पटनाबिहार

कोरोना इफेक्ट : वेश्याओं की महफ़िल पड़ा सुना ,अब खाने के लाले

 

एड्स ने भयभीत नहीं किया था, कोरोना ने तो जिंदगी ही बर्बाद कर दिया
>> बेवफाई से चोट खाएं और तनहाई दूर करने के लिए महफ़िल -ए- मुजरा में शरीक होते थे नामचीन
>> सुविधाओं की क्या बात करते हैं साहब ,राशन कार्ड तक नहीं हैं ,चार दिन हो गये किसी ने खैरियत तक नहीं लिया
>> हमारे नृत्य और संगीत पर सभी वाह-वाह तो करते हैं ,वफ़ादारी कहां ,समाज के वंचित जो ठहरे
रवीश कुमार मणि
पटना ( अ सं  ) ।  ” इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं “…. रेखा , अभिनीत फिल्म उमराव जान की यह गीत सुपर हिट हुईं थीं । गीत का तात्पर्य यह था की वेश्याओं की महफ़िल किसी एक लिए नहीं हैं , नृत्य और संगीत का दाम देने वाले सभी को एक जैसा ही सम्मान दिया जाता हैं । चाहे कोई नामचीन राजा हो या बदनाम बदमाश । हजारों दिलों पर राज करने वाली ऐ वेश्याएं (नृत्यकी)  की महफ़िल कोरोना को लेकर जारी लॉकडाउन से पुरे देश में सुनी हो गयी हैं चाहे बनारस हो या कोलकाता या फिर बिहार का मुजफ्फरपुर, अरवल, नटवार ( भोजपुर ) ।
      राज-राजवाड़े, मुगल शासन ,अंग्रेजी हुकूमत या फिर आजाद भारत ” वेश्या ” आज भी समाज से वंचित है और नजर में कलंकित । लेकिन अमीरों के समारोह में वेश्याएं की नृत्य -संगीत शान समझा जाता हैं । महान उपन्यासकार प्रेमचंद की लिखित  ” वेश्या ” एवं शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की  लिखित ” देवदास ” ने वेश्याएं की जिंदगी की हकीकत बयां किया ,  दोनों पुस्तकों की खूब प्रशंसा हुईं लेकिन समाज और हमारे संविधान ने इन्हें स्वीकार नहीं किया बल्कि बदतर हाल पर छोड़ दिया । हां ,रिल लाइफ में ” वेश्या ” की भूमिका अदा कर कई अभिनेत्री आसमान की बुलंदी जरूर पा लीं ।
    बिहार के मुजफ्फरपुर की वेश्या ( नृत्यकी ) रूबी (काल्पनिक ) बताती हैं की मेरी मां इसी पेशे से रही हैं । एड्स जैसे घातक बीमारी भी इतना डरावना नहीं लगा था जितना कोरोना । एड्स ने भूखमरी नहीं होने दिया था ,बस सावधानी रखनी पड़ती थी । कभी भी महफ़िल ( कोठा ) बंद नहीं हुआ था लेकिन कोरोना ने सबकुछ खत्म कर दिया ,महफ़िल पुरी तरह से लॉकडाउन हो गयी हैं । खाने तक के लाले हैं ।
     इसी पेशे से जुड़ी शबनम (काल्पनिक ) बताती हैं की साहब ,हम मौज-मस्ती के चीज है, कौन आएंगा मदद के लिए । शहर में है तो बड़े -बड़े लोग ,महफ़िल के दीवाने भी हैं । हमारी नृत्य और संगीत पर वाह-वाह तो जरूर करते रहे हैं ,वफ़ादारी कहां । चार दिन गुजर गये किसी ने खैरियत तक नहीं लिया । सरकार का कौन नुमाइंदा आएगा इस बदनाम नगरी में। न राशन कार्ड है न अपना घर…. धंधा (महफ़िल ) बंद ।
     कोरोना ने देश -दुनिया में जहां उत्थल-पत्थल मचा कर रख दिया हैं । इसके खौफ ने लोगों को घर के अंदर रहने पर विवश कर दिया हैं ।जारी लॉकडाउन से सिर्फ स्वतंत्रता ही बाधित नहीं हुईं हैं बल्कि दैनिक मजदूरों ,भीखमंगो आदी को भूख सता रही है, इनसे कहीं अधिक बुरा हाल ” वेश्याएं ” की हैं । इस बुरे दौर में  सरकार और समाज ” वेश्याओं ” को वंचित नहीं करें , नहीं तो यह तो जिंदा ही मर जाएंगी ।
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