विचार मित्र

भारत-चीन सीमा पर सियासत का सच

डॉ रामेश्वर मिश्र

आज हर भारतीय नागरिक के मन में चीन को लेकर आक्रोश है, वह किसी भी प्रकार से सरहद पर शहीद हुए अपने सैनिकों की शहादत का बदला लेना चाहता है इसीलिए भारतीय नागरिकों द्वारा चीनी सामानों का बहिष्कार किया जा रहा है और इन बहिष्कारों के माध्यम से हर भारतीय नागरिक सरकार से चीन के प्रति कड़ी नीतियों को लागू करने तथा सीमा सुरक्षा की गारंटी चाहता है। भारत-चीन के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से ही हर भारतीय पूर्वी लद्दाख सीमा की सुरक्षा जानने के लिए चलचित्र मीडिया एवं प्रिंट मीडिया को बार-बार देख रहा है एवं पढ़ रहा है। इन जिज्ञासाओं के बीच उसके मन में भारत-चीन के सम्बन्ध को लेकर रोज नए विचार प्रतिष्फुटित होते हैं क्योंकि हर रोज भारतीय जनमानस राजनैतिक दलों द्वारा हो रहे आरोप-प्रत्यारोप से संसय में पड़ जाता है। आज सरहद की सुरक्षा में कांग्रेस द्वारा उठाये गए सवालों से जनमानस भिज्ञ तो है परन्तु सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के विचारों को आत्मसात करने में उसे कड़ी चुनौती मिल रही है और इस प्रकार सरहद पर आरोप-प्रत्यारोप की जुबानी जंग महज सियासत बनकर रह गयी है जिसमे सरहद की सुरक्षा का अहम विषय ही नजरअंदाज हो गया है।

आज बदलते दौर में कुछ वर्षों से बहुमत द्वारा किये जा रहे कार्यों का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि बहुमत का कार्य विपक्ष की अवहेलना करना मात्र है। इसी क्रम में हम देखे तो पूर्वी लद्दाख घाटी की भारतीय सरहद की सुरक्षा से जुड़ी जानकारी के सम्बन्ध में जब कांग्रेस पार्टी द्वारा कोई भी सवाल किये जाते हैं तो उसके उत्तर में सत्ता पक्ष द्वारा गैर-जिम्मेदाराना जबाब सुनने को मिलता है जैसे-पूर्वी लद्दाख सीमा पर जो हुआ उसके लिए कांग्रेस जिम्मेदार है, लद्दाख घाटी में हुए हिंसक विवाद के लिए नेहरू जिम्मेदार है, गलवान सीमा पर केवल माँ, बेटे और बेटी में भ्रम है, राजीव गाँधी फाउंडेशन के लिए 2008 में कांग्रेस ने चीन से नब्बे लाख प्राप्त किये।

इसी प्रकार के अनेक जबाब सत्ता पक्ष द्वारा कांग्रेस के पूंछे गए सवालों के जबाब में दिए गए जो हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि क्या वर्तमान में यही सत्ता पक्ष के राजनैतिक मूल्य हैं जबकि इससे पहले भी अनेक बार पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान द्वारा नापाक हरकत हुई है और विपक्ष द्वारा सीमा विवादों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के सवाल उठाये गए हैं। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बीच अटल बिहारी वाजपेयी जी के द्वारा संसद भवन के बाहर दिए जा रहे धरनों को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद का विशेष सत्र बुलाया था और विपक्षी दलों को पूर्ण विश्वास में लिया था। 9 नवंबर 1962 को आहूत संसद के विशेष सत्र में अटल बिहारी वाजपेयी ने राज्यसभा में अपने लंबे भाषण के दौरान सरकार की विदेश और रक्षा नीति को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू पर तीखे हमले किए। कांग्रेस के पास उस समय दोनों सदनों में विशाल बहुमत था लेकिन बिना किसी रोक-टोक के वाजपेयी और अन्य विपक्षी नेताओं को सुना गया। किसी ने भी उन्हें देशद्रोही करार नहीं दिया।

सन 2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह सरकार पर निशाना साधते हुए इसी भारतीय जनता पार्टी ने चीन से सीमा विवाद के मुद्दे पर कई राजनैतिक संकल्प पत्र जारी किये थे, इतना ही नही भाजपा के प्रतिनिधि मंडल ने कई बार प्रेस कांफ्रेंस कर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार पर तीखे सवाल उठाये थे। जून 2013 में पणजी में आयोजित हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा ने एक संकल्प पत्र ‘सुरक्षा एवं स्वाभिमान’ पास किया था।

