विचार मित्र

हमारे नेता भैया

योगेन्द्र श्रीवास्तव

व्यंग-

स्वतंत्र लेखक डॉ0 अंगद सिंह ‘निशीथ

हमारे नेता भैया भी खूब है जब कहीं पर कभी कुछ बोलना होता है तो मुस्कुराते रहते हैं और मौन रहने की स्थिति होती है तो कुछ ना कुछ ऐसा बोल ही देते हैं कि उनके कुछ पिछलग्गू भी उनका मजाक उड़ाने मैं नहीं चूकते । हालांकि ऐसी स्थिति में भैया के ग्रुप वाले बड़े लोग भी महाभारत के भीष्म पितामह वाली भूमिका के निर्वहन में ही अपना कल्याण समझते हैं।
भैया है कौन? सीधा सा जवाब है, भैया बहुत ही नामी गिरामी और खानदानी रईस के रूप में स्थापित एक परिवार के एकमात्र पुरुष वारिश हैं मगर जनसेवा के व्रत ने उन्हें परंपरागत ढंग से विवाह करने से रोक दिया है। हालांकि उनके कुछ चहेते लोग नाम कमाने के चक्कर में यह खबर उड़ा देते हैं कि भैया जिसे चाहते हैं उससे विवाह होने पर भैया परधानी का चुनाव ही नहीं लड़ पाएंगे या गांव वाले उन्हें नकार देंगे जैसा कि भैया के अम्मा के साथ हुआ था । भैया की अम्मा तो परधान बनना चाहती थी किंतु उनके घर बाहर के सारे विरोधी लोग एक हो गए। परिणाम स्वरूप भैया की अम्मा अपने मायके वालों की बदनामी के डर का बहाना बनाकर परधानी के चुनाव से बहुत दूर हो गई।
वाकई भैया बहुत सीधे हैं, बहुत अच्छे हैं इसीलिए उन्हें गांव के अलावा पूरे समाज की भी चिंता लगी रहती है। रहे भी क्यों नहीं समाज की चिंता करना तो उनका खानदानी पेशा ही है। उनके पिताजी, उनके पिताजी की माता जी और उनके भी पिताजी सभी गांव की परधानी पा गए थे और जमकर लोगों की सेवा की। उनके रास्ते में किसी ने भी आने की हिम्मत नहीं कि। और जिसने महत्वाकांक्षी बनने की कोशिश की उसे नेपथ्य में जाना पड़ा। इसी उम्मीद में भैया जी बाल उनके कुर्ते पायजामे से भी अधिक सफेद हुए जा रहे हैं कि वह भी किसी दिन गांव के परधान जरूर बन जाएंगे।
पहले भैया हंस – मुस्कुरा भी लेते थे लेकिन इस समय उनको जनता जनार्दन के स्वास्थ्य की चिंता खाए जा रही है। इसी चक्कर में भैया ने गांव के उत्तर टोला से ध्यान हटाकर दक्षिण टोला जाने की तैयारी कर लिया । नतीजा हुआ कि उत्तर टोला वाले उनसे नाराज होकर किसी और को सरपंच चुन लिए जिसे गांव के कुछ लोग भैया के बाद दीदी के रूप में पुकार कर अपना गम गलत कर रहे हैं।

वास्तव में भैया वर्तमान समय मे समाज सेवा में व्यस्त रह कर इस अवधारणा को बल दे रहे हैं कि यदि कोई कुल खानदान नामी गिरामी हो तो कम अक्ल या अक्षम कुलदीपक भी घर या गांव का मुखिया बनकर घर गांव वालों के साथ पूरे समाज का मार्गदर्शन कर सकते है। भैया की एक और विशेषता है कि वह उस विषय पर भी अधिकार सहित बोल देते हैं जिसके बारे में उन्हें ककहरा भी नहीं मालूम । आजकल गांव और आस-पास फैली महामारी को लेकर भैया और उनकी अम्मा के सुझाव – सलाह या निर्देशों को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है। इसके बावजूद भैया के कल्याण के लिए उनके मित्रगण और पिछलग्गू दिन रात एक किए रहते हैं और बेमौके या बेमौसम भी जिंदाबाद बोल बोल कर जिंदा होने का सबूत देते रहते हैं।और भैया की हर बातों को तिल का ताड़ बनाने वाले उनके विरोधी ऐसे अवसरों पर भैया के साथ ही उनकी अम्मा की भी खिंचाई करने से नही चूकते। वास्तव में हमारे नेता भैया इस कहावत को चरितार्थ करते हैं कि “अंधा रस्सी बटे और पड़वा चबात रहे”।

नोट – उक्त लेख में लेखक का अपना निजी विचार पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी है जिसका उतरदायित्व लेखक का है। तरुण मित्र समहत हो यह आवश्यक नही ।

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