विचार मित्र

दुनिया बदलना चाहते हैं तो शुरुआत घर से करें

ललित गर्ग 

दुःख को सुख मेें बदलने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास बहुत जरूरी है। एक ही परिस्थिति और घटना को दो व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से ग्रहण करते हैं। जिसका चिंतन विधायक होता है, वह अभाव को भी भाव तथा दुःख को भी सुख में बदलने में सफल हो सकता है। जिसका सोच निषेधात्मक या गलत होती है, वह सुख को भी दुःख में परिवर्तित कर देता है।

समय बदलता है, विचार बदलते हैं, व्यवहार बदलता है और उसके साथ रहने के तौर-तरीके भी। शांति, प्यार और खुशहाल जीवन की ओर जाने वाले रास्ते कठिन नहीं हैं। मुश्किल है तो अपने बीते कल से बाहर निकलना, यह सोचना कि आने वाला कल भी आज जैसा ही होगा। महान अंग्रेजी साहित्यकार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ कहते हैं, ‘जो अपना मन नहीं बदल सकते, वो कुछ भी नहीं बदल सकते।’

जिंदगी एक पन्ने की तरह है, जिसके कुछ अक्षर फूलों से लिखे गए हैं, कुछ अक्षर अंगारों से लिखे गये हैं। क्योंकि जीवन में कहीं सुख का घास है तो कहीं रजनीगंधा के फूल हैं, कहीं रेगिस्तान है तो कहीं सागर है, कहीं मनमोहक घाटियां हैं तो कहीं सुंदर वन हैं, एक जैसा जीवन किसी का नहीं है। कोरोना जैसे महासंकट में सबको संघर्षों से सामना करना पड़ता है।

सुख-दुःख के घर्षण से ही ज्योति प्रकट होती है। चीनी कहावत है कि रगड़ के बिना न तो रत्न पर पाॅलिश आती है और न ही संघर्ष के बिना आत्मा में पूर्णता। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक हर व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है। कभी महारोगों-महामारी से संघर्ष, कभी विचारों का संघर्ष, कभी पारिवारिक संघर्ष, कभी आर्थिक संघर्ष, अनगिन संघर्षों के घेरे जीवन में देखने पड़ते हैं। एक नन्हा-सा अंकुर एक वृक्ष बनता है, तब तक वह कितने तूफानों एवं बर्फीली हवाओं से मुकाबला कर चुका होता है। तभी वह बरगद के रूप में प्रख्यात होता है। आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं सभी संघर्षों से युद्ध करके ही महान बने हैं।

जीवन में परिस्थितियों के आरोह-अवरोह का क्रम देखना पड़ता है। जीवन व्यवहार में आने वाले अवरोध हमें रोकने व रूलाने नहीं आते। वे छैनी, हथौड़ी की तरह होते हैं जो हमारे सौभाग्य की प्रतिमा उभारने आते हैं। कष्ट कांटों में जिसने गुलाब की तरह पलना सीख लिया, उसने अपना भाग्य बदलना सीख लिया है। कहते हैं- गुलाब पर कांटे आते हैं उसे बचाने के लिए और जिंदगी में दुख-दर्द आते हैं उसे समझाने के लिए। मानव का आत्मविश्वास के साथ सत्पथ पर चलने का संकल्प-बल जाग गया तो सारी सफलताएं पांव पसारने लगेंगी। विश्वव्यापी प्रतिष्ठा आरती उतारने लगेगी तथा प्रतिकूल परिस्थितियां अनुकूलता में बदलने लगेंगी।

गलत सोच का चश्मा जितनी जल्दी हो, उतार देना चाहिए। बुरे विचार जितना दूसरों का नुकसान करते हैं, उतना ही हमारा अपना भी। कारण अपनी ही सुरक्षा को लेकर डरा दिमाग ढंग से नहीं सोच पाता। हम स्वार्थी हो उठते हैं, केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। लेखक इजरायलमोर एयवोर कहते हैं, ‘आपके विचार वहां तक ले जाते हैं, जहां आप जाना चाहते हैं। पर कमजोर विचारों में दूर तक ले जाने की ताकत नहीं होती। गलत सोच एवं पैसे का लोभ तो पहले भी था, स्वार्थ की वृत्ति आदमी में पहले भी थी, नाम, यश, प्रतिष्ठा और बड़प्पन की भावना पहले भी थी, महत्वाकांक्षा का होना कोई नई बात नहीं। गलत सोच को बढ़ावा देने वाले ये सारे कारक तत्व आदमी में युगों पहले भी थे, आज भी। इतना जरूर है कि नकारात्मक सोच का ग्राफ इतना ऊंचा पहले कभी नहीं था, जितना कोरोना के कारण आज है। जो है, उसे छोड़कर, जो नहीं है उस ओर भागना हमारा स्वभाव है।

