धर्म - अध्यात्म

ओंकारेश्वर मंदिर : जहां भोलेनाथ देते हैं साक्षात दर्शन, रोज करने आते हैं शयन

देश के कुछ राज्यों में सावन का महीना किसी त्योहार की तरह मनाया जाता है। मध्य प्रदेश का खंडवा भी उसी में से एक है। जहंा सावन में बड़ी संख्या में शिव भक्त दर्शन व जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। भक्तों के लाखों की संख्या में उमड़े सैलाब से यह तीर्थस्थल और भी अद्भुत, अलौकिक और अकल्पनीय हो जाती है।

देश के 12 ज्योर्तिलंगों में से एक ओंकारेश्वर धाम, तीर्थनगरी के नाम से भी मशहूर है। ओंकारेश्वर, नर्मदा नदी में स्थित एक अद्वितीय द्वीप है। 4 किमी लंबा व 2 किमी चैड़ा यह द्वीप, चारों ओर नर्मदा नदी से घिरा छोटा पहाड़ दिखाई पड़ता है। आकाश से यदि इसे देखा जाये तो यह? चिन्ह के सामान प्रतीत होता है। इसे ओंकारेश्वर कहे जाने के पीछे के कई कारणों में से एक कारण यह भी है। को एक आदियुगीन मौलिक ध्वनि माना जाता है जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है।

माना जाता है कि सावन में ओंकारजी अपने भक्तों का कुशलक्षेम जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं तो स्वयं शिव स्वरूप भगवान ममलेश्वर उनकी अगवानी करने कोटितीर्थ घाट पहुंचते हैं। ओंकार जी के भ्रमण से एक घंटे पहले ममलेश्वर महादेव खुद नौका विहार कर नगरवासियों का हाल जानते और प्रभु की अगुवाई के बाद उन्हें नगर के बारे में जानकारी देते हैं। यही एक ऐसी तीर्थ नगरी है जहंा द्वादश ज्योतिॄलग नौका विहार करते हैं।

कहते है एक बार पर्वतराज ने भगवान शिव की तपस्या की, वहंा और देवता भी मौजूद थे। देवताओं ने भगवान से प्रार्थना किया कि आप यही निवास कीजिए। उनके आग्रह पर भगवान शिव ने निवास करने का फैसला किया। ओम शब्द की उत्पत्ति श्री ब्रह्मा जी के मुख से हुई है।

मान्यता है कि सभी तीर्थों के दर्शन पश्चात ओंकारेश्वर के दर्शन पूजन एवं सभी तीर्थों का जल लाकर अॢपत करने से हर तरह के कष्ट कट जाते है। ओंकारेश्वर ज्योतिॄलग परिसर एक पांच मंजिला इमारत है जिसकी प्रथम मंजिला पर भगवान महाकालेश्वर का मंदिर है। तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव चैथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवी मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर हैं।

मंदिर के पुजारी बताते है कि यहंा पर्वतराज भवध्य ने घाट तपस्या की की घोर तपस्या की थी और उनकी तपस्या के बाद उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना कर कहा कि वह भवध्य क्षेत्र में स्थित निवास करें। उसके बाद भगवान शिव ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। उसके बाद ओमकारेश्वर में भोलेनाथ प्रतिदिन विश्राम करते हैं। पुजररियों का कहना है कि 12 ज्योतिॄलगों में यह एकमात्र ज्योतिॄलग है महादेव शयन करने आते हैं।

भगवान शिव प्रदीप तीनों लोकों में भ्रमण के पश्चात यहंा आकर विश्राम करते हैं। भक्त गण एवं तीर्थ यात्री विशेष रूप से शयन दर्शन के लिए पहुचते हैं। भोलेनाथ के साथ माता पार्वती भी रहती हैं। और रोज रात में यहां सौपड़ खेलते हैं। शयन आरती के बाद ज्योतिॄलग के सामने रोज चौपड़ सजाई जाती है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह कि रात में गर्भ गृह में कोई पङ्क्षरदा भी पर नहीं मार सकता। लेकिन सुबह सब कुछ उल्टे मिलते हैं। चौपड़ बिखरा पड़ा रहता है।

