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राजस्थान: गहलोत और सचिन पायलट में सुलह के आसार नहीं

जयपुर। राजस्थान में जो स्थितियां पिछले दो दिनों में बनी हुई हैं, उससे साफ है कि अब सुलह की गुंजाइश नहीं है, बल्कि लड़ाई आरपार की है। सचिन पायलट आगे बढ़ चुके हैं और साफ दिख रहा है कि वे ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह पर हैं। इस सियासी संकट का विश्लेषण करें तो साफ है कि जो हो रहा है, वह अपेक्षित था।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व संकट को भांपने में विफल रहा। मध्य प्रदेश में सरकार गिरने के बाद भी नहीं संभला। सबको पता है कि राजस्थान में सरकार बनने के साथ ही पायलट और गहलोत के बीच कलह शुरू हो गई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि पायलट मुख्यमंत्री बनने के हकदार थे, लेकिन उप मुख्यमंत्री पद ही पा सके। पायलट उप मुख्यमंत्री के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष का पद बचाकर राजस्थान में अपना दमखम दिखाने में तो कामयाब रहे, लेकिन मुख्यमंत्री के साथ तल्खी कम नहीं हुई।

ऐसा एकतरफा नहीं था, बल्कि दोनों तरफ से मौके नहीं चूके गए। विगत 10 जुलाई को तब विचित्र स्थिति पैदा हो गई जब मुख्यमंत्री गहलोत ने भाजपा पर अपनी सरकार गिराने का आरोप लगाया और पुलिस का नोटिस अपने ही उपमुख्यमंत्री को थमा दिया। इस घटना ने अंदरुनी कलह में आखिरी कील ठोक दी और नतीजा आज सामने है।

सचिन का विधायक दल की बैठक में जाने से इनकार करना, गहलोत सरकार को अल्पमत में बताना तथा 27 विधायकों के समर्थन का दावा करना साफ जाहिर करता है कि वे बगावत की राह पर हैं और आरपार की लड़ाई का मन बना चुके हैं। उनकी पत्नी सारा पायलट का यह ट्वीट, ‘बड़े-बड़े जादूगरों के पसीने छूट जाते हैं जब हम दिल्ली का रुख करते हैं..।’ सीधे गहलोत पर हमला है और साबित करता है कि आगे क्या होने वाला है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पायलट के भाजपा में शीर्ष स्तर पर कोई बात पहल हो चुकी है या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया के जरिए वह अब अपनी बात चला रहे हैं? हालांकि सिंधियां उनके मित्र भी हैं तथा इस मुलाकात को निजी भी माना जा सकता है, लेकिन यह भी संभव है कि सिंधिया उनकी मुश्किल घड़ी में सेतु का कार्य करें।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सक्रिय तो हुआ है, लेकिन दो दिन तक दिल्ली में जमे पायलट का शीर्ष नेताओं से मुलाकात नहीं हो पाना क्या यह संकेत नहीं है कि उनके लिए मौके खत्म हो चुके हैं? इसलिए माना जा रहा है कि नेतृत्व की कोशिश अब सरकार बचाने की होगी, पायलट को मनाने की नहीं।

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