधाड़े हो रही है। राजधानी का एक भी कोना ऐसा नहीं है जहाँ बजरी की आपूर्ति नहीं हो रही है।
पुलिस, खान विभाग और अन्य सम्बंधित अधिकारी खानापूर्ति के माध्यम से इस अवैध व्यापार को प्रश्रय दे रहे है जो किसी से छिपा नहीं है। खुद मुख्यमंत्री स्वीकार कर रहे है की जनता लूट रही है ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है। इससे प्रतीत होता है सरकार ने बजरी माफिया के आगे अपना समर्पण कर दिया है।

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