फिर चाहे कोई चीज हो या रिश्ते। यूं आगे बढ़ना अच्छी बात है, पर कई बार सब मिल जाने के बावजूद वही कोना खाली रह जाता है, जो हमारा अपना होता है। दुनियाभर से जुड़ते हैं, पर अपने ही छूट से जाते हैं। संत मदर टेरेसा ने कहा है, ‘अगर दुनिया बदलना चाहते हैं तो शुरुआत घर से करें और अपने परिवार को प्यार करें।’

गलत सोच एवं अनैतिक कार्यों में लिप्त लोगों को धनवान और प्रतिष्ठित होते देख आदमी में नकारात्मक चिंतन जागता है। अपनी ईमानदारी उसे मूर्खतापूर्ण लगती है। वह पुनर्चिंतन करता है-क्या मिला मुझे थोथे आदर्शों पर चलकर? मुझसे जूनियर लोग कहां से कहां पहुंच गए और मैं ईमानदारी से चिपका रहकर जहां का तहां रह गया। जब सभी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं तो एक मैं ही हरिश्चंद्र क्यों बनूं? यह नकारात्मक चिंतन उसे भी भ्रष्टाचार के दलदल में उतार देता है। समाज में भ्रष्ट और बेईमान लोगों की उत्पत्ति इसी तरह के गलत विचारों के संक्रमण से हुई।

इस तरह की गलत सोच हमारी दुनिया को छोटा कर देती है। भीतर और बाहरी दोनों ही दुनिया सिमट जाती हैं। तब हमारा छोटा-सा विरोध गुस्सा दिलाने लगता है। छोटी-सी सफलता अहंकार बढ़ाने लगती है। थोड़ा-सा दुख अवसाद का कारण बन जाता है। कुल मिलाकर सोच ही गड़बड़ा जाती है।

अमेरिकी अभिनेता जॉर्ज क्लूने कहते हैं, ‘अपने ही बोले हुए को सुनते रहना ज्यादा सीखने नहीं देता।’ इस तरह के लोग हैं, जो तात्कालिक सोच से जुड़े होते हैं। उनका चिंतन होता है कि सुयोग से सांसद बने हैं, मंत्री पद मिला है, लेकिन यह कब तक बरकरार रहेगा, कुछ पता नहीं, इसलिए यही सबसे उपयुक्त मौका है, फायदा उठा लेने का। स्वार्थ पूरी तरह से उन पर हावी है। लोभ की पट्टी उनकी आंखों पर बंध चुकी है। यश-अपयश की उन्हें चिंता नहीं। पैसे और प्रभाव के बल पर वे सब कुछ ठीक कर लेंगे, इसका उन्हें पूरा भरोसा है।

हर व्यक्ति में गुण और अवगुण दोनों होते हैं। हमारा चिंतन गुणों की ओर केन्द्रित रहना चाहिए। इसमें हमें शांति और प्रसन्नता का अनुभव होगा। निराशावादी और अवगुणवादी मनुष्य अपने चारों ओर अभावों और दोषों का दर्शन करते हैं। वे अपने जीवन में शांति और प्रसन्नता का अनुभव कभी नहीं कर सकते। जो अभाव को भाव तथा दुःख को सुख में बदलने की कला जानता है, उसी का जीना सार्थक है, वही सफल इंसान है।

अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला एलिनोर रूजवेल्ट कहती हैं, ‘भविष्य उनका होता है, जो सपनों की सुंदरता पर यकीन करते हैं।’ संघर्ष काल में यह बात हमेशा ध्यान रहनी चाहिए कि व्यक्ति के स्वयं के हाथ कुछ नहीं है, व्यक्ति पुरुषार्थ कर सकता है परमार्थ का फल समय से पूर्व प्राप्त नहीं कर सकता। कहते हैं- समय से पहले और मुकद्दर से ज्यादा न किसी को मिला है और न किसी को मिलेगा। उसके लिए इंतजार ही सबसे बड़ा सहयोग है। इस सोच से ही व्यक्ति प्रतिकूलताओं में भी अनुकूलता की सौरभ भर सकता है। जीवन का विकास कर सकता है।

जीवन का क्रम निरंतर प्रवहमान रहने वाला है। उसमें आने वाली उतार-चढ़ाव की परिस्थितियों को हमेशा ही सहज भाव से जीना चाहिए, जिससे ही व्यवहार में समता भाव का परिदर्शन हो सकता है, जीवन में नव उम्मीदों का साक्षात्कार हो सकता है।

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