विचार मित्र

पुलिस क्या गरीब की भौजाई है, कि जो चाहे उसे छेड़ दे !

बद्री प्रसाद सिंह
विकास दूबे ने कानपुर के चौबेपुर थाना क्षेत्र में तीन जुलाई को आठ पुलिस कर्मी की हत्या कर दी,कई घायल हुए।जनता तथा मीडिया में पुलिस की अक्षमता पर मर्सिया पढ़ा गया। सिपाही से SSP तक को लपेटा गया। कल विकास पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, अब विकास की मुठभेड़ को न्याय की हत्या, फर्जी बता कर पुलिस को गाली दी जा रही है।

इस मुठभेड़ का स्वतंत्र साक्षी नहीं है। पुलिस इसे असली तथा विकास के समर्थक इसे प्रायोजित बता रहे हैं।सत्यता जांच बाद ही सामने आएगी।यह जांच पुलिस,सीआईडी, सीबीआई या न्यायिक मजिस्ट्रेटीय कोई भी हो सकती है। जांच परिणाम से पहले पुलिस न दोषी है न निर्दोष। फिर अभी से पुलिस को दोषी घोषित करने का औचित्य क्या है? यदि विकास, मंत्री की थाने में हत्या कर न्यायालय से निर्दोष हो सकता है और न्यायालय को दोषी कहने का साहस किसी में नहीं है तो पुलिस क्या गरीब की भौजाई है कि जो चाहे उसे छेड़ दे। आज हत्या, बलात्कार कर न्यायालय से निर्दोष का प्रमाणपत्र लेकर माननीय विधायक, सांसद, मंत्री बन सकते हैं, लेकिन पुलिस पर तो मुकदमा भी नहीं हुआ और मीडिया पर रुदालियों ने छाती पीटना प्रारम्भ कर दिया।एसी, बंगला में रहने वाले ये बुद्धिजीवी, पूर्व नौकरशाह, वकील अपने आप से पूछें कि यदि इनके सगे संबंधियों की जघन्य हत्या, अपहरण हुआ होता, बहन बेटियों से गैंग रेप हुआ होता तो ये तब भी अपराधी के मारे जाने पर ऐसे ही गला फाड़ते?

पुलिस विकास को एक मुकदमा में गिरफ्तार करने गई थी, उसको मारने नहीं, उसे एक गद्दार दरोगा ने सूचना भी दे दी थी लेकिन वह भागने अथवा गिरफ्तार होने की जगह पुलिसकर्मियों की हत्या करना बेहतर माना। इतना दुस्साहस! क्या आठ जनसेवक की हत्या सामान्य अपराध है?और उसके गिरफ्तार होने पर अदालत कब तक उसे जमानत न देती? जब थाने में मंत्री की हत्या कर वह बेदाग छूट गया तो अंधेरे में पुलिस वालों की हत्या में तो कोई स्वतंत्र गवाह भी नहीं है और पुलिस वालों की गवाही तो न्यायालय मानता ही नहीं। एक गंजेड़ी, शराबी रिक्शावाले की गवाही मान्य, लेकिन पुलिस की नहीं। बिहार में पुलिस की गवाही पर सजा, उ.प्र. में रिहा जबकि कानून एक ही है। बेहमई में १९८१ में फूलन देवी द्वारा १९ व्यक्तियों की हत्या का मुकदमा अभी निचली अदालत में ही चल रहा है, इन आठ शहीदों के परिजनों को न्याय मिलता कि नहीं, यदि मिलता तो कब, पता नहीं। तब तक विकास न जाने कितने और घृणित कार्य करता रहता।

विकास दूबे के मौलिक अधिकार, मानवाधिकार की बात करने वालों,क्या शहीद आठ पुलिस कर्मियों के पुलिस में भर्ती होने पर उनके मानवाधिकार, मौलिक अधिकार समाप्त हो गये थे? ये अधिकार मानव के है, दानव के नहीं। यदि कोई व्यक्ति या समूह देश अथवा समाज के विरुद्ध लगातार अपराध कर रहा है तो क्या कानून के रखवाले उसे बार बार गिरफ्तार कर भेजे और वह छूट कर फिर अपराध करता रहे। संविधान एवं कानून देश और समाज के हित के लिए है, अपराधी के लिए नहीं।जिस कानून से समाज का भला न हो उसे शीघ्र बदल ही देना चाहिए।आज मुकदमें १५-२०वर्ष के पहले निचले कोर्ट में निपटते ही नहीं। फिर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट। तब तक जिन्दा कौमें इन्तजार नहीं करेगी। इसलिए त्वरित न्याय की व्यवस्था होनी ही चाहिए।
विकास दूबे का प्रभाव तथा नेटवर्क देखिए, कैसे पुलिस को चकमा देते हुए महाकाल तक पहुंच कर गिरफ्तारी दी, उसे कानपुर लाते समय मीडिया की गाड़िया उसकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु उसके पीछे चल रही थी। कहते हैं कि इस कार्य में उसने पैसा पानी की तरह बहाया था।
यदि यह मुठभेड़ फर्जी साबित हुई तो संबंधित पुलिस कर्मियों को कठोरतम सजा मिलेगी। वहीं जो अंग्रेजों ने शहीद भगत सिंह, राजगुरु को लाला लाजपतराय पर लाठी चार्ज के दोषी सांडर्स का हत्या पर दी थी,शहीद ऊधम सिंह को जलियांवाला बाग में गोली चलवा कर सैकड़ों निर्दोष भारतीयों की हत्या करवाने वाले डायर की हत्या करने पर दी थी, असफाकउल्लाह, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह, खुदीराम बोस आदि को दी थी।उन सभी ने कानून को तोड़ा था लेकिन जनता ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी माना। पुलिस कर्मी समाज सेवा के लिए है, यदि नि:स्वार्थ समाज सेवा में उन्हें सजा भी हो जाय, तो यह उनके परिजनों को दुख भले ही दे, समाज उनका स्वागत ही करेगा। पुलिस बल बिना किसी स्वार्थ एवं प्रलोभन के सज्जनों की रक्षा हेतु दुष्टों का जो विनाश कर रहा है, वह स्वागत योग्य है। संभव है उन कर दाग लगे, लेकिन कुछ दाग भी अच्छे होते हैं।

लेखक पूर्व आई  जी पुलिस है।

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