आरती का है खास महत्व

ओंकारेश्वर में स्वयंभू शिवभलग के दर्शन से केवल महादेव के ही नहीं बल्कि मां पार्वती के दर्शनों का भी सौभाग्य मिलता है। ओंकारेश्वर राजा मान्धाता की तपस्थी रही है। महादेव के इस धाम में होने वाली तीन बार की आरती का विशेष महत्व माना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रात की शयन आरती के बाद इस मंदिर में एक अनोखी रस्म होती है। इसमें पूरे विधि-विधान के साथ शिव-पार्वती की आराधना होती है।

शिवभलग के सम्मुख शिव व पार्वती के लिए एक बिछौना लगाया जाता है। शयन पूर्व आमोद हेतु चौपड़ का खेल मड़ा जाता है। भक्तगण यह आरती प्रत्येक रात्री साढ़े 8 बजे देख सकते हैं। यह देश का इकलौता एक ऐसा मंदिर है आज भी तीन राज परिवार की ओर से आरती कराई जाती है। इस आरती को करने के लिए तीनों ही राज परिवारों ने तीन अलग-अलग पुजारी नियुक्त किए हुए है, जो अपने समय की आरती और भोग स्वयं लगा देते हैं।

इसका खर्च राज परिवारों की ओर से उठाया जाता है। यह अनूठी परंपरा कोई नई नहीं है, बल्कि बहुत साल पुरानी है। ओंकारेश्वर प्राचीन मंदिरों जैसे मामलेश्वर मंदिर, सिद्धांत मंदिर और गौरी सोमनाथ मंदिर का घर है। मुख्य भूमि पर 10वीं सदी में निॢमत मामलेश्वर मंदिर वास्तव में बहुत से छोटे मंदिरों का परिसर है। यह नर्मदा नदी के दक्षिण किनारे पर मंधाता मंदिर की विपरीत दिशा में है। मामलेश्वर मंदिर में मौजूद एक प्राचीन संस्कृति लिखित शिलालेख इसके वास्तविक  होने का दावा करता है।

सावन में जलाभिषेक
सावन माह में मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। कहा जाता है कि जो भक्त नर्मदा में स्नान के बाद नर्मदा जल से भरे कंावड़ से जलाभिषेक करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती है। पूरे महीने ढोल नगाड़ों के साथ भक्तों द्वारा जुलूस निकाला जाता है, जिसे डोला या पालकी कहते हैं। यह जुलूस सोमवारी सवारी के नाम से जाना जाता है। इस दौरान भक्त नृत्य करते हुए गुलाल उड़ाते हुए ओम शंभू भोले नाथ का उद्घोष करते हैं। यह बड़ा ही सुंदर दृश्य होता है।

पौराणिक मान्यताएं

ऐसा माना जाता है कि सतयुग में जब श्री राम के पूर्वज, इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धता, नर्मदा स्थित ओंकारेश्वर पर राज करते थे, तब ओंकारेश्वर की चमक अत्यंत तेज थी। इसकी चमक से आश्चर्य चकित होकर नारद ऋषि भगवान् शिव के पास पहुंचे तथा उनसे इसका कारण पूछा। भगवान् शिव ने कहा कि प्रत्येक युग में इस द्वीप का रूप परिवॢतत होगा। सतयुग में यह एक विशाल चमचमाती मणि, त्रेता युग में स्वर्ण का पहाड़, द्वापर युग में तांबे तथा कलयुग में पत्थर होगा।

पत्थर का पहाड़, यह है हमारे कलयुग का ओंकारेश्वर। ओंकारेश्वर एक जागृत द्वीप है। इस द्वीप के वसाहत का भाग शिवपुरी कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि किसी काल में ब्रम्हपुरी नगरी एवं विष्णुपुरी नगरी भी हुआ करती थीं। तीनों मिलकर त्रिपुरी कहलाते थे। शास्त्रों के अनुसार कम से कम 5500 वर्षों से ओंकारेश्वर अनवरत बसा हुआ है। मंदिर का मंडप अत्यंत मनोहारी है। 60 ठोस पत्थर के स्तंभों पर यक्षी आकृतियों उकेरी गयी हैं।

मंदिर के चारों ओर भित्तियों पर देवी-देवताओं के चित्रों की नक्काशी की गयी है। ओंकारेश्वर मंदिर की एक अनोखी बात यह है कि इसमें मुख्य शिवभलग शिखर के नीचे नहीं है, अपितु एक ओर स्थित है। ओंकारेश्वर शिवभलग एक पत्थर के रूप में है जिसके ऊपर निरंतर जल अॢपत होता रहता है। दिन में तीन बार दूध, दही तथा नर्मदा के जल से इसका अभिषेक होता है। शिवभलग के पृष्टभाग भाग में एक आले पर पार्वती की चांदी की प्रतिमा स्थापित है।

