धर्म - अध्यात्म

कांवर कथा

वैसे तो भगवान शिव का अभिषेक देश के सारे शिव मंदिरों में होता है, लेकिन सावन में कांवर के माध्यम से जलअर्पण का अपूर्व उत्साह सर्वत्र दिखाई पड़ता है। भगवान भोलेनाथ में भरोसा रखने वालों को विश्वास है कि कांवर यात्रा में जहां-जहां से जल भरा जाता है, वह गंगाजी की ही धारा होती है। तभी तो सावन शुरू होते ही इस आस्था और अटूट विश्वास की अनोखी कांवर यात्रा से पूरा वातावरण केशरिया रंग में सराबोर हो जाता है। पूरा माहौल शिवमय हो जाता है। अगर कुछ सुनाई देता है तो वह है हर-हर महादेव की गूंज और बोलबम का नारा।

कुंवारी लड़कियों से लेकर बुजुर्ग तक सभी सावन के महीने में भगवान शिव को प्रसन्न करने में लीन दिखाई देते हैं। कोई पूरे महीने व्रत रखता है तो कोई सोमवार को। लेकिन सबसे महत्पूर्ण आयोजन है कांवरियों की कठिन यात्राएं, जिनका गंतव्य शिव से संबंधित देवालय होते हैं, जहां पहुंचकर कांवरिए शिव का जलाभिषेक करते हैं। भगवान भोलेनाथ का ध्यान जब हम करते हैं तो श्रावण का महीना, रूद्राभिषेक और कांवर का उत्सव आंखों के सामने होता है।

शिव भूतनाथ, पशुपतिनाथ, अमरनाथ आदि सब रूपों में कहीं न कहीं जल, मिट्ïटी, रेत, शिला, फल, वृक्ष के रूप में पूजनीय हैं। जल साक्षात् शिव है तो जल के ही जमे हुए रूप में अमरनाथ हैं। बेल शिववृक्ष है तो मिट्ïटी में पार्थिव लिंग है। गंगाजल, पारद, पाषाण, धतूराफल आदि सबमें शिव की सत्ता मानी गई है। यानी सभी प्राणियों और जड़-जंगम पदार्थों में भूतनाथ पशुपतिनाथ की सुगमता और सुलभता ही उनको देवाधिदेव महादेव सिद्ध करती है।

कांवर दरअसल शिव के इन सभी रूपों को नमन है। कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं। कहा जाता है कि कांधे पर कांवर रखकर बोल बम का नारा लगाते हुए चलना भी काफी पुण्यदायक है। यूपी, बिहार सहित दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान तक में कांवर लाने का प्रचलन है। घरों में भी प्राय: श्रद्धालु शिवालयों में जाकर सावन में शिव का जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक करते हैं।

विराट रूप लेती कांवर यात्रा

ऐसा नहीं है कि कांवर यात्रा कोई नई बात है। यह सिलसिला सालों से चला आ रहा है। फर्क बस इतना है कि पहले इक्का-दुक्का शिवभक्त ही कांवर में जल लाने की हिम्मत जुटा पाते थे, लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों से इनकी संख्या में लगातार वृद्धि होती चली आई है। उत्तर भारत में, विशेष रूप से पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दस वर्षों के भीतर कांवर यात्रा एक महाआयोजन का रूप ले चुकी है। अपनी श्रद्धा के अनुरूप सर्वप्रथम अपनी सामथ्र्य, समय, अपने गंतव्य की दूरी के अनुसार गंगोत्री या हरिद्वार या ऋषिकेश से जल लेने के लिए बस, ट्रेन आदि से लोग पहुंचते हैं। हरिद्वार में तो अनवरत मानव प्रवाह ही रहता है। मानो प्रतिवर्ष सावन माह में कुंभ का मेला हो।

गंगा स्नान के बाद जल भरकर शिवालय तक पैदल यात्रा संपन्न की जाती है। पूरे माह तक चलने वाली इस यात्रा में कांवरिए सैकड़ों किलोमीटर का सफर करके गंगा से जल भरकर लाते हैं और शिव को चढ़ाते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार और झारखंड के देवघर में कांवर यात्रा का खासा महत्व है।

