बिहार

रोटी, कपड़ा और मकान की तलास में भटक रहे प्रवासी मजदूर

Migrant laborers wandering in bread, cloth and house search

रूपेश रंजन सिन्हा

पटना। कोरोना लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार प्रवासी मजदूरों पर ही पड़ी है। काम धंधा बंद होने से उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है और इसलिए वे बड़ी संख्या में घरों की तरफ कूच कर रहे हैं। राज्य सरकारों की लाख कोशिशों के बावजूद उनका पलायन रुक नहीं रहा है। मजदूर न केवल बस और ट्रेन से अपने गृह राज्य पहुंच रहे हैं बल्कि बड़ी संख्या में लोग पैदल, साइकल से या फिर ट्रक से भी रवाना हुए हैं। राज्य सरकार का कहना है कि देशभर से लाखों कि संख्या में बिहार आये प्रवासी श्रमिक विभिन्न कार्यों में लगे हुए हैं और राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू होने के बाद से अब तक उनमें से कुछ मजदुर ट्रेनों और बसों से अपने घर लौट हैं।

इसमें ट्रक, साइकिल या पैदल अपने घर पहुंचे है। इस हिसाब से देखें तो करीब 20 फीसदी प्रवासी घर पहुंच चुके हैं। अगर पलायन का यह सिलसिला यूं ही जारी रहा तो 30 जून तक 80 फीसदी प्रवासी कामगार अपने घरों में होंगे जिससे रोटी, कपड़ा और मकान की नई चुनौती खड़ी हो जाएगी।देश में प्रवासी मजदूरों के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। लेकिन 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में प्रवासियों की संख्या 45.36 करोड़ है जो देश की कुल आबादी का 37 फीसदी है। इनमें एक राज्य से दूसरे राज्य तथा राज्य के भीतर पलायन करने वाले लोग शामिल हैं।

इनमें से 33 फीसदी मजदूर हैं। इनमें से भी 30 फीसदी कैजुअल वर्कर हैं और 30 फीसदी असंगठित क्षेत्र में नियमित काम करते हैं। प्रोफेसर कुंडू ने 2011 की जनगणना, एनएसएसओ के सर्वेक्षणों और इकनॉमिक सर्वे के आधार पर देश में प्रवासियों की संख्या का अनुमान लगाया है। अगर इनमें रेहड़ी पटरी वालों को जोड़ दिया जाए तो अपने गृह राज्य से बाहर रहने वालों की संख्या करीब 1.2 से 1.8 करोड़ बढ़ जाएगी। लॉकडाउन के कारण रेहड़ी पटरी वालों के सामने भी आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। उत्तर प्रदेश में देश के अन्य हिस्सों से प्रवासी श्रमिकों और कामगारों को लेकर अब तक 1018 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें आ चुकी हैं और इनसे 13 लाख 54 हजार से अधिक प्रवासी कामगार घर लौटे हैं।

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