मान्धाता महल
इक्ष्वाकु राजा मान्धाता की गद्दी अब भी मंदिर परिसर में देखी जा सकती है। मुख्य मंदिर को चारों ओर से घेरे कई छोटे मंदिर हैं जैसे पंच मुखी हनुमान मंदिर, एक शनि मंदिर एवं द्वारकाधीश को समॢपत एक मंदिर। मंदिर के पीछे बनी सीडिय़ों से पहाड़ी की ओर जाने पर समक्ष एक श्वेत ऊंची भित्त दिखायी पड़ती है। यह ओंकारेश्वर के मान्धाता महल की भित्त है। 80 सीडिय़ां पार कर आप इस महल के प्रवेशद्वार तक पहुँच सकते हैं।

इस महल का एक भाग आम जनता हेतु खुला है। भीतर प्रवेश करते ही आप किसी भी उत्तर भारतीय हवेली के समान, भी स्तंभों से घिरा एक खुला प्रांगण देखेंगे। इसके एक ओर सादा, फिर भी चटक रंगों में रंगा दरबार है। इसकी छत पर सुन्दर गोल आकृति उकेरी है जिसकी नक्काशी पर आप बचे-खुचे  देख सकते हैं। इस दरबार का श्रेष्ठ आकर्षण है, इसके झरोखों से बाहर का दृश्य। बाहर का दृश्य अत्यंत आकर्षक है। से आप ओंकारेश्वर मंदिर को ऊँचाई से देख सकते हैं। वास्तव में यहीं से देखने के पश्चात मंदिर की विशालता का अहसास होता है।

ओंकारेश्वर परिक्रमा
ओंकारेश्वर द्वीप के चारों ओर 16 किमी लंबा परिक्रमा पथ है। परिक्रमा पथ हमारे देश के अधिकतर मंदिरों का अभिन्न अंग है। परिक्रमा पथ कभी गर्भगृह की होती है तो कभी सम्पूर्ण पवित्र क्षेत्र की। कई छोटे-बड़े मंदिर व आश्रम तथा कई बार कुछ गांव भी पवित्र क्षेत्र का भाग होते हैं। भक्तगण मंदिर आकर केवल भगवान् के दर्शन ही नहीं करते, अपितु मंदिर की परिक्रमा भी करते हैं। यह परिक्रमा पथ कई मंदिरों एवं आश्रमों से होकर जाती है जैसे, खेड़ापति हनुमान मंदिर, ओंकारनाथ आश्रम, केदारेश्वर मंदिर, रामकृष्ण मिशन आश्रम, मारकंड आश्रम जिसमें कृष्ण की 12 मीटर ऊंची प्रतिमा है, नर्मदा-कावेरी संगम कुबेर तपस्या कर यक्षों का राजा बना था, ऋण मुक्तेश्वर मंदिर, धर्मराज द्वार, गौरी सोमनाथ मंदिर, पाताली हनुमान मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर एवं शिव की एक विशाल प्रतिमा। एक ममलेश्वर मंदिर या अमलेश्वर मंदिर अथवा अमरेश्वर मंदिर, ओंकारेश्वर के ज्योतिॄलग का आधा भाग है।

यह मंदिर नर्मदा के दक्षिण तट पर, गोमती घाट के समीप, मुख्य भूमि पर स्थापित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन बिना ओंकारेश्वर की तीर्थ यात्रा सम्पूर्ण नहीं होती। ममलेश्वर मंदिर में एक अनोखी प्रथा है, ङ्क्षलगार्चना। इसमें प्रतिदिन हजार बाणङ्क्षलगों की आराधना की जाती है जो मुख्य शिवङ्क्षलग के चारों ओर संकेंद्रित वृत्तों में रखी हुई हैं। इन मंदिरों के अतिरिक्त काशी विश्वनाथ एवं एक विष्णु मंदिर भी है भक्तगण दर्शन के लिये आते हैं। ओंकारेश्वर में ही शंकराचार्य ने वेदान्त में महारथ प्राप्त की थी। ओंकारेश्वर मन्दिर के नीचे एक गुफा में उन्होंने माँ काली का ध्यान कर, तपस्या भी की थी।

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