Saturday, October 17, 2020 at 4:53 PM

मां दुर्गा में ही निहित है सृष्टि की अनंत शक्ति

हम यह मानते हैं कि सारी सृष्टि दैवीय विधान के अंतर्गत चलती है। उसे वेदों की भाषा में ऋतु का नियम कहते हैं। भौतिकवादी लोग उसे प्रकृति के नियम कह सकते हैं। सृष्टि ना तो अनियमित है, ना ही अराजक। दैवीय विधान के अनुसार सृष्टि में सदा ही विभिन्न प्रकार की राक्षसी शक्तियों में संघर्ष चलता रहता है। अंतत: विजयश्री दैवीय षक्तियों की ही होती है। भगवत गीता में श्रीकृष्ण ने दैवीय शक्तियों को प्रकट कर अप्राकृतिक विराट रूप दिखाया और महाकाल के माध्यम से कौरव सेनाओं का संहार होते हुए दिखाया। कोरोना भी एक राक्षसी प्रवृत्ति की आपदा है, इसे भी दैवीय षक्तियों से ही खत्म किया जा सकता है।

भारत में नवरात्रि एक बड़ा उत्सव है। इस उत्सव में देवी की साधना और अध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। पूरे नौ दिन शक्ति की आराधना में भक्ति की रसधारा बहती है। अनीति के अंधकार पर प्रकाश की खोज होती है। दंभ की देह पर चेतना की ललकार होती है। सत्कर्म का सत्कार और दुष्कर्म का दुत्कार होता है। दुर्गा यानी परमात्मा की वह शक्ति, जो स्थिर और गतिमान है, लेकिन संतुलित भी है। इसीलिए इस उत्सव में जगत जननी एवं राक्षसी दानवों की संहारक मां दुर्गा की पूजन की जाती है। कोरोना भी एक दानवी राक्षस है, जो लोगों की जान ले रहा है, सारे गतिविधियों को रोके रखा है।

ऐसे में अगर इस नवरात्र में मां दुर्गा की आह्वान करें, दुर्गा षप्तसती का पाठ करे और विधि विधान से उनके बीज मंत्र ऊं ह्रीं दुं दुर्गायै नम:, का जाप करें तो कोरोना जैसे दानवी राक्षस को हराया जा सकता है। वैसे भी सनातन धर्म में नवरात्र की प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध है। देवी दुर्गा के जो भी नौ रुप हैं, वे उनके शक्ति वैविध्य का ही विस्तार है। सही अर्थो में नवरात्र शक्ति की पूजा का महापर्व हैं, राक्षसी प्रवृत्तियों के संहार का पर्व है।

चूकि चैत्र नवरात्र प्रभु राम के जन्मोत्सव से जुड़ी है और शारदीय नवरात्र मां से शक्ति प्राप्त करके दुष्ट रावण का अंत करने से। इसीलिए इसमें शक्तियों को जगाने का आह्वान है। ताकि हम संकटों, रोगों, दुश्मनों, आपदाओं का सामना कर सकें और उनसे हमारा बचाव हो सके। नवरात्र में श्रद्धालु उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन और योग साधना करते हैं। इन नौ दिनों देवी दर्शन मात्र से कष्ट दूर होते हैं। देवी पुराण के अनुसार मां दुर्गा आदि शक्ति है और सृष्टि के आरंभ में जीवों की उत्पत्ति उन्हीं की कृपा से संभव हुई है। सभी देवी-देवता इस समय मां दुर्गा की आराधना और उनकी स्तुति करते हैं। शारदीय नवरात्र अपनी शक्तियों को जाग्रत करने और सदवृत्तियों के विकास के लिए उपयुक्त समय है।

मां दुर्गा की कृपा और उनकी आराधना करके हम उनसे अपने लिए शक्ति मांग सकते हैं। इस समय हम अपने कुलदेवताओं से भी मार्ग की विपत्तियों को हरने की प्रार्थना करते हैं। अपने कुल देवताओं के स्मरण और पूजन के लिए भी यह उपयुक्त तिथि बताई गई है। देवी चूंकि मां है और मां अपने बच्चों की प्रार्थना तत्काल सुन लेती है, इसीलिए दुर्गा के नौ रुपों की आराधना की जाती है। इससे अंत:करण शुद्ध तो होता ही है प्रार्थना भी प्राणवंत हो जाती है। शक्ति के साथ मर्यादा का अनुष्ठान और मां के सम्मान का संविधान भी है नवरात्र। यह शक्ति प्रतीक है पराक्रम का और मर्यादा पर्याय है अनुशासन का। शक्ति के प्रतीक के रुप में नवरात्र का अर्थ यह भी है कि विकारों के बीच विनाश के लिए हम पराक्रमी बनें, किन्तु दंभ और दुर्गुणों नाश करने से प्राप्त होने वाली ख्याति से फूलकर दंभी और अंहकारी न हो जाएं।

अर्थात शक्ति के प्रतीक नवरात्र की पूर्णता के साथ या बाद चाहे चैत नवरात्र हो या शारदीय नवरात्र राम का पर्व रामनवमी व विजयादशमी जरुर आता है। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। शक्ति की आराधना का पर्व नवरात्र के साथ या बाद राम के पर्व का आना इसका प्रतीक है कि शक्ति के शिखर पर पहुंचकर भी हम मर्यादा का ध्यान रखे और संयम न खोएं। इसका यह भी अर्थ है कि राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के साथ बेशक परमाणु शक्ति का विस्तार करें लेकिन उसका दुरुपयोग न करें अर्थात अमर्यादित व्यावहार न करें। इसके लिए जरुरी है कि देवी दुर्गा की प्रतिमा को स्वच्छ जल से स्नान कराएं। इसके बाद वस्त्र अॢपत करें। फूल चढ़ाएं। अन्य पूजन सामग्री अॢपत करें।

माता को लाल चुनरी चढ़ाएं। नारियल अॢपत करें। घर में बने हलवे का भोग लगाएं। माता के सामने धूप-दीप जलाएं। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। दुर्गा सप्तशती के पाठ में समय अधिक लगता है। अगर आपके पास समय कम है तो दुं दुर्गायै नम: मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें। मंत्र जाप रुद्राक्ष की माला की मदद से करना चाहिए। पूजा में माता को फलों का भोग लगाएं और पूजा के बाद फलों का वितरण करें। तांबे के पात्र से सूर्य को जल चढ़ाएं।

सकारात्मक उर्जा को प्रबल के लिये घंटी बजाए। क्योंकि जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल में काफी दूर तक जाता है। इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी कीटाणु व विषाणु आदि नष्ट हो जाते हैं, जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। जब घंटी, थाली व ताली सकारात्मक उर्जा को प्रबल करने के लिए व जागरूक करने के लिए बजाई जाती है। हथेलियों में सभी ग्रह होते है, ताली बजाकर सभी ग्रहों की सकारात्मकता ली जाती है। वहीं देवालयों में घंटी इसलिए बजाई जाती है कि ताकि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में सकारात्मकता फैले।
ज्योतिषाचार्यों की मानें तो धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई थी, उनमें से एक शंख भी था।

माना जाता है कि शंख से घर में सुख-समृद्धि आती है। सांस संबंधी और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों में शंख बजाना बेहद फायदेमंद होता है। क्योंकि शंख बजाने से $फेफड़ों की एक्सरसाइज होती है, लेकिन आसपास के क्षेत्र में उत्साह और ऊर्जा बन जाती है। जो किसी भी नेगेटिव एनर्जी या वायरसनुमा दुश्मन से लडऩे के लिए हमारे अंदर चेतना जागृत करती है। हमारे शरीर के 29 एक्यूप्रेशर पॉइंटस हमारे हाथों में होते है।

प्रेशर पॉइंट को दबाने से संबंधित अंग तक रक्त और ऑक्सीजन का संचार अच्छे से होने लगता है। एक्यूप्रेशर के अनुसार इन सभी दबाव भबदु को सही तरीके से दबाने का सबसे सहज तरीका है ताली। हथेली पर दबाव तभी अच्छा बनता है जब ताली बजाते हुए हाथ लाल हो जाए, शरीर से पसीना आने लगे। इससे आंतरिक अंगों में ऊर्जा भर जाती है और सभी अंग सही ढंग से कार्य करने लग जाते है। इन दिनों तक घर का बना हुआ भोग ही माता रानी को अॢपत करना चाहिए, एवं संभव न हो तो दूध व फलों का भोग लगा भी सकते हैं। दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य पारायण, रामायण या अपने इष्ट देव करने, से जीवन में उत्कृष्ट प्रगति, समृद्धि और सफलता मिलती है। इसलिए घी का अखण्ड दीपक अवश्य जलाना चाहिए।

नित्य हवन में घी, गूगल, लोभान, कपूर, चावल, शकर जौ, तिल मिलाकर हवन करें। रोज सुबह उठते ही सबसे पहले हाथों के दर्शन करना चाहिए। इसे करदर्शन कहते हैं। इस दौरान ये मंत्र बोलें- कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती। करमूले तू गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम्ï।। इस मंत्र से दिन की शुरुआत शुभ होती है। नहाते समय स्नान मंत्र का जाप करना चाहिए। ये मंत्र है गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे भसधु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु।। इस मंत्र के जाप से घर पर तीर्थ स्नान का पुण्य मिल सकता है। स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं और ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जाप करें। सूर्य को जल चढ़ाने के लिए तांबे के लोटे का उपयोग करना चाहिए।

नवमी पर घर के आसपास की छोटी कन्याओं की पूजा करें। कन्याओं को घर बुलाएं और भोजन कराएं। भोजन के बाद कन्याओं को दक्षिणा दें। वस्त्र दें। छोटी कन्याओं को देवी मां का स्वरूप माना गया है। इसी वजह से नवरात्रि में इनकी पूजा करने की परंपरा प्रचलित है। मंत्रों का जाप किसी ब्राह्मण की मदद से भी करवा सकते हैं। ऊं ह्रीं दुं दुर्गायै नम:। इस मंत्र का जाप करने से सभी बाधाओं से मुक्ति मिल सकती है। सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके, शरंयेत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते। इस मंत्र करने से देवी मां अपने भक्तों का कल्याण करती हैं। ऊँ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।। इस मंत्र के जाप से बड़ी-बड़ी समस्याएं भी खत्म हो सकती हैं।

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै। इस मंत्र का जाप मां चामुंडा की कृपा पाने के लिए किया जाता है।

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