सावन लगते ही सड़कों पर अगर कुछ विशेष होता दिखाई देता है तो वह है कांवर यात्रा ही है। कांवर लाने के लिए शिवभक्त पूरे साल इंतजार करते हैं कि कब वे हरिद्वार या झारखंड के सुल्तानगंज के लिए प्रस्थान करेंगे और कठिन यात्रा पैदल पार करके भगवान भोलेनाथ पर जल चढ़ाएंगे। कुछ लोग तो गंगोत्री तक से भी जल लेकर धाम में चढ़ाते हैं। लाखों की तादाद में कांवरिए सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवर लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं। श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है।

श्रवण कुमार से है कांवर का संबंध

शिव के जलाभिषेक के लिए कांवरियों के कंधों पर कांवर के बांस के दोनों छोर पर गंगाजली रहती है। कांवर की जानकारी उस प्रसंग से प्राप्त होती है, जब श्रवण कुमार अपने नेत्रहीन माता-पिता को कांवर में बैठाकर तीर्थयात्रा के लिए निकले थे। कांवर यात्रा का उल्लेख एक रूपक के तौर पर भी करते हैं।

गंगा शिव की जटाओं से निकलीं। उनका मूल स्रोत विष्णु के पैर हैं। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर विष्णु ने गंगा से जब पृथ्वी पर जाने के लिए कहा तो वह अपने इष्ट के पैर छूती हुई स्वर्ग से पृथ्वी की ओर चलीं। वहां उनके वेग को धारण करने के लिए शिव ने अपनी जटाएं खोल दीं और गंगा को अपने सिर पर धारण किया।

वहां से गंगा सगरपुत्रों का उद्धार करने के लिए बह चलीं। कांवर यात्रा के दौरान कांवरिए वही गंगाजल लेकर अभीष्ट शिवालय तक जाते हैं और शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। शिवमहिम्न स्तोत्र के रचयिता आचार्य पुष्पदंत के अनुसार, यह यात्रा गंगा का शिव के माध्यम से प्रत्यावर्तन है यानी अभीष्ट मनोरथ पूरा होने के बाद उस अनुग्रह को सादर श्रद्धापूर्वक वापस करना। कांवर से गंगाजल ले जाने और अभिषेक द्वारा शिव को सौंपने का अनुष्ठान शिव और गंगा की समवेत आराधना भी है।

कण-कण में शिव

देवभूमि हिमालय को देवताओं का निवास भी कहा गया है। शिव भी इसी क्षेत्र कैलास में कहीं रहते हैं। कम से कम श्रद्धालु जन तो यही मानते हैं कि शिव परमात्मा के रूप में तो सर्वव्यापी हैं, कण कण में विराजमान हैं, पर पार्थिव रूप में वे इसी क्षेत्र में यहीं रहते हैं। उनसे संबंधित पुराण प्रसिद्ध घटनाओं का रंगमंच यही क्षेत्र रहा है।

महाकवि कालिदास ने हिमालय को शिव का प्रतिरूप बताते हुए इसके सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक महत्व को रेखांकित किया है। उनके अनुसार, हिमालय को देखें तो समाधि में बैठे महादेव, बर्फ के समान गौर उनका शरीर, चोटियों से बहते नद, नदी, ग्लेशियर, झरने आदि उनकी जटाएं, रात में चंद्रोदय के समय सिर पर स्थित चंद्रकला, गंगा नदी का धरती पर आता अक्स खुद-ब-खुद दिमाग में उभरता जाता है।

हरिद्वार में परशुराम ने शुरू की कांवर

हरिद्वार में कांवर यात्रा के बारे में कहा जाता है सर्वप्रथम परशुराम कांवर में जल लाकर पुरा महादेव, जो उत्तर प्रदेश के बागपत में हैं, भगवान भोलेनाथ की नियमित पूजा करते थे। वे सावन के प्रत्येक सोमवार को गढ़मुक्तेश्वर से कांवर में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक किया करते थे।

आज भी उसी परंपरा का अनुपालन करते हुए सावन में गढ़मुक्तेश्वर, जिसका वर्तमान नाम ब्रजघाट है, से जल लाकर लाखों लोग भगवान शिव पर चढ़ाकर अपनी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। कहते हैं, भगवान शिव को सावन का सोमवार विशेष रूप से प्रिय है। सावन में भोलेनाथ का गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक करने से उन्हें शीतलता मिलती है। शिव की हरियाली से पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है। खासतौर से सावन में सोमवार को शिव का बेलपत्र, भांग, धतूरे, दूर्वा, आक्खे के पुष्प और लाल कनेर से पूजन करने का प्रावधान है।

