पटनाबिहार

स्वतंत्रता दिवस एवं सबल भारत की अपेक्षा

    
प्रियोदित प्रत्यय


स्वतंत्रता दिवस एक राष्ट्रीय पर्व। हमें गर्व है कि हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक हैं। हमारे देश की स्वतंत्रता एवं अखंडता सदैव बनी रहे- यही हम सब की हार्दिक चाहत है। विश्व के मानचित्र पर भारत एक सशक्त एवं विकसित देश बनकर उभरे। हमें इसके लिए सतत प्रयास करना होगा। प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाने के साथ हमें भारत की नीति और सामाजिक एवं आर्थिक गतिविधियों का भी सकारात्मक विश्लेषण करना होगा। तुलनात्मक समीक्षा की भी आवश्यकता है ताकि गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष मे प्रगति के मापदंडों पर हमने क्या हासिल किया है यह हमें पता चल सके। हम अपनी अर्थव्यवस्था को कितना सुदृढ़ की दिशा में आगे बढ़े हैं इससे हम अवगत हो सकें। नागरिकों की आधार भूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में हम कितना सफल हो पाए हैं यह हमें ज्ञात रहे। नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना मजबूत करना भी नितांत आवश्यक है। सबल राष्ट्रीय के निर्माण के लिए जो बुनियादी आवश्यकताएं हैं हमें उसे दृढ़ता से लागू करना होगा। इन सब की पूर्ति के लिए एक रुक जा मैं यहां से कॉपी कर लेते कितना सुदृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। राष्ट्रीय प्रथम की भावना को विकसित करना होगा। निम्न स्तर और संकीर्ण मानसिकता वाली राजनीति को समाप्त किए बिना राष्ट्र के विकास एवं राष्ट्रीयता की सोच का प्रसार संभव नहीं है।
शिक्षा एवं स्वास्थ्य को हमें प्राथमिकता देनी होगी। शिक्षा की वर्तमान सरकारी व्यवस्था औपचारिकता ही दिखती है। सरकारी संसाधनों द्वारा खुले शैक्षणिक संस्थान जनता की अपेक्षा को पूरी करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसी कारण निजी क्षेत्रों के शैक्षणिक संस्थानों का अंबार लग गया है जो शिक्षा का वाणिज्यकरण करने में सफल हुए हैं। ऐसे संस्थानों ने अकूत धन कमाए हैं और सरकार उस पर लगाम लगाने पर असफल रही है। शिक्षा महंगी होती गई और आर्थिक रुप से कमजोर मगर होनहार छात्र उच्च् स्तरीय शिक्षा की दौड़ से बाहर होते रहे हैं। कई सरकारी संस्थानों के शिक्षकों के स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं यदि यथा योग्य शिक्षक नहीं होंगे तो स्तरीय शिक्षा कैसे संभव होगी?
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी अभी तक सरकार की उपलब्धियां निराशाजनक ही रही है । आम जनता मे, कुछ गिने-चुने अस्पतालों छोड़कर, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर विश्वास नहीं है। हालांकि निजी अस्पतालों की कमी नहींं है मगर वह केवल बड़े शहरोंं तक सीमित है और सेवा की भावना से अधिक व्यवसाय पर ज्यादा बल देते रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र जहांं की जनसंख्या की आबादी देश की कुल जनसंख्या का 70% से ज्यादा है वहां स्वास्थ्य व्यवस्था नगण्य हैं। सरकार की स्वास्थ्य के प्रति उदासीन रवया बहुत सोचनीय है। सरकारी चिकित्सकों एवं अन्य स्टाफ और संसाधनों के अपेक्षाकृत भारी कमी है। इस दिशा में सरकार को तत्परता के साथ सकारात्मक कदम उठाना होगा।
 
 किसानों के साथ सरकार का रवैया उत्साहवर्धक नहीं रहा है। सरकार किसानों की बात सदैव करती रही है परंतु धरातल पर किसानों के हित संबंधी यथा योग्य सरकारी सहायता नहीं पहुंच पाई है। खाद बीज और सिंचाई के संसाधनों की कमी अभी भी बनी हुई है।  तपती दुपहरिया जमा देने वाली ठंड और मूसलाधार बारिश की परवाह किए बगैर खेतों में लगे रहने वाले किसान को प्रकृति का मार भी झेलना पड़ता रहा है। सुखाड़ और बाढ़ से देश के अधिकांश किसान अधिकतर परेशान रहते हैं और उस पर यदि यथा समय उन्हें सरकारी मदद ना मिले तो वह टूट जाते हैं जिसके कारण उन्हें मानसिक पीड़ा होती है और वह आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। सरकार को किसानों का जो कि पूरे देश के अन्नदाता है के बारे में गंभीरता से सोचना होगा और उन्हें आर्थिक सुरक्षा देनी होगी।
 
देश में जातिवादी एवं धार्मिक संकीर्णता भाषा के प्रति द्वेष और क्षेत्रवाद की सोच ने कई बार ऐसे  उन्माद को जन्म दिया जिससे देश को भारी आर्थिक एवं सामाजिक क्षति का सामना करते रहना पड़ा है । आजादी के 7 दशक बीतने के बाद भी महिलाएं सुरक्षित नहीं है। महिलाएं घर और बाहर दोनों जगह असुरक्षित है। अनेक बार महिलाओं के साथ ऐसे घृणित अपराध हुए हैं जिससे हम सब को शर्मिंदा होना पड़ा है। हमें राष्ट्रीय विरोधी एवं असामाजिक तत्वों के साथ सख्ती से निपटना होगा ताकि हमारे देश की एकता और अखंडता एवं प्रतिष्ठा पर कोई आंच ना आए। 
 जब भारत स्वतंत्र हुआ था तब हमारे देश की आबादी 33 करोड़ थी। बीते 70 वर्षों में 1 अरब आबादी की वृद्धि हुई ।  
भौगोलिक दृष्टि से भी देखें तो भारत क्षेत्रफल में रूस, कनाडा,संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील से  आधे से भी कम है परंतु आबादी इन देशों से  3 गुना से भी ज्यादा है। चीन भी क्षेत्रफल मे दोगुना से ज्यादा है और आबादी महज 20 से 30 करोड़ ज्यादा है इससे भी हम समझ सकते हैं कि भारत के उपलब्ध संसाधनों पर जनसंख्या का कितना दबाव है। अतः विकास की गति अगर तेज करनी है तो जनसंख्या नियंत्रण कानून को लाना नितांत जरूरी है। अन्यथा हम विकास की कल्पना नहीं कर सकते बल्कि हमें गतिरोध का सामना करना पड़ेगा।
हमारे देश के नागरिकों का कर्तव्य है कि वह अपने उत्तरदायित्व के प्रति संवेदनशील हो। राष्ट्रीय की आवश्यकता पर ज्यादा बल दे और निहित स्वार्थों का परित्याग करें। सरकारी नौकरियों पर ही निर्भर न रहकर स्वयं भी निजी रोजगार के प्रति रुझान अपने अंदर पैदा करें जिससे राष्ट्रीय की आर्थिक गतिविधि को बल मिले और वह भी आत्मनिर्भर बने इससे उनके अंदर आत्म बल का सृजन भी होगा और देश भी विकास की दिशा में आगे बढ़ेगा। हम सब का सामूहिक एवं नैतिक प्रयास से ही हमारे स्वतंत्र राष्ट्र और सुदृढ़ बनेगा और यही राष्ट्र की अपने नागरिकों से अपेक्षा रहती है।
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