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विकास के मरने के बाद खुलने लगे एक के बाद एक राज, गांव के 80 फीसदी लोग थे भयभीत

कानपुर। दिल दहलाने वाले बिकरू कांड और एनकाउंटर में मारे गए विकास दुबे से जुड़े मामलों की जांच करने पहुंची एसआईटी के सामने हिस्ट्रीशीटर के आतंक की कहानी खुलकर सामने आई। विकास के खौफ के साए में जी रहे लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिया तो सामने आकर उन्होंने दर्द बयां किया। कभी न बोलने वाले, रास्ता बदलकर गुजरने वाले लोगों ने अपनी पीड़ा रखी। किसी ने अपनी जमीन पर कब्जे की शिकायत की तो किसी ने थाने में पीटने की जानकारी दी।

घटनास्थल का मुआयना करने के बाद जांच दल ने ग्रामीणों से भी विकास की करतूतों पर चर्चा की। कुछ लोग एसआईटी के सामने पेश किए गए। विकास और उसके गुर्गे नहीं थे तो गांव के लोगों ने खुलकर बात रखी। गफूर ने बताया कि बात 1993-94 की है। उन्होंने राशन नहीं मिलने की शिकायत की थी। विकास ने शिवली थाने बुलवाया। पुलिस की मौजूदगी में उसे थाने के भीतर पीटा गया। सुशील पांडेय ने बताया कि पहले उनके पिता अटल बिहारी पांडेय ग्राम प्रधान हुआ करते थे। विकास ने बूथ कैप्चरिंग कराकर प्रधानी पर कब्जा किया तो अभी तक उसके चंगुल से मुक्त नहीं हो पाई। उसके भय से लोग वोट डालने से कतराते थे।

गोकुल ने बताया कि विकास अपनी सरकार चलाता था। गांव में यदि किसी का विवाद होता था तो गुर्गों को भेजकर घर पर बुलवा लेता था। घर के अपने लोगों से पिटवाता था। बकरुद्दीन ने एसआईटी को बताया कि उसे पट्टे पर जमीन मिली थी। विकास ने अपने खास को कब्जा दिला दिया। तहसील, थाने के चक्कर आज तक लगा रहे हैं लेकिन उसे कब्जा नहीं मिल पाया। राजू ने बताया कि उसने शिवराजपुर की एक एजेंसी से ट्रैक्टर खरीदा था। किस्त नहीं जमा कर पाया तो ट्रैक्टर सरेंडर कर दिया। बदले में 1.30 लाख रुपए मिलने थे लेकिन विकास ने किसी दूसरे को ट्रैक्टर दिलवा दिया। ट्रैक्टर की किस्त आज भी वह भर रहा है।

भावुक हो गया दलित परिवार
जांच दल को देख एक दलित परिवार भावुक हो गया। बताया कि गांव में छोटी सी जनरल मर्चेंट की दुकान है। इसी से पूरे परिवार का भरण-पोषण होता है। विकास की दहशत के चलते त्योहारों पर भी नए कपड़े खरीदने से बचते थे। बीस साल से पूरा परिवार खौफ में जी रहा था। अब ऐसा लग रहा है कि आजादी मिल गई है। एसआईटी ने परिवार के बयान दर्ज कर जांच में इस परिवार को भी शामिल कर लिया।

गांव के 80 फीसदी लोग थे भयभीत
एसआईटी ने गांव में यह जानने का प्रयास किया कि क्या विकास किसी एक वर्ग विशेष पर अत्याचार करता था। जांच में सामने आया कि ऐसा नहीं है। अस्सी लोग विकास के आतंक के शिकार थे। यह पिछले 25-30 सालों से मुंह खोलने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

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