विचार मित्र

’’भगवा आतंकवाद’’ का जिन्न फिर बाहर!

 

 आनन्द उपाध्याय ‘सरस‘  

दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और 80 के दशक में कुछ प्रमुख हिन्दी फिल्मों में भी अपने अभिनय के लिए चर्चित और प्रशंसित रहे कमल हासन द्वारा विगत सप्ताह देश में ’हिन्दू आतंकवाद के आर्विभाव’ और हिन्दू मानसिकता के हिंसक और अलगवावादी होने के कथित बयान की पूरे देश में आलोचना ही नहीं हो रही है अपितु बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के साथ ही देश के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े प्रबुद्धजनों, लेखकों ही नहीं अपितु आम नागरिकों के स्तर से भत्र्सना हो रही है। वाराणसी में तो एक अधिवक्ता ने इस आपत्तिजनक बयान से क्षुब्ध होकर न्यायालय में कलम हासन के विरूद्ध परिवाद भी दाखिल किया है, जिस पर जनपद न्यायालय के स्तर से संज्ञान लेकर सुनवाई के उपरान्त प्रकरण को औपचारिक रूप से विचारार्थ स्वीकार करने के उपरान्त कलम हासन को नोटिस भी निर्गत हो चुकी है। दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और 80 के दशक में कुछ प्रमुख हिन्दी फिल्मों में भी अपने अभिनय के लिए चर्चित और प्रशंसित रहे कमल हासन द्वारा विगत सप्ताह देश में ’हिन्दू आतंकवाद के आर्विभाव’ और हिन्दू मानसिकता के हिंसक और अलगवावादी होने के कथित बयान की पूरे देश में आलोचना ही नहीं हो रही है अपितु बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के साथ ही देश के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े प्रबुद्धजनों, लेखकों ही नहीं अपितु आम नागरिकों के स्तर से भत्र्सना हो रही है। वाराणसी में तो एक अधिवक्ता ने इस आपत्तिजनक बयान से क्षुब्ध होकर न्यायालय में कलम हासन के विरूद्ध परिवाद भी दाखिल किया है, जिस पर जनपद न्यायालय के स्तर से संज्ञान लेकर सुनवाई के उपरान्त प्रकरण को औपचारिक रूप से विचारार्थ स्वीकार करने के उपरान्त कलम हासन को नोटिस भी निर्गत हो चुकी है।

दक्षिण भारत में, विशेषकर तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव की संभावित सुगबुगाहट को देखते हुए अब रजनीकांत के बाद कमल हासन के भीतर भी सोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा कुलांचे मार रही है। विविध वामपंथी समर्थकों, संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं की बैशाखी थामे कमल हासन अपने कथित प्रेरणास्रोतों की पूर्वलिखित स्क्रिप्ट के अनुसार ही अपने उत्तेजक बयान देकर न सिर्फ मीडिया में चर्चित हो रहे हैं अपितु सीताराम येचुरी जैसे अनेक प्रमुख वामपंथी नेताओं के आंखो के तारे बनकर उभर रहे हैं। अत्यन्त संवेदनशील मुद्दे पर गैरजिम्मेदाराना और आधारहीन बयान देकर कमल हासन ने विशेषकर मध्य, पश्चिम और उत्तर भारत के अपने करोड़ों फिल्मी शुभचिन्तकों और प्रशंसकों के सामने अपनी थू-थू ही करवाई है। सस्ती और तात्कालिक लोकप्रियता हासिल करने के लिए कमल हासन ने बीते वर्षों ’देश में असहिष्णुता पनपने’ या फिर वामपंथी प्रेरणा से ’पुरस्कार वापसी’ करने वाली स्वनामधन्य जमात के नक्शे कदम पर चलते हुए एक और शिगूफा छोड़ते हुए शांत हो चुके भगवा आतंकवाद और हिन्दू हिंसक मनोवृत्ति के जिन्न को पुनः बोतल से बाहर लाकर एक नया सस्पेंस पैदा करने का फिल्मी स्टाइल अपनाकर देश के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के समक्ष सामाजिक उत्तेजना फैलाने का जो घटिया पैंतरा अख्तियार किया है वह नितान्त निन्दनीय ही नहीं अपितु एक निकृष्टतम और घटिया कृत्य की श्रेणी में ही आता है।

