विचार मित्र

खेती ही देश को मंदी से निकालेगी

निरंकार सिंह

कोरोना संकट के बाद देश को खेती ही मंदी से निकालेगी। इस लॉकडाउन का खेती का पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा है। हालांकि कई प्रदेशों में फसल काटने वाले मजदूरों की उपलब्धता सामान्य समय की तुलना में इस बार कम थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन 2.0 के दौरान कम जोखिम वाले क्षेत्रों में छूट संबंधी गाइलाइन जारी की है। कोरोना मुक्त इलाकों में यह छूट 20 अप्रैल से लागू होगी।

कटाई और आने वाले दिनों में नए बुवाई सीजन के शुरू होने के मद्देनजर खेती-किसानी से जुड़े कामों को खास छूट दी गई है। हालांकि, इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों का कड़ाई से पालन किया जाएगा। लॉकडाइन के पहले 21 दिनों की तरह 3 मई तक चलने वाले दूसरे चरण में भी हेल्थ सर्विसेज चालू रहेंगी। सरकार ने कहा कि खेती से जुड़ी सभी गतिविधियां चालू रहेंगी, किसानों और कृषि मजदूरों को हार्वेस्टिंग से जुड़े काम करने की छूट रहेगी।

कृषि उपकरणों की दुकानें, उनके मरम्मत और स्पेयर पार्ट्स की दुकानें खुली रहेंगी।खाद, बीज, कीटनाशकों के निर्माण और वितरण की गतिविधियां चालू रहेंगी, इनकी दुकानें खुली रहेंगी। कटाई से जुड़ी मशीनों (कंपाइन) के एक राज्य से दूसरे राज्य में मूवमेंट पर कोई रोक नहीं रहेगी। मछली पालन से जुड़ी गतिविधियां, ट्रांसपोर्ट चालू रहेंगी।दूध और दुग्ध उत्पाद के प्लांट और इनकी सप्लाई चालू रहेगी। मवेशियों के चारा से जुड़े प्लांट, रॉ मटिरिलय की भी सप्लाई चालू रहेगी।

सर्दियों के थोड़ा लंबा खिंच जाने और मार्च में हुई बेमौसम की बारिश की वजह से इस बार पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल की कटाई देर से हो रही है। उत्तर प्रदेश में गन्ने की कटाई और फसल की बुआई ज्यादातर स्थानीय मजदूरों के भरोसे होती है। खेती को इस संकट से बचाने के लिए और भी प्रयास किए जाने की जरूरत है.। भारत की कुल आबादी का 58 फीसदी हिस्सा खेती पर निर्भर है।

देश की अर्थव्यस्था में खेती का 256 अरब डॉलर का योगदान है। आज भी हमारी अर्थव्यवस्था का मूलाधार खेती ही है। देश के किसान उसकी आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। इसलिए देश के राजनीतिक और इसके आर्थिक विकास के लिए कृषि की स्थिति हमेशा महत्वपूर्ण रही है। यह आधुनिकीकरण के दौरान भी महत्वपूर्ण रहेगी। कृषि हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की नींव है। यह 130 करोड. लोगों का पेट भरती है।

हल्के उद्योग के लिए कच्चे माल की जरूरतों की 70 फीसदी आपूर्ति, औद्योगिक उत्पादों के लिए बाजार प्रदान और निर्माण के लिए धन जमा करती है। पिछले 30 से भी ज्यादा सालों के दौरान यह बार-बार देखा गया है कि कृषि उत्पादन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास पर काफी हद तक असर डालता है और निर्माण के पैमाने और गति को प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित करता है। जब भी फसल खराब हुई है तो उसके तत्काल बाद हल्के और भारी औद्योगिक उत्पादन में भारी कमी आयी है। उसके बाद जब कृषि की हालत सुधरी तो औद्योगिक उत्पादन दोबारा बढ़ना शुरू हो गया। इसलिए अर्थव्यवस्था की सुस्ती का मुकाबला करने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के साथ-साथ इसको आधुनिक बनाने पर जोर देेना होगा।

यदि हम कृषि के विकास और आधुनिकीकरण के लिए बड़े पैमाने पर कोशिश नहीं करते हैं तो समूची अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और यह नाकामयाब भी हो सकता है। कृषि के विकास को प्राथमिकता देने का मतलब यह है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सबसे पहले खेती-बारी को प्रमुखता देनी चाहिए और फिर हल्के उद्योग तथा उसके बाद भारी उद्योग पर जोर देना चाहिए। पर आज हमारी खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है।

इसलिए कभी सूखे का तो कभी बाढ़ का संकट पैदा हो जाता है। उधर किसान कभी खाद तो कभी डीजल के संकट से जूझता रहता है। इसलिए खेती में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ सिंचाई सुविधा भी बढ़ायी जानी चाहिए। हमारा देश आज और आगे भी गेहूँ और चावल का प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता बना रहेगा। इसलिए उनके उत्पादन को बढ़ाने के लिए कदम उठाने पड़ेंगे। गेहूँ की पैदावार के क्षेत्र को और अधिक व्यापक बनाने के उद्देश्य से पूर्वी उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और पूर्व के राज्यों में अधिक मात्रा में गेहूँ की पैदावार करनी होगी। संकर चावल की विधि को अपनाकर, पारम्परिक क्षेत्रों में चावल का उत्पादन और अधिक बढ़ाना होगा।

