धर्म - अध्यात्म

रिश्ता कायम होने का दिन है ईद

ईद-उल-फितर का चांद नजर आते ही मुस्लिम समुदाय में खुशी की लहर दौड़ जाती है। जब लोग एक-दुसरे को अपने सीने से लगाते है। गले मिलने से सारे शिकवे गिले कोसों दूर चला जाता है। अपनेपन का अहसास महसूस होता है। माहौल में खुशियों की लहर दौड़ पड़ती है।
रंग-बिरंगे कपड़ों में सुसज्जित बच्चों के चेहरे पर खुशी देखते ही बनती है। खुशियों की ये बहार भारतीय उपमहाद्वीप, अरब देशों से लेकर अमेरिका, यूरोप से लेकर अफ्रीकी देशों तक में देखी जा सकती है। दुनिया की दुसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला मजहब का यह खूबसूरत पैगाम विश्व के पचास से ज्यादा मुस्लिम बहुल वाले देशों की सीमाओं से निकलकर दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचता है। खासकर महीनेभर की तपती गर्मी और लू के मौसम में रोजा रखने वाले रोजेदार की खुशियों की इंतेहा को बयान कर पाना शब्दों में मुमकिन नहीं। यही वजह है पूरी दुनिया में ईद-उल-फितर हर्षोल्लास से मनायी जाती है।
वैसे भी सिवइयां में लिपटी मोहब्बत की मिठास का त्योहार ईद की खुशी रोजेदारों के त्याग, तपस्या और इबादत से जुड़ी है। वह जान जाता है कि सारी दुनिया अल्लाह की बनायी हुई है, सब प्राणियों में प्राण होते हैं, सभी को दुख-दर्द होते हैं, सभी को जीवन जीने का हक है। इन सद्भावनाओं के साथ रोजेदार ईद-उल-फितर की सौगात को पाता है।
ईद का सही मायने में हकदार कोई होता है तो वो है रोजेदार। माहे रमजान में रोजा रखने वाले तो दिल से यही चाहते हैं कि मुबारक माह रमजान कभी खत्म न हो। रमजान को अलविदा करते हुए अनेक रोजेदार उदास भी होते हैं मगर ईद की खुशी उन्हें यह अहसास करवा जाती है कि नेकी की तरफ बढ़ते चलें, बदी-गुनाह से हमेशा बचते रहें।
ईद-उल-फितर अपने नेक मकसद के साथ विगत लगभग 1400 साल से चली आ रही है। ईद-उल-फितर के दिन शहर की ईदगाहों में ईद की नमाज शहर काजी के नेतृत्व में अता की जाती है। नमाज के बाद वतन और दुनिया में अमन-ओ-चैन की दुआ के लिए नमाजियों के हाथ खुदा की बारगाह में उठते हैं।
मीठी ईद यानी ईद-उल-फितर के मौके पर सेवैया खीर और सेवैया से बने मीठे पकवान मेहमानों की आवभगत के लिये परोसे जाते हैं। ईद के दिन सिवइयों या शीर-खुरमे से मुंह मीठा करने के बाद छोटे-बड़े, अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन गले मिलते हैं तो चारों तरफ मोहब्बत ही मोहब्बत नजर आती है। एक पवित्र खुशी से दमकते सभी चेहरे इंसानियत का पैगाम माहौल में फैला देते हैं।
कुरआन के अनुसार पैगंबरे इस्लाम ने कहा है कि जब अहले ईमान रमजान के पवित्र महीने के एहतेरामों से फारिग हो जाते हैं और रोजों-नमाजों तथा उसके तमाम कामों को पूरा कर लेते हैं, तो अल्लाह एक दिन अपने उक्त इबादत करने वाले बंदों को बख्शीश व इनाम से नवाजता है। इसलिए इस दिन को ईद कहते हैं और इसी बख्शीश व इनाम के दिन को ईद-उल फितर का नाम देते हैं। इस्लाम में खुशी के मौके पर भी दूसरों को भूलने का रिवाज नहीं है। ईद-उल-फितर में ईद की नमाज अता करने से पहले-पहले फितरा अदा करना अति आवश्यक है।
साधन संपन्न और खुशहाल इनसान अपनी कमायी का एक हिस्सा गरीब, यतीम, विकलांग, बीमार, जरूरतमंद, पुरुष-महिला, विधवा आदि को फितरे के रूप में देगा ही। परिवार का मुखिया अपना, अपनी पत्नी, मां-बाप, बच्चे और नौकर-नौकरानी के बदले फितरा देता है।
फितरे के रूप में नगद राशि, अनाज, चावल, धान, नए वस्त्र, कंबल, दवाइयां दी जा सकती हैं। यदि किसी परिवार में एक सदस्य है या किसी परिवार में दस सदस्य हैं तो हरेक महिला-पुरुष-बच्चे की तरफ से परिवार प्रधान को फितरा देना जरूरी है। यदि फितरा अदा नहीं किया जायेगा तो नमाज का सवाब नेकी का बदला कतई नहीं मिलेगा। अल्लाह से दुआएं मांगते व रमजान के रोजे और इबादत की हिम्मत के लिए खुदा का शुक्र अदा करते हाथ हर तरफ दिखाई पड़ते हैं और यह उत्साह बयान करता है कि लो ईद आ गई।
रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। इस पूरे माह में रोजे रखे जाते हैं। इस महीने के खत्म होते ही दसवां माह शव्वाल शुरू होता है। इस माह की पहली चांद रात ईद की चांद रात होती है। इस रात का इंतजार वर्ष भर खास वजह से होता है, क्योंकि इस रात को दिखने वाले चांद से ही इस्लाम के बड़े त्योहार ईद-उल फितर का ऐलान होता है। इस तरह से यह चांद ईद का पैगाम लेकर आता है। इस चांद रात को अल्फा कहा जाता है।
रमजान माह के रोजे को एक फर्ज करार दिया गया है, ताकि इंसानों को भूख-प्यास का महत्व पता चले। भौतिक वासनाएं और लालच इंसान के वजूद से जुदा हो जाए और इंसान कुरआन के अनुसार अपने को ढाल लें। इसलिए रमजान का महीना इंसान को अशरफ और आला बनाने का मौसम है। पर अगर कोई सिर्फ अल्लाह की ही इबादत करे और उसके बंदों से मोहब्बत करने व उनकी मदद करने से हाथ खींचे तो ऐसी इबादत को इस्लाम ने खारिज किया है। क्योंकि असल में इस्लाम का पैगाम है- अगर अल्लाह की सच्ची इबादत करनी है तो उसके सभी बंदों से प्यार करो और हमेशा सबके मददगार बनो।
यह इबादत ही सही इबादत है। यही नहीं, ईद की असल खुशी भी इसी में है। उपवास की समाप्ति की खुशी के अलावा इस ईद में मुसलमान अल्लाह का शुक्रिया अदा इसलिए भी करते हैं कि उन्होंने महीने भर के उपवास रखने की शक्ति दी। ईद के दौरान बढिय़ा खाने के अतिरिक्त नए कपड़े भी पहने जाते हैं और परिवार और दोस्तों के बीच तोहफों का आदान-प्रदान होता है।
एकता का बेमिसाल दिन 
ईद के चांद के साथ रमजान का अंत होता है। रमजान की खुशी में ईद मनाई जाती है। ईद का अर्थ ही खुशी का दिन है। मुसलमानों के लिए ईद-उल-फित्र त्योहार अलग ही खुशी लेकर आता है। ईद के चांद के दर्शन के साथ हर तरफ रौनक हो जाती है। खासतौर से हमारी बहनें ईद की शॉङ्क्षपग का जायजा लें कि वह अपने लिबास पर कितना कुछ खर्च करती हैं। जरा रुक कर सोचें हममें से कई जरूरतमंद लोग दुनिया में मौजूद हैं जिनके पास तन ढकने के लिए कप्रड़ा मौजूद नहीं। ईद-उल-फितर का चांद नजर आते ही मुस्लिम समुदाय में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
खासकर रमजान महीने मे तपती गर्मी और लू के मौसम में रोजा रखने वाले रोजेदार की खुशियों की इंतेहा को बयान कर पाना शब्दों में मुमकिन नहीं। पूरी दुनिया में ईद-उल-फितर हर्षोल्लास से मनायी जाती है। वैसे भी ईद की खुशी रोजेदारों के त्याग, तपस्या और इबादत से जुड़ी है। ईद का सही मायने में हकदार कोई होता है तो वो है रोजेदार। माहे रमजान में रोजा रखने वाले तो दिल से यही चाहते हैं कि मुबारक माह रमजान कभी खत्म न हो।
रमजान को अलविदा करते हुए अनेक रोजेदार उदास भी होते हैं मगर ईद की खुशी उन्हें यह अहसास करवा जाती है कि नेकी की तरफ बढ़ते चलें, बदी-गुनाह से हमेशा बचते रहें। सिवैया इस त्योहार की सबसे जरूरी खाद्य पदार्थ है जिसे सभी बड़े चाव से खाते हैं। ईद के दिन मस्जिदों में सुबह की प्रार्थना से पहले हर मुसलमान का फर्ज है कि वो दान या भिक्षा दे। इस दान को जकात उल-फितर कहते हैं। यह दान दो किलोग्राम कोई भी प्रतिदिन खाने की चीज का हो सकता है, मिसाल के तौर पे, आटा, या फिर उन दो किलोग्रामों का मूल्य भी।
प्रार्थना से पहले यह जकात गरीबों में बाँटा जाता है। इस ईद में मुसलमान 30 दिनों के बाद पहली बार दिन में खाना खाते हैं। इसलामी साल में दो ईदों में से यह एक है (दूसरा ईद उल जुहा या बकरीद कहलाता है). पहला ईद उल-फितर पैगम्बर मुहम्मद ने सन 624 ईसवी में जंग-ए-बदर के बाद मनाया था। मीठी ईद भी कहा जाने वाला यह पर्व खासतौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने और उसकी भाईचारे की सदियों पुरानी परम्परा का वाहक है। इस दिन विभिन्न धर्मों के लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और सेवइयां अमूमन उनकी तल्खी की कड़वाहट को मिठास में बदल देती है।

 

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