ज्ञातव्य है कि पूर्व में केन्द्र की यू0पी0ए0 सरकार के समय भी भारतीय जनता पार्टी को कमजोर और बदनाम करने के अभियान के तहत कांग्रेस और वामपंथी दलों के सम्मिलित व प्रायोजित सिलसिलेवार प्रयासों की कड़ी में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी पी0 चिदम्बरम जैसे कई राजनीतिज्ञों की आढ़ लेकर तत्समय ’भगवा आतंकवाद’ यानि सैफरन टेरेरिज्म शब्द ईजाद करते हुए कई केन्द्रीय जांच एजेन्सियों और पुलिस व खुफिया संगठनो पर कथित दबाव का इस्तेमाल करते हुए कतिपय विस्फोटों के संबंध में देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिन्दूवादी संगठनों और हिन्दू आध्यात्मिक संस्थाओं से जुड़े अनेक लोगों को सलाखों के भीतर ही नहीं किया गया अपितु जबरन अपराध की स्वीकारोक्ति किये जाने हेतु कथित गंभीर शारीरिक और मानसिक यंत्रणा भी दिलवाई गई।  सम्प्रति कर्नल पुरोहित, स्वामी असीमानन्द, साध्वी प्रज्ञा जैसे अनगिनत प्रकरणों की अब न्यायालय के समक्ष सिलसिलेवार कलई खुल गई है। संबंधित विभिन्न सत्र न्यायालयों, सी0बी0आई0 और  अन्य केन्द्रीय जांच एजेन्सियों के विशेष कोर्ट के द्वारा भगवा आतंकवाद और बम विस्फोट के नाम पर गिरफ्तार किये गये तथा छद्म रूप से हिन्दू आतंकवादी घोषित किया गया ऐसे लोगों को कहीं जमानत के द्वारा तो कहीं बाइज्जत रिहाई के द्वारा देश के समक्ष देर-सबेर पूरा सच सामने आ गया है। यूपीए सरकार और वामपंथी समर्थकों के द्वारा तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए किये गये इस घातक कुकृत्य का भी पर्दाफाश हुआ है। जबरन बनाये गये इन अभियुक्तों की सच्चाई आम जनता के समक्ष आने पर आज देश का बहुसंख्यक हिन्दू समाज सकते में है।कमल हासन अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की यात्रा जिन वामपंथी और तथाकथित प्रगतिशील ताकतों के कंधे पर चढ़कर शुरू करना चाह रहे हैं उन वामपंथियों की वास्तविकता को और उनकी अप्रासंगिक व अव्यवहारिक हो चुकी नीतियों, सोच व विचारधारा को अस्वीकार किये जाने की बानगी पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा की जनता बहुमत से नकार ही नहीं चुकी है अपितु इन दोनों राज्यों में इनकी चूलें भी हिल चुकी हैं।

मौजूदा समय में केरल में वामपंथी सरकार की कारगुजारियाॅं एक-एक कर देश के समक्ष उजागर हो रही हैं। साम्यवादी भोथरी राजनीतिक प्रणाली का चिट्ठा खुलना शुरू हो चुका है। राजनीतिक विरोध की परिणति के तौर पर आये दिन हिन्दूवादी संगठनों या आर0एस0एस0 के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की कथित सरकार संरक्षित नृशंस हत्यायें माक्र्सवाद का बखान खुद निर्लज्जता से करती दिखाई पड़ रही हैं। केरल से भारी संख्या मंें शिक्षित और अशिक्षित ही नहीं वरन् कई प्रोफेशनल लोगों के भी कथित आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होने के संकेत और सुबूत विभिन्न केन्द्रीय जांच एजेन्सियों के रडार पर पुख्ता तौर पर प्राप्त भी हो चुके हैं। लव जिहाद के नाम पर हिन्दू और इसाई युवतियों का इस्लाम धर्म में जबरन या प्रलोभन के जरिए कराया जा रहा धर्मानांतरण जांच एजेन्सियों के दायरे से निकलकर केरल उच्च न्यायालय के बाद अब देश के सर्वोच्च न्यायालय की चैखट पर आ पहुॅचा है। कथित तौर पर अफगानिस्तान और सीरिया तक आई0एस0आई0एस0 में जेहाद के नाम पर भर्ती कर बाहर भेजे जाने के भी संकेत व प्रमाण केन्द्रीय जांच एजेन्सियों के समक्ष संज्ञान में आये हैं। ऐसे वामपंथी आकाओं की गलबहियाॅं कालांतर में कमल हासन को तमिलनाडु की राजनीति में कितना स्थापित कर पायेंगी यह एक यक्ष प्रश्न है। इतिहास गवाह है कि हिन्दू धर्म, हिन्दू दर्शन अथवा हिन्दू जीवन पद्वति में हिंसा का कोई स्थान कभी न तो रहा है और न ही हिन्दू मनोवृत्ति हिंसा को प्रश्रय देने या उसे पोषित करने के पक्ष में रही है। अनेक मुस्लिम आतताईयों, मुगल शासकों, विदेशी आक्रमणकारियों के द्वारा हिन्दू जनता का जबरन धर्मानांतरण कराये जाने, हिन्दू पूजा स्थलों को तोड़ने व लूटे जाने के अनगिनत दृष्टांतों के बावजूद हिन्दू जनता ने अपनी मौलिक मनोवृत्ति को शांतचित्त रखकर अपनी गौरवशाली संस्कृति तथा धार्मिक सिद्धान्तों एवं नैतिक मूल्यों को कभी न तो त्यागा और न उनका तिरस्कार किया। तैमूरलंग, महमूद गजनवी, औरंगजेब, बाबर, अलाउद्दीन खिलजी जैसे अनेक अनगिनत खंूखार और अमानवीय दरिन्दों के कुकृत्यों के बावजूद हिन्दू जनता ने अपनी नैसर्गