Monday, October 19, 2020 at 1:50 AM

बिहार चुनाव: लोक जनशक्ति पार्टी फिलहाल जदयू और भाजपा के लिए सिरदर्द!

पटना। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और सहयोगियों के बीच सीटों के बंटवारे की गुत्थी अब तक सुलझी नही है। खासतौर से सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी फिलहाल जदयू और भाजपा के लिए सिरदर्द है।

जदयू अध्यक्ष और बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने तो लोजपा से सीधे सीधे पल्ला झाड़ कर विवाद की गेंद भाजपा के पाले में डाल दी है। हालांकि राज्य का सियासी और  दलित वोट बैंक का गणित ऐसा है  कि जिसमें राजग के लिए लोजपा से किनारा करना आसान नहीं होगा।
चुनावी समीकरणों में एक दूसरे को मात देने के लिए एनडीए और विपक्षी महागठबंधन दोनों के निगाहें दलित बिरादरी पर हैं। इस बिरादरी के सियासी महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के मतदाताओं में इस वर्ग की हिस्सेदारी 16 फीसदी है।
एनडीए ने इसमें सेंधमारी के लिए इस बिरादरी के कद्दावर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी और श्याम रजक की जदयू में घर वापसी कराई है।

लोजपा अहम क्यों
लोजपा प्रमुख पासवान की दलित बिरादरी में अच्छी पैठ रही है। खराब परिस्थितियों में भी लोजपा को विधानसभा और लोकसभा चुनाव में औसतन छह से 11 फीसदी वोट हासिल होते रहे हैं। अहम तथ्य यह है वर्तमान में पासवान बेहद अस्वस्थ हैं। इससे चिराग के प्रति हमदर्दी है। ऐसे में दलित बिरादरी में सहानुभूति का ज्वार पैदा हो सकता है। यदि रादग ने नाता तोड़ा तो दलितों की नाराजगी महंगी पड़ सकती है।

क्या है विवाद
दरअसल विवाद की जदयू और भाजपा की महत्वाकांक्षा है। जदयू हर हाल में राज्य की सियासत में बड़ा भाई बने रहना चाहता है। जबकि भाजपा इस चुनाव में महाराष्ट्र की तर्ज पर बड़ा भाई बनने की व्यापक संभावना देख रही है। भाजपा की कोशिश खुद और जदयू को सौ सौ की संख्या में बराबर सीटों पर लड़ने के लिए राजी करना है। ऐसे में बाकी बची 43 सीटों में से बड़ा हिस्सा लोजपा के खाते में जाएगा। ऐसे में अगर भाजपा जदयू से सीटें जीतीं तो गठबंधन में उसके बड़े भाई होने का दावा मजबूत होगा।

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