मथुरा

एक दीपक उनके लिए भी जलाएं, जिन्होंने राम मंदिर के लिए ’अपना सब कुछ जला दिया

मथुरा। अयोध्या में मंदिर सिर्फ उन लोगों की वजह से नहीं बन रहा जो पर्दे पर दिख रहे हैं। आंदोलन के असल शिल्पी वह हैं जो नेपथ्य में चले गये। एक दीपक छत पर उन लोगों के लिए भी जलाएं जिन्हें राम मंदिर के उल्लास में भुला दिया गया हैं। जो अपना सब कुछ गंवा कर चुप चाप किसी कौने में बैठे हैं। आन्दोलन चाहे आजादी का रहा हो, अथवा किसी और मकसद के लिए। एक गरम दल और दूसरा नरम दल के सहारे ही सफल हो पाया है।

नरम दल अपना वर्चश्व किसी न किसी रूप में कायम करने में सफल हो ही जाता है, मगर गरम दल के नेतृतव के योगदान को वह जगह मिल ही नहीं पाती है, जिसके वह हकदार होते हैं। ऐसा ही कुछ श्रीरामजन्म भूमि आन्दोलन में हुआ। एक दल जो किसी भी तरह से विवादित ढांचे को वहां से हटा कर मंदिर का निर्माण किया जाना सम्भव मानता था वहीं एक खेमा इसे भी हमेशा जन मानस में बनाये रखने के लिए ढांचे के बगल में मंदिर निर्माण का सपना देख रहा था। मगर यह किसी योजना के तहत ही हो पाया और विवादित ढांचे को ढहाने में हजारों कारसेवक काम आ गये। वृन्दावन के सुरेश बघेल ने सबसे पहले ढांचे को हटाने के लिए प्रयास किया था। मगर वह इसमें सफल नहीं हो सका और 28 डायनामाइट की छड़ों के साथ अयोध्या के विवादित ढांचे में पकडा भी गया।

राम मंदिर आंदोलन में शामिल कई लोगों को पद मिले, प्रतिष्ठा मिली और उन्होंने सत्ता का सुख भोगा, लेकिन इसके सच्चे हीरो सुरेश बघेल आज भी एक ठेकेदार के नीचे निजी कंपनी में 6000 रुपये महीने में सीवेज पम्प ऑपरेटर का काम करके मुफलिसी का जीवन जीने को मजबूर हैं। 30 साल पहले 1990 में राम मंदिर आंदोलन में शामिल होकर बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराने की पहली और मजबूत कोशिश करने वाले वृंदावन के हिंदूवादी नेता सुरेश बघेल का नाम शायद ही आज किसी को याद हो। राम मंदिर आंदोलन के ये वही हीरो हैं जिन्होंने आंदोलन की चोट अपने माथे पर ली। इतना ही नहीं उस चोट का दर्द भी पिछले 30 साल से कोर्ट-कचहरी, गिरफ्तारियां, जेल, धमकियां, मुफलिसी और परिवार से दूरी के साथ झेला है। सुरेश बघेल ने बताया कि उन पर एनएसए लगी थी एनएसए जब समाप्त हुई तो टाड़ा लगा दी गई। मैं 10 वीं फेल हूँ। बच्चे अभी जिम्मेदारी उठाने लायक नहीं हैं। अभी छोटे हैं 2008 में सजा हुई थी उस समय लड़की हुई थी, एक लड़का 2010 में तथा दूसरा लड़का 2011 में पैदा हुआ। कष्ट मैंने तो झेला ही मगर परिवार ने भी कम कष्ट नहीं झेला है। मैंने मजदूरी की है।

सुरेश बघेल बताते हैं जब वह जेल में थे परिवार ने भी मजदूरी की किसी तरह से गुजर बसर किया था, कभी खेत पर काम किया कभी बेलदारी करके बच्चों को पाला पोशा है। मैंने रिक्शा भी चलाया मजदूरी भी की है साधु सेवा भी की है गौशालाओं में काम किया है।

मुझे सब कुछ याद है फिल्म की तरह पूरी घटना मेरे सामने है। 1990 में विवादित परिसर में अपने चार पांच साथियों के साथ गया था। उस समय हम शिव सेना के कार्यकर्ता थे। विशेष कर मैं शिव सेना के साथ जेल से छूटने के वाद ही पूरी तरह से जुड़ पाया था। वह कहत हैं मेरे मन में खुशी है कि भारतीय जनता पार्टी आरएसएस या अन्य संगठन उन्होंने मामले को उठाया कि ‘‘रामलला हम आयेगें मंदिर वहीं बनायेंगे’’। तब मैं भी इसी नारे को सुन कर वहां गया था छड मिलने के सवाल पर वह कहते हैं हां सच्चाई तो है ही गिरफ्तार तो मैं हुआ ही था और सजा भी काटी है मैंने चार बार में कारीब पांच साल की सजा और पांच हजार रुपया जुर्माना भी हुआ था। 18 साल मुकदमा चला है मुझ पर, एक ही मुकदमे में चार बार जेल गया हूं मुकदमा अभी हाईकोर्ट में चल रहा है, अपील पर हूँ।

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