Tuesday, December 1, 2020 at 4:39 AM

अद्वितीय है भारतीय भौतिकवाद

 

हृदयनारायण दीक्षित
आईपीएन। भारतीय भौतिकवाद अद्वितीय है। विदेशी विद्वानों ने भारतीय भौतिकवाद की उपेक्षा की है। ऋग्वेद प्रत्यक्ष भौतिकवाद के वैज्ञानिक सूत्रों से भरापूरा है। वैदिक पूर्वज 100 वर्ष का स्वस्थ जीवन चाहते थे। उन्होंने मनुष्य और प्रकृति का गहन अध्ययन किया। सरल सुबोध आयुर्विज्ञान गढ़ा। अथर्ववेद के तमाम सूक्तों में आयुर्विज्ञान की झांकी है। चरक संहिता व सुश्रुत संहिता आयुर्विज्ञान के महान ग्रंथ हैं। आयुर्वेद के विद्यार्थियों को संदेश है कि अथर्ववेद आयुर्वेद का प्रमुख वेद है। भारतीय चिन्तन में वैज्ञानिक भौतिकवाद की अनेक धाराएं थीं। लेकिन विदेशी विद्वानों ने समूचे भारतीय चिन्तन को भाववादी बताया। प्राक् भारतीय विज्ञान की उपेक्षा हुई। निस्संदेह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन दोनो के अनुभवी लोग आयुर्वेद की ओर रूख कर चुके हैं। आयुर्वेद का प्रभाव बढ़ा है। आयुर्वेदिक औषधियों की मांग बढ़ी है। रोग बढ़े हैं। आधुनिक चिकित्सा महंगी है। प्राचीन काल में प्रदूषणजनित रोग नहीं थे। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ ‘चरक संहिता’ के अनुसार हजारों बरस पहले रोग बढ़े। ऋषियों ने हिमालय के सुंदर स्थान में सभा बुलाई। रोगों की वृद्धि पर चर्चा हुई। तय हुआ कि भरद्वाज इन्द्र से रोग दूर करने की जानकारी करें। इन्द्र ज्ञात इतिहास के पात्र नहीं हैं। वे प्रकृति की शक्ति हैं। अर्थ हुआ कि भरद्वाज तमाम विद्वानों से ज्ञान लेकर सभा को बताएं। भरद्वाज ने आयुर्वेद का ज्ञान आत्रेय को बताया और आत्रेय ने अग्निवेश को। चरक संहिता व सुश्रुत के विवेचन में आयुर्विज्ञान की ठोस जानकारी है।
सुंदर स्वास्थ्य आदिम अभिलाषा है। दीर्घायु और स्वास्थ्य को लेकर भारत में बड़ा गहन चिंतन और शोध हुआ था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में दीर्घ आयु और स्वस्थ जीवन विधायी मूल्य नहीं हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान का जोर स्वस्थ जीवन और दीर्घ आयु पर था। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की गति रोगरहित जीवन तक सीमित है। रोगरहित जीवन और स्वास्थ्य में आधारभूत अंतर हैं। मैं अपना उदाहरण दे सकता हूं। मैं 70 वर्ष पार कर गया हूं। कोई रोग नहीं। रक्तचाप, रक्त शर्करा सामान्य हैं। पूर्णतया रोगरहित हूं लेकिन स्वस्थ नहीं हूं। स्वस्थ का अर्थ देहरहित होने का सुख अनुभव है। अपने दायित्वों का सक्रिय निर्वहन करते हुए शरीर जब कब ध्यानाकर्षण करता है। वह जीर्ण होने के संकेत देता है। जीवन वीणा में संगीत नहीं उगता। क्या ऐसे जीवन को स्वास्थ्पूर्ण कहेंगे? आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ऐसे प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं लेकिन प्राचीन भारतीय आयुर्विज्ञान में ऐसे ही प्रश्नों से मुठभेड़ की गई है। पूर्वजों ने इस विज्ञान को आयुर्वेद कहा था। इसका सीधा अर्थ हुआ – आयु का वेद। नरेन्द्र मोदी सरकार ने इसी की प्रतिष्ठा के लिए पीछे सप्ताह राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया है। उ0प्र0 की राजधानी के मेडिकल कालेज में सुंदर कार्यक्रम था। कुछ बातें मैंने कहीं। अनेक बातें सुनने को मिलीं।
आयुर्वेद प्राचीन भौतिक विज्ञान है। इसका अध्ययन जनसामान्य के लिए भी मजेदार है। भारत में चिकित्सा विज्ञान की प्राचीन परंपरा थी। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में एक पूरा सूक्त आयुर्विज्ञान के विशेषज्ञ पर है। कहते हैं, “औषधीः पूर्वाजाता त्रियुगं पुरा – औषधियों का ज्ञान तीन युग पहले था।” प्राचीन परंपरा के अनुसार प्रत्येक वनस्पति औषधि भी होती है लेकिन वैदिक वांग्मय में वनस्पतियों के साथ औषधियों से भी शांति की प्रार्थना की गई है – वनस्पतयो शांति, औषधियो शांति गाकर। ऋग्वेद के सातवें मण्डल के 103वे सूक्त के देवता हैं मण्डूक यानी मेढक। मेढक टर्र-टर्र करते हैं। ऋषि को लगता है कि वे पिता-पुत्र जैसी वार्ता कर रहे हैं। बताते हैं कि यज्ञ में स्तोता की तरह गाने वाले ये मेंढक सहस्त्रों औषधियों की वृद्धि करते हैं।” ऋषि कवि का ध्यान काव्य के साथ औषधियों पर भी है। आयुर्विज्ञान की प्राचीन परंपरा में शरीर रहस्यों की जानकारी पर मैकडनल और कीथ ने वैदिक इंडेक्स में खूबसूरत टिप्पणी की है, “वैदिक भारतीयों की रूचि शरीर रचना के प्रश्नों से सम्बन्धित चिंतन की ओर बहुत पहले ही आकर्षित हो गई थी जैसे अथर्ववेद के एक सूक्त में शरीर के अनेक अंगों के विवरण हैं। यह गणना व्यवस्थित रूप में दी गई है।” वैदिक इंडेक्स के लेखकों ने चरक और सुश्रुत के नाम भी लिए हैं। आयुर्विज्ञान के शोध और विवेचन की यह परंपरा ऋग्वेद अथर्ववेद से होकर उपनिषद् और महाभारत तक भी चली आई है।
