हरदोई

कभी गुलजार हुआ करता था दशहरा मेला में बिलग्राम का गंगधाम

लोगों के बदलते मिजाज के साथ फीकी पड़ गई त्योहारों की मिठास
बडी़ शान से हिंदू मुस्लिम के सामने होता था रावण का दहन
पूरे महीने मेले में गुलजार रहतीं थीं बिलग्राम की गलियां जो अब कहीं नजर नहीं आतीं
बिलग्राम।हरदोई 30 सितम्बर जिंदगी की इस भाग दौड़ में शायद हम अपने त्योहारों में भी बदलाव करने लगे हैं आजकल अपने आपको हम लोगों ने इतना व्यस्त कर लिया है कि घर-परिवार यार-दोस्तों के लिए वक्त ही नहीं देते हमारे देश के त्योहार चाहे होली हो या दिवाली ईद हो या बकरीद दशहरा हो या बैसाखी सब के सब त्योहारों में हमारी गंगा जमुनी तहजीब की सोंधी सोंधी खुशबू आती थी और हम सब एक साथ मिलकर यह सब त्योहार मनाया करते थे पर आज कल  शायद वक्त की कमी की वजह से यह त्यौहार सिर्फ खानापूर्ति कर  महज औपचारिकता भर मनाते हैं इसीलिए हम भारतवासियों के पास मोटरगाड़ी बैंक बैलेंस तो बढ़ गया परंतु उतनी ही दिलों में मोहब्बत और भाईचारे की कमी होने लगी है बिलग्राम नगर में कभी इसी दशहरा को लेकर हिंदू-मुस्लिम एक साथ मिलकर इस असत्य पर सत्य की जीत  का जश्न एक महीना पहले  कार्तिक शुरू से लेकर दशहरा तक मनाते थे जिसमें मेला का आयोजन हुआ करता था जो एक महीना चलता था और नगर पालिका बिलग्राम से लेकर गंगाधाम तक रोड के इर्द-गिर्द दुकानों का जमावड़ा लगा कर ता था देश के कोने-कोने से सर्कस नौटंकी मौत का कुआं काला जादू के माहिर माहिर लोग इस मेले में भाग लिया करते थे मौजूदा सुल्तान कांप्लेक्स से लेकर गंगाधाम के पश्चिमी ओर में विशालकाय रावण का पुतला बनाया जाता था जिसको दहन के दिन देखने के लिए आसपास गांव तथा कस्बों के लोग सपरिवार समेत देखने के लिए आते थे इसी ग्राउंड में कानपुर की मशहूर कृष्णा और लंबरदार की नौटंकी लगा करती थी देश के मशहूर नामी गिरामी अपोलो और एशियन सर्कस भी इस मेले की शोभा बढ़ाया करते थे जिसमें छात्र और छात्राओं को आधे दाम में सर्कस दिखाया जाता था जो आजकल के युग में वक्त की कमी कहिए या जगह का अभाव जिसे देखने के लिए बच्चे बूढ़े और जवान की आंखे आज भी तरसती हैं/
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