इसके अलावा पांच तरह के जो अमृत बताए गए हैं, उनमें दूध, दही, शहद, घी, शर्करा को मिलाकर बनाए गए पंचामृत से भगवान आशुतोष की पूजा कल्याणकारी होती है। शिव को बेलपत्र चढ़ाने के लिए एक दिन पूर्व सायंकाल से पहले तोड़कर रखना चाहिए। सोमवार को बेलपत्र तोड़कर शिव पर चढ़ाया जाना उचित नहीं है। भगवान भोलेनाथ के साथ उनका परिवार, नंदी व परशुराम की पूजा भी श्रावण मास में लाभकारी है। शिव की पूजा से पहले नंदी व परशुराम की पूजा की जानी चाहिए।

उत्तर भारत में भी गंगा किनारे के क्षेत्र में कांवर का बहुत महत्व है। राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोगों के यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहित जो जल लाते थे और प्रसाद के साथ जल देते थे, उन्हें कांवरिए कहते थे। ये लोग गोमुख से जल भरकर रामेश्वरम में ले जाकर भगवान शिव का अभिषेक करते थे।

यह एक प्रचलित परंपरा थी। लगभग छह महीने की पैदल यात्रा करके वहां पहुंचा जाता था। इसका पौराणिक और सामाजिक महत्व है। इससे एक तो हिमालय से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण देश की संस्कृति में शिव का संदेश जाता था। इसके अलावा विभन्न क्षेत्रों की लौकिक और शास्त्रीय परंपराओं के आदान-प्रदान का बोध होता था। हालांकि अब इस परंपरा में परिवर्तन आ गया है। अब लोग गंगा अथवा मुख्य तीर्थों के पास से बहने वाली जल धाराओं से जल भरकर सावन में शिव का जलाभिषेक करते हैं।

बैजनाथ धाम में राम ने किया था जलाभिषेक

झारखंड के देवघर स्थित बैजनाथधाम से जुड़ी कांवर यात्रा के बारे में कहा जाता है कि पहला कांवरिया रावण था। राम ने भी यहां सदाशिव को कांवर चढ़ाई थी। आनंद रामायण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि भगवान राम ने कांवरिया बनकर सुल्तानगंज से जल लिया और देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया।

मान्यता है कि भोलेनाथ कांवर से गंगाजल चढ़ाने से सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं। इसके पीछे कथा है कि जब समुद्रमंथन के बाद 14 रत्नों में विष भी निकला और भोलेनाथ ने उस विष का पान करके दुनिया की रक्षा की। विषपान से उनका कंठ नीला पड़ गया, सो इसी विष के प्रकोप को कम करने के लिए, उसे ठंडा करने के लिए शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाता है, जिससे शिव प्रसन्न होते हैं।

बैजनाथधाम में रावणेश्वर शिव स्थापित हैं। यहां सावन से भादो तक लाखों श्रद्धालु कांवर यात्रा करके इनका जलाभिषेक करते हैं। इस धार्मिक उत्सव की विशेषता यह है कि सभी कांवर यात्री केसरिया रंग के वस्त्र धारण करते हैं और बच्चे-बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष सबको एक ही भाषा में बोल बम के नारे से संबोधित करते हैं। दरभंगा आदि क्षेत्रों के यात्री कांवर के माध्यम से भगवान शिव का अभिषेक बसंत पंचमी पर करते हैं।

आगरा में बटेश्वर, उज्जैन में महाकाल

आगरा जिले के पास बटेश्वर में, जिन्हें ब्रह्मलालजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, शिवलिंग रूप के साथ-साथ पार्वती व गणेश का मूर्ति रूप भी है। सावन में कासगंज से गंगा का जल कांवर में भरकर लाखों की संख्या में कांवरिए यहां पहुचकर जलाभिषेक करते हैं। यहां पर 101 मंदिर स्थापित हैं।