प्राचीन आयुर्विज्ञान एक जीवनशैली है। चरक संहिता की शुरूवात स्वस्थ जीवन के सूत्रों से होती है। कहते हैं कि “यहां बताएं स्वस्थवृत का पालन करने वाले 100 वर्ष की स्वस्थ आयु पाते हैं।” प्रकृति और मन की अनुकूलता का नाम सुख है। इसके विपरीत दुख। चरक संहिता में इसकी परिभाषा और भी सरल हैं “आरोग्यावस्था सुख है, विकार अवस्था दुख। दुख का मूल कारण रोग हैं।” यहां कोई आध्यात्मिक या भाववादी दर्शन नहीं हैं। चरक संहिता व्यवस्थित आयुर्विज्ञान है। यहां रोगों के तीन कारण बताए गए हैं “इन्द्रिय विषयों का अतियोग, अयोग और मिथ्या योग ही रोगों के कारण हैं।” आगे उदाहरण देते हैं “जैसे आंखो से तीव्र चमकने वाले पदार्थ देखना, सूर्य अग्नि आदि को अधिक देखना अतियोग है।” चरक संहिता में वैद्य की योग्यता के साथ संवेदनशीलता पर भी जोर है। चिकित्सक की धनलोलुपता की निन्दा है। ठीक बात है। अयोग्य चिकित्सक दवाखाने का समय भी सोंच समझकर नहीं बताते। सुना है कि एक चिकित्सक ने सोकर उठने के पहले दवा खाने का सुझाव दिया था।
चरक संहिता की सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, देश, काल और मन के साथ आत्मा को भी द्रव्य बताया है। चरक का आत्मा द्रव्य गीता वाली अमर आत्मा से भिन्न है। आयुर्विज्ञान का मूल विषय प्रामाणिक जीवनशैली है। दवा की जरूरत ही न पड़े ऐसी जीवनचर्या के सूत्र आयुर्वेद में हैं। रोग रहित होना अलग बात है और स्वस्थ होना बिल्कुल भिन्न आनंद। चरक ने बताया है कि स्वस्थ होना सुख है और रोगी होना दुख। आयुर्वेद में स्वस्थ रहने के स्वर्ण सूत्र हैं। वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। सत्व, रज और तम तीन गुण हैं। गुणों का प्रभाव मन पर पड़ता है और दोषों का प्रभाव तन पर। रोगी मन शरीर को भी रोगी बनाता है और रोगी तन मन को। धन्वन्तरि, चरक, सुश्रुत, सहित तमाम पूर्वजों ने आयु के विज्ञान का विकास किया था। वात पित्त और कफ की धारणा अरब देशों तक गई थी। वनस्पतियां और औषधियां उपास्य थीं। यहां वनस्पतियों के साथ औषधियों से भी शांति प्राप्ति की प्रार्थना की गई है। ‘उपचार’ प्रथमा नहीं होता। आचार प्रथमा है, आचारहीन को ही ‘उप-चार’ की जरूरत पड़ती है। यहां उप का अर्थ द्वितीय और चार का अर्थ कार्य है।
जल रस और रक्त का स्पंदन है। लेकिन भारत का जल प्रदूषण भयावह है। चरक संहिता में तमाम नदियों की जल गुण चर्चा है। आयुर्वेद में कहते हैं “यह जल रसों व प्राण से युक्त हो। जल औषधि है।” पूर्वज जल के प्रति संवेदनशील थे। पाराशर ने जल प्रदूषण के दोषी को कड़ी सजा सुनाई है कि जल प्रदूषित करने वाले को कुत्ते की योनि में जन्म मिलेगा। पाराशर के समय वर्ण व्यवस्था का विकास हो रहा था। ब्राह्मणों को कुछ छूट थी। पाराशर ने प्रदूषण के दोषी ब्राह्मणों को भी वही सजा सुनाई है। शरीर निर्माण का मुख्य स्रोत अन्न है। वे शरीर को अन्नमय कोष बताते हैं। अन्न की शुद्धता पर जोर था। आज अन्न पैदा होने से भंडारण तक कीटनाशक रसायनों का घालमेल है। अन्न का ओज तेज और प्राण नष्ट हो रहा है। फल भी विषाक्त हो रहे हैं। आदर्श जीवन चर्या वाले भी असुरक्षित हैं। पुराणकारों ने चार युगों की चर्चा की है। संप्रति पांचवा युग है प्रदूषण युग। स्वस्थ भारत का स्वप्न पूरा हो तो हो कैसे? वैदिक जीवनचर्या में “काम करते हुए ही 100 वर्ष जीवन” का अधिकार है लेकिन कालद्रव्य बदल गया है। समय भी प्रदूषण का शिकार है। दिक् भी स्वस्थ नहीं। मन और आत्म द्रव्य भी विष तनाव में हैं। आयुर्वेद के स्वर्णसूत्र अपनाने का समय आ गया है।

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