मध्य भारत में मोटे अनाज के उत्पादन में वृद्धि करके अन्य उत्पादों की पैदावार को भी बढ़ाना होगा, ताकि वे आंशिक रूप से गेहूँ और चावल की जरूरत को कम कर सकें। अनाज की प्रौद्योगिकी को अधिक विकसित करके इस क्षेत्र को इतना अधिक महत्वपूर्ण बनाना होगा, ताकि वह लगातार तेजी से बढ़ती हुई माँग के अलावा, निर्यात योग्य मोटा अनाज भी उत्पादित कर सके। मध्य भारत को सब्जियों और फलों का उत्पादन केन्द्र बनाया जाए और साथ ही यह कोशिश भी की जाए कि ये कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध हो सकें। इससे गेहूॅ और चावल की खपत पर भी असर पड़ेगा और ऐसा ही प्रयास, जाड़े के दिनों में बड़े पैमाने पर हिंद-गंगा क्षेत्र में किया जाना चाहिए।

आलू टैपियोका (कसावा) और शकरकंदी जैसी गांठदार फसलों को और ज्यादा उगाया जाये और उन्हें कम कीमत मुहैया कराया जाय। इस बात पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है। देश में दालों की कमी है, मगर प्रोटीन की नहीं। लेकिन लोगों की खाने की आदतों को ध्यान में रखते हुए, दालों की मांग को उच्च वरीयता देकर पूरा करना पड़ेगा। चूँकि सब्जियों और फलों की खपत भविष्य में बढ़ेगी इसलिए हर क्षेत्र में कृषि के उपयुक्त जलवायु की आवश्यकताओं और आर्थिक दृष्टि से उचित लाभ को ध्यान में रखते हुए सही विकल्प का चुनाव करना पड़ेगा। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए कोल्ड स्टोरेज और दूर-दूर तक फासला तय करने वाले परिवहन की व्वयवस्थाएं भी महत्वपूर्ण होंगी।

देश के ग्रामीण परिवार, खासकर भूमिहीन और छोटे तथा सीमांत किसान पशुपालन को आय के पूरक स्रोत के रूप में अपनाते हैं। इस व्यवसाय में अर्द्धशहरी, पर्वतीय, जनजातीय और सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सहायक रोजगार मिलता है, जहां केवल फसल की उपज से ही परिवार का गुजर-बसर नहीं हो सकता। विश्व में सबसे अधिक मवेशी भारत में हैं। दुनिया की कुल भैंसों का 57 प्रतिशत और गाय-बैलों का 14 प्रतिशत भारत में है।

पशुपालन और डेयरी विभाग के द्वारा 16 अक्टूबर 2019 को पशुधन आबादी की जनगणना की जारी गयी रिपोर्ट के अनुसार भारत की पशुधन आबादी 2012 की तुलना में 4.6 प्रतिशत से बढ़कर 53 करोड़ 57.8 लाख हो गई है। भारत में बीते पांच सालों में गायों की संख्या 18 प्रतिशत बढ़कर 14.51 करोड़ हो गई है।

रिपोर्ट के अनुसार देश में भैंसों की संख्या इस दौरान मात्र एक प्रतिशत बढ़ी है। वहीं देश में मुर्गियों की कुल संख्या 85.18 करोड़ है। नवीनतम गणना के मुताबिक बकरियों की संख्या 10 फीसदी बढ़कर 14.9 करोड़ हो गई है। सुअर की संख्या 12 फीसदी घटकर 90.6 लाख है। गोधन (गाय-बैल), भैंस, मिथुन और याक की साल 20125 की जनगणना की तुलना में 01 प्रतिशत बढ़कर 30 करोड़ 27.9 लाख हो गई। मिथुन अरूणाचल प्रदेश की राज्य पशु है।

रिपोर्ट के अनुसार देश में साल 2019 में गधों की संख्या 61 प्रतिशत घटकर 1,20,000 रह गई, जबकि ऊंटों की संख्या 37 प्रतिशत घटकर 2,50,000 रह गई है। साल 2019 में कुक्कुट की संख्या करीब 17 प्रतिशत बढ़कर 85 करोड़ 18.1 लाख हो गई है। पिछली गणना की तुलना में साल 2019 में स्वदेशी मादा मवेशियों की संख्या में 10 फीसदी की वृद्धि हुई है। देश में साल 2019 में कुल घोड़े और टट्टू 3.4 लाख हैं, जो पिछली गणना के मुकाबले 45.6 फीसदी कम है। देश की लगातार बढ़ती आबादी की (पशुओं से प्राप्त होने वाली) प्रोटीन की आवश्यकताएं पूरा करने में दूध, अंडा और मांस के रूप में खाद्य भंडार में पशुपालन क्षेत्र जबर्दस्त योगदान कर रहा है।

देश में फिलहाल प्रोटीन की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धता लगभग 11.3 ग्राम है, जबकि इसका विश्व औसत 29 ग्राम है। किन्तु बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए बढ़तें बच्चों और शिशुओं को दूध पिलाने वाली माताओं के पोषण-स्तर को बनाए रखने के लिए देश में प्रोटीन की उपलब्धता में कम से कम दुगनी बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। राष्ट्र के पुनरूद्धार के लिए सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता पर निर्भर रहना काफी नहीं है। हमें अपनी पूरी सहमति के साथ अर्थव्यवस्था का विकास करना चाहिए। अपने कृषि, पशुपालन उद्योग और राष्ट्रीय प्रतिरक्षा को आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी से लैस करना चाहिए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधार करके ही मंदी पर लगाम लगायी जा सकती है।

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