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चलो सखी जल्दी खेतवा में रोपन धनवा…!

मोहनलालगंज से राहुल सिंह यादव और सरोजिनी नगर से पंकज प्रजापति की रिपोर्ट

-धान की रोपाई में छूमंतर हुआ लॉकडाउन का दर्द
-निराश किसान परिवार संग खेती के कामकाज में जुटा

लखनऊ. आंखों में आंसू और दिल में रोजगार छीनने का दर्द लेकर बड़े-बडेÞ कल-कारखानों से अब अपने-अपने घर-गांव लौटे सैकड़ों मजदूरों को अब किसानों का ही सहारा मिला। कोरोना महामारी के दौर में लॉकडाउन के चलते दो जून की रोटी के जुगाड़ में जो मजदूर या श्रमिक अभी तक इधर-उधर भटक रहा था और उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि कैसे परिवार का पालन पोषण किया जाए…उसे अब उसके गांव की खेत ने ही जाकर सहारा दिया। बीते तीन माह तक इधर-उधर हाथ-पांव मारने के बाद भी रोजगार की संभावना नहीं दिख रही थी। लेकिन इसी बीच मानसून ने एक उम्मीद की किरण जगाई और झमाझम बारिश शुरू हो गई और किसानों ने धान रोपाई का काम शुरू कर दिया… तो मजदूरों के अंदर दो वक्त की रोटी की उम्मीद भी किरणें भी हिलोरे मारनी लगी। राजधानी लखनऊ मुख्यालय से कुछ किमी दूरी पर मोहनलालगंज के ग्रामीण क्षेत्र बलसिंह खेड़ा गांव में धान रोपाई करने के दौरान गाजियाबाद से घर वापस लौटी शकुंतला रावत बताती हंै कि लॉकडाउन होने के चलते मजबूर होकर घर वापस आना पड़ा। ऐसे में अभी तक यहां आने के बाद जो जमा पूंजी थी उसी से खर्चा चल रहा था, मगर धीरे-धीरे जमा पूंजी खर्च हो गई और परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया। बेटे रामदीन रावत ने काफी प्रयास किया लेकिन रोजगार नहीं मिला। परिवार को समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें इसी बीच धान रोपाई का काम शुरू हो गया तो परिवार के साथ मिलकर 150 रुपये प्रति मजदूर धान रोपाई कर रहे हैं ताकि इस महामारी की संकट से उबर सकें।

बिहार के मजदूर नहीं होने से बढ़ी मजदूरी
यहीं के किसान एसके यादव बताते हैं कि कोविड-19 के चलते बिहार के मजदूर नहीं आ पाए हैं जिसके चलते इस बार क्षेत्रीय मजदूर महंगे दाम पर धान रोपाई कर रहे हैं। पिछले वर्ष बिहार के मजदूर को 1800 से 2000 हजार रुपए एकड़ के हिसाब से देने पड़ते थे और अब क्योंकि लॉकडाउन के चलते ऐसे तमाम श्रमिक बिहार को पलायन कर चुके हैं तो मजदूरी इस साल बढ़कर 2500 सौ रुपए से बढ़कर 3000 प्रति एकड़ के हिसाब से क्षेत्रीय मजदूरों को देने पड़ रहे हैं।

सोहर-लोक गीतों के बीच शुरू हुई रोपाई
चलो सखी जल्दी-जल्दी खेतवा में रोपन धनवा, घरवा में सैय्या राह देखत होइहै…इन्हीं लोक गीतों के बीच महिलाएं अब लॉकडाउन के दंश को भूलाकर पूरे उमंग के साथ धान रोपाई में लग गई हैं। खेतों में रोपाई कर रही महिलाओं के गीत व सोहर इस अपार दुख की घड़ी में भी मन-मस्तिष्क को मोहने का काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं इन्हीं गीतों के बीच नन्हे मुन्ने बच्चे भी महिलाओं के बीच में धान रोपाई करते दिख रहे हैं। ऐसे में यह सब देख कर वर्षों पुरानी तस्वीरें ताजा हो जाती है जब किसी भी गांव के किसान का पूरा परिवार मिलजुलकर खेत-खलिहान में काम करते रहें। गांव के कुछ खेतिहरों ने बताया कि धान रोपने से पहले दो बार सूखे में जुताई की जाती है और उसके बाद खेत में पानी भर दिया जाता है। फिर जब मिट्टी दलदल हो जाती है उसके बाद फिर दोबारा से ट्रैक्टर से जुताई की जाती है और ट्रैक्टर मिट्टी में ना फंसे इसके लिए उसके पहियों में चेन लगाई जाती है और फिर उसके बाद समतल करके तब धान रोपाई शुरू की जाती है।

खेतों ने दिये खाली हाथों को काम…!

लॉकडाउन की तमाम प्रकार की झंझावतों के बीच आखिरकार देश-प्रदेश सहित राजधानी और आसपास के भी ग्रामीण इलाकों में मानसून ने अपनी दस्तक दे दी है। इससे किसानों की खरीफ फसलों की बुवाई करने में काफी मदद मिल सकती है। किसानों के मुताबिक इससे समय रहते इस बारिश से फसलों का उत्पादन बढ़ सकता है। साथ ही फसलों की बुवाई के लिए खेती की जमीन भी सुचारू रूप से तैयार होकर फसलों का रकबा भी बढ़ सकता है। सही समय पर मानसून के दस्तक देने के बाद किसान अपने खेतों को लेकर अब काफी सक्रिय हो गए हैं जबकि इससे पहले तकरीबन तीन माह तक खेत-खलिहानों में गेहूं की कटाई हो जाने के बाद खेतों में सन्नाटा छाया हुआ था और किसान के पास कोई काम करने को नहीं रह गया था। सरोजनीनगर ग्रामीण इलाकों के कई किसानों ने बताया कि खरीफ फसलों की बुवाई करने की तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं । हालांकि मानसून की बारिश से धान की रोपाई का कार्य तेजी से शुरू हो गया है । साफ शब्दों में कहा जाए, तो खरीफ की फसल मानसून पर निर्भर होती है। जून महीने के अंतिम दिनों में मानसून ज्यादा सक्रिय होता है । इसके सक्रिय होने से पहले यानी जून के पहले सप्ताह में प्री मानसून होता है । इससे किसानों को अपने खेतों की तैयारी व धान की रोपाई करने में लग जाते है । किसानों ने ट्रैक्टर से जुताई करना शुरू कर दिया है। प्री मानसून की वजह से मुमकिन हो पाया है कि मानसून की बारिश की वजह से किसानों के लिए खेत की जुताई करना आसान हो गया है । जब तक मानसून सक्रिय नहीं होता है, तब तक फसलों की बुवाई समय पर उचित तरीके से नहीं हो पाती। सरोजनीनगर निवासी अनिल वर्मा का कहना कि इस बारिश से फसलों की पैदावार अच्छी होती है और फिर किसानों को अच्छी फसल से अच्छी रकम भी मिल जाती है। यहीं के दूसरे किसान विमलेश का कहना है कि संभावना देखकर यही लगता है कि आगे बारिश तो अच्छी होगी… मगर किसानों को खुलेआम व छुट्टा घूम रहे जानवरों से बस राहत मिल जाये।

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