पटनाबिहार

नशा मुक्ति की अनिवार्यता से ही देश व मानव जाति का विकास

प्रियोदित प्रत्यय

पटना । मादक पदार्थों का दुरुपयोग विश्वव्यापी एवं गंभीर  समस्या बनता जा रहा है। इससे पारिवारिक एवं सामाजिक संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस जटिल समस्या  के  निदान के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रयास किए जा रहे हैं। नशीली दवाओं के दुष्परिणाम के प्रति जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष 26 जून को नशीली दवाओं के दुरुपयोग एवं अवैध व्यापार के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। नशीली दवा  की लत इतनी बुरी हो गई है जिसे छुड़ाना भी जटिल समस्या बन गया है।  शराब कोकीन  हेरोइन आदि नशीले पदार्थ की लत के कारण डोपामाइन से मस्तिष्क भर जाता है। डोपामाइन जो आनंद की तीव्र भावना उत्पन्न करता है जिससे ऐसी मानसिक स्थिति पैदा करती है जो नशेड़ी  के अंदर   तनाव  मुक्त आनंद की अनुभूति कराता है। परंतु इसकी लत धीरे-धीरे उसके स्वास्थ्य पर गंभीर एवं प्रतिकूल प्रभाव डालने लगता है जिससे उसकी स्मरण शक्ति    खत्म होने लगती है  एवं उसका शारीरिक संतुलन और कार्यक्षमता भी खत्म होने लगता है। युवाओं में  नशे की लत  चिंता का विषय है जो युवाशक्ति  पर दुष्प्रभाव डाल रही है। नशे की आदत  परिवार घरेलू हिंसा महिलाओं का शारीरिक शोषण बच्चों में खौफ के साथ-साथ अनेक दुर्घटनाओं को अंजाम देती है और नशेड़ी के शरीर में अनेक प्रकार की गंभीर बीमारी को जन्म देती है। नशे की लत ने कई परिवार को आर्थिक रूप से कंगाल बना दिया। इसी कारण लोगों की सुरक्षा एवं कल्याण की प्रतिबद्धता के लिए नारकोटिक ड्रग्स कमीशन के सदस्य देशों ने मादक पदार्थों के खिलाफ पहल किया ताकि लोग स्वास्थ्य शांति सुरक्षा एवं प्रतिष्ठा के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। ड्रग्स का महक कर धूम्रपान कर या इंजेक्शन के रूप में सेवन  किया जाता है।  इसका सेवन करने वाले मानसिक एवं शारीरिक रूप से नशीले पदार्थों पर आश्रित हो जाते हैं। नशे की लत  का कुछ कारण पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश भी है। ड्रग्स के रसायनिक अवयव मस्तिष्क की संचार प्रणाली पर बुरा प्रभाव डालते  जो धीरे-धीरे मस्तिष्क के सामान्य संचार तंत्र को बाधित करते जाते हैं। इसी कारण नशेड़ी का शारीरिक संतुलन बिगड़ने लगता है एवं कार्य क्षमता  खत्म होने लगती है। पारंपरिक एवं गैर पारंपरिक नशीले पदार्थों के दुरुपयोग को रोकना इसीलिए अति अनिवार्य हो गया है। नशा मुक्त समाज की अनिवार्यता को देखते हुए हमारे संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांत के माध्यम से जन स्वास्थ्य में सुधार को सरकार का प्राथमिक कर्तव्य बनाया गया। संविधान के अनुच्छेद   47 में निर्धारित किया गया कि राज्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक   नशीले द्रव एवं मादक दवाओं के चिकित्सा के उपयोग के सिवा उसके सेवन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करेगा। इसी दिशा में दोनों में नियंत्रण लगाने के लिए एक अधिनियम 1985 में बनाया गया जिसमें अवैध पदार्थों के व्यापार के नियंत्रण का कठोर प्रावधान  है। नशे की लत के रोकथाम के लिए एवं उपचार केंद्र के स्थापना के लिए भी अधिकार दिए गए हैं। इस दिशा में लोगों को जागरूक करने उनको सुधारने एवं उनके पुनर्वास के लिए प्रोत्साहित करने वालों को पुरस्कृत करने का भी प्रावधान है।नशा मुक्ति के लिए कई सरकारी एवं गैर सरकारी   संस्थाओं ने उल्लेखनीय काम किए हैं। जिससे इसके नियंत्रण में काफी सफलता मिली है। बिहार राज्य में विशेषकर जीविका की महिला  स्वयं सहायता समूहों ने उत्साहवर्धक प्रयास किए हैं  जिससे गांव गांव में नशाबंदी में उल्लेखनीय सफलता मिली है। आम नागरिकों की भी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि नशा मुक्ति के लिए सतत प्रयास करें जिससे  नशेड़ी ओ के जीवन  मे सकारात्मक सुधार लाई।

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