इसी क्रम में 2009 में चीन द्वारा अरुणांचल प्रदेश पर अपना दावा जताने वाले बयान पर भाजपा ने एक संकल्प प्रस्ताव पास कर कहा था कि सरकार को इस पर अंतर्राष्ट्रीय फोरम जाना चाहिए, संकल्प पत्र में यह भी कहा गया था कि चीन द्वारा लद्दाख में घुसपैठ की खबर है, उस समय भाजपा की यह मांग थी कि सरकार देश को विश्वास में ले और स्थिति की सच्चाई बताये।

उस समय भारतीय जनता पार्टी की गतिविधियां यहीं पर नही रुकी उसने अपना एक प्रतिनिधि मंडल भगत सिंह कोश्यारी जो वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं, के नेतृत्व में चीनी सीमा पर भेजा ताकि घुसपैठ का सही पता चल सके और तब सत्ता में रही यूपीए सरकार ने विपक्ष को कभी भ्रामक, गद्दार, तुच्छ और चीन या पाकिस्तान सरीखे देशों का जासूस नही कहा था और न ही सीमा विवाद पर कभी सैनिकों की सहादत पर सियासत की लेकिन आज दौर बदल गया है, पहले भाजपा द्वारा सीमा सुरक्षा पर संकल्प पत्र जारी किये जाते थे और सीमा सुरक्षा से जुड़े तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रतिनिधि मंडल भेजा जाता था परन्तु आज सीमा सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों को सैनिकों की अश्मिता से जोड़ दिया जाता है तथा विपक्ष के लिए अनेक गलत शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो लोकतंत्र की मर्यादा को तार-तार करता है।

सत्ता पक्ष में रह रही भारतीय जनता पार्टी को यह नही भूलना चाहिए कि पांच दसक से अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी को सेना पर आप से ज्यादा विश्वास है और देश की सुरक्षा के साथ कांग्रेस ने कभी समझौता नही किया। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने सेना और किसानो के सम्मान में जय जवान-जय किसान का प्रसिद्ध नारा दिया।

इंदिरा गाँधी ने इन्ही देश के सैनिकों के साथ मिलकर बांग्लादेश जैसे नए राष्ट्र का निर्माण कर दिया। अतः सीमा सुरक्षा को सैनिकों की अश्मिता से जोड़ना भारतीय जनता पार्टी के गैर-जिम्मेदाराना बर्ताव को दर्शाता है तथा सीमा सुरक्षा सम्बन्धी जिज्ञासा को और भी भ्रामक बनाता है।

वर्तमान समय में गलवान घाटी में हुई हिंसा को दो सप्ताह बीत चुके हैं तथा कोर कमाण्डर स्तर की तीन बार वार्ता विफल रही है। सेटेलाइट कंपनी मैक्सर टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेसीडेंट स्टीफेन वुड ने सेटेलाइट तस्वीरों से मिली जानकारी के अनुसार दावा किया कि 29 जून के बाद से गलवान क्षेत्र में चीन द्वारा 423 मीटर भारतीय सीमा में घुसपैठ हुई है जिसमे 16 चीनी टेंट, तिरपाल, एक बड़ा सेल्टर और कम से कम 14 वाहन देखे गए। ऐसे में कांग्रेस द्वारा पूंछे गए सवालों पर गलत जबाबदेही करना सत्ता पक्ष द्वारा राष्ट्र के प्रति गैर-जिम्मेदाराना वर्ताव को दर्शाता है।

सन 2004 से 2014 के बीच भारतीय जनता पार्टी द्वारा सीमा सुरक्षा सम्बन्धी सवाल यदि उस समय सही थे तो आज उसी सीमा सुरक्षा से जुड़े सवालों को पूंछना कैसे गलत है? बेहतर होता कि सरकार 45 वर्ष बाद भारत-चीन सीमा पर हुई हिंसक घटना तथा उससे जुड़ी समस्याओं के निदान एवं नीति के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाती तथा विपक्ष के साथ-साथ देश के आम जनमानस को विश्वास में लेने का प्रयास करती। इसके साथ ही साथ विपक्ष द्वारा भी अपना एक प्रतिनिधि मंडल गलवान घाटी में भेजा गया होता तो मन के संसय और जिज्ञासा को शांत किया जा सकता था जिससे देश के अन्दर राजनैतिक एकता बनी रहती और सीमा सुरक्षा पर हो रही सियासत की गुंजाइश नगण्य होती।

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