इसके बारे में एक प्राचीन कथा है कि दो मित्र राजाओं ने संकल्प किया कि हमारे पुत्र अथवा कन्या होने पर दोनों का विवाह करेंगे। परंतु दोनों के यहां पुत्रियां हुईं। एक राजा ने यह बात सबसे छिपा ली और विदाई का समय आने पर उस कन्या ने, जिसके पिता ने उसकी बात छुपाई थी, अपने मन में संकल्प किया कि वह यह विवाह नहीं करेगी और अपने प्राण त्याग देगी। उसने यमुना नदी में छलांग लगा दी। जल के बीच में उसे शिव के दर्शन हुए और उसकी समर्पण की भावना को देखकर शिव ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब उसने कहा कि मुझे कन्या से लड़का बना दीजिए तो मेरे पिता की इज्जत बच जाएगी।

इसके लिए भगवान ने उसे निर्देश दिया कि तुम इस नदी के किनारे मंदिर का निर्माण करना। यह मंदिर उसी समय से मौजूद है। कहते हैं कि यहां पर कांवर यात्रा के बाद जल चढ़ाने पर अथवा मनौती करके जल चढ़ाने पर पुत्र की प्राप्ति होती है। इस मंदिर की एक विशेषता यह है कि यहां एक-दो किलो से लेकर 500-700 किलोग्राम तक के घंटे टंगे हुए हैं।

इसी प्रकार उज्जयिनी में महाकाल को जल चढ़ाने से रोग निवृत्ति और दीर्घायु प्राप्त होती है। लाखों यात्री इस समय शिव का जलाभिषेक करते हैं। यहां की विशेषता यह है कि हजारों की संख्या में संन्यासियों के माध्यम से टोली बनाकर कांवर यात्री चलते हैं। यह यात्रा लगभग 15 दिन चलती है। इसी तरह हरिद्वार से जल लेकर दिल्ली, पंजाब आदि में लाखों यात्री जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा श्रावण मास से लेकर शिवरात्रि तक चलती है।

कई प्रकार की होती है कांवर
डाक कांवर : डाक कांवरिया कांवर यात्रा की शुरुआत से शिव के जलाभिषेक तक लगातार चलते रहते हैं, बगैर रुके। शिवधाम तक की यात्रा एक निश्चित समय में तय करते हैं। यह समय अमूमन 24 घंटे के आसपास होता है। इस दौरान शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं तक वर्जित होती हैं।

खड़ी कांवर : कुछ कांवरिए खड़ी कांवर लेकर चलते हैं। इस दौरान उनकी मदद के लिए कोई-न-कोई सहयोगी उनके साथ चलता है। जब वे विश्राम करते हैं तो सहयोगी अपने कंधे पर उनकी कांवर लेकर कांवर को चलने के अंदाज में हिलाते-डुलाते रहते हैं।

दांडी कांवर : ये कांवरिए नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। मतलब कांवर पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से लेट कर नापते हुए यात्रा पूरी करते हैं। यह बेहद मुश्किल होता है और इसमें एक महीने तक का वक्त लग जाता है। इस यात्रा में बिना नहाए कांवर यात्री कांवर को नहीं छूते। तेल, साबुन, कंघी आदि की भी मनाही होती है। यात्रा में शामिल सभी एक-दूसरे को भोला या भोली कहकर बुलाते हैं।

कांवर ले जाने के पीछे अपना-अपना संकल्प होता है। कुछ लोग खड़ी कांवर का संकल्प लेकर चलते हैं, वे पूरी यात्रा में जमीन पर कांवर नहीं रखते। पैरों में पड़े छाले, सूजे हुए पैर, केसरिया बाने में सजे कांवरियों का अनवरत प्रवाह चलता ही रहता है। स्थान-स्थान पर स्वयंसेवी संगठनों द्वारा कांवर सेवा शिविर आयोजित किए जाते हैं, जिनमें निशुल्क भोजन, जल, चिकित्सा सेवा, स्नान विश्राम आदि की व्यवस्था रहती है।

मार्ग में स्थित स्कूलों, धर्मशालाओं, मंदिरों में विश्राम करते हुए ये कांवरधारी रास्ते में पडऩे वाले शिवमंदिरों में पूजा-अर्चना करते हुए नाचते-गाते, बम बम बोल बम की गुंजार के साथ शिवरात्रि यानी श्रावण कृष्णपक्ष त्रयोदशी-चतुर्दशी को जलाभिषेक करते हैं। देश के अन्य स्थानों में भी किसी न किसी रूप में पूरे सावन में विशिष्टï आयोजन होते हैं।

loading...
Loading...

Related Articles