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इलाहाबाद से.. 41 वर्ष पूर्व हुई थी नुक्कड़ नाटकों की शुरूआत

विनय राज तिवारी

वो सन 1979 के शुरूआती दिन थे जब इलाहाबद विश्विद्यालय के वामपंथी छात्र संगठनों के कुछ उत्साही सदस्यों ने इलाहाबद में नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत की. यह बात अलग है कि उनकी यह छोटी सी पहल उस समय कोलकाता से निकलने वाली साप्ताहिक हिंदी पत्रिका “रविवार”के एक छोटे से कोने में छोटी सी जगह पाने के अलावा किसी और समाचारपत्र या पत्रिका के ध्यान में न आ सकी. इलाहबाद के नाटक के इतिहास के पन्नों में दर्ज हो नहीं हो सकी, वजह शायद उन छात्रों में प्रचार को लेकर अपेक्षित चेतना की कमी भी हो सकती है. खैर. संयोगवश यह नाचीज़ भी इस छोटी सी पहल का हिस्सा रहा था. लगभग 40 वर्षों तक पत्रकारिता करने और 10 वर्षों तक आकाशवाणी इलाहाबाद का संवाददाता रहने के बाद भी मैं ने इसे अब से पहले उजागर करने का कोई प्रयास तक नहीं किया पता नहीं क्यों? शायद किसी अनजाने डर या संकोच की वजह से.

बात तब की है जब इमेरजेंसी के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को हराकर सत्ता में आई जनता पार्टी का शासन था. स्वर्गीय मोरारजी देसाई देश के प्रधानमत्री हुआ करते थे. इमरजेंसी में कांग्रेस सरकार का साथ देनेवाली सीपीआई थोड़ी पस्त थी और उस दौरान कांग्रेस का विरोध और नए परिवेश में जनता पार्टी सरकार का साथ देने की वजह से सीपीआई(एम्}के हौसले बुलंद थे. किन्तु, चूंकि जनता पार्टी की सरकार ‘बुर्जुवापरस्त” नीतियों पर चल रही थी और इस पार्टी में मौजूद आरएसएस-जनसंघ जैसी “सांप्रदायिक” शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा था, दोनों वामपंथी पार्टियों की एकता या परस्पर सहयोग बढ़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किये जा रहे थे. ऐसे में आपसी दूरी को कम करने के लिए नाटकों को भी एक महत्त्वपूर्ण माध्यम समझा गया।

हिन्दुस्तानी अकेडमी के सामने स्थित बाल भारती स्कूल के कर्ताधर्ता बख्त परिवार की बेटी अतिया बख्त तब नयी दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से पढ़कर(या पढ़ते हुए) घर आई हुई थीं. तब दिल्ली से ही आये सीपीआईएमएल समर्थक रवि श्रीवस्तव और निशा श्रीवास्तव ने अतिया बख्त के साथ मिल हमसे संपर्क किया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के ज़रिये समाज में ” जागरूकता ” फैलाने और वामपंथी एकता को मज़बूत करने का प्रस्ताव दिया. इस छोटी सी पहल में सीपीआई के संगठन एआईएसऍफ़ और सीपीआईएम् के संगठन एसऍफ़आई के सदस्यों ने इस प्रस्ताव को मान लिया. तय हुआ कि क्रन्तिकारी कवि स्वर्गीय गोरख पाण्डेय के भोजपुरी गीतों के गायन के साथ डॉ असगर वजाहत के लिखे नुक्कड़ नाटक “ऑन ड्यूटी उर्फ़ हर वर्दी के नीचे एक किसान है “का जिले के ग्रामीण इलाकों में मंचन किया जाय .इसमें मुख्य कलाकारों में मजदूर, के रूप में पीसीबी हॉस्टल के व्यासजी (अवकाशप्राप्त आईएएस,बिहार), दरोगा के रूप में ए एन झा हॉस्टल के विनोद जोशी और सिपाही के केंद्रीय चरित्र में हिन्दू हॉस्टल में रह रहे मुझे भाग लेना था. भाव भंगिमा के साथ गीत गाने वालों में अन्य साथियों के अलावा हम सबके बड़े भाई उर्मिलेश (वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली) और स्वर्गीय सुनीत सिंह (पूर्व प्रभारी, गोविन्द बल्लभ पन्त समाज विज्ञान संस्थान, झूंसी) और अतिया बख्त के भाई मेहंदी बख्त थे.

हम सब तब बाल भारती स्कूल की चारदीवारी के भीतर लेकिन सड़क से सटे ऊंचे और खुले मंच पर हर दिन तीसरे पहर अपने कार्यक्रम की तैयारी यानि प्रैक्टिस किया करते थे. उस समय रास्ते से गुज़रते सैकड़ों लोग रुक कर देर तक हमारी यह तैयारी देखा करते थे. हमने तब सिरसा स्कूल, मेजा तहसील, कोरांव और नारीबारी चौराहे पर किसानों की सभाओं में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किये. एक घंटे तक चलनेवाले हमारे कार्यक्रम को खूब पसंद किया जाता था. हमारे पास तब और जगहों से भी प्रस्ताव आया करते थे कार्यक्रम करने के लिए. लेकिन, पढ़ाई की व्यस्तता और वामपंथी दलों की स्थानीय इकाइयों से कोई भी वित्तीय सहयोग न मिल पाने कि वजह से हम इस पहल को दूर तक नहीं ले जा सके.

इस सबका सबसे अधिक उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि हममें से कोई भी नाटकीय रुझान (APTITUDE)का व्यक्ति नहीं था .न ही किसी ने कभी नाटक में भाग लिया था. लेकिन, यह बहन अतिया बख्त की कुशल निर्देशन कला ही थी जिसने हम लोगों जैसे “अनाटकीय”(UNDRAMATIC) व्यक्तियों से भी सराहनीय काम करवा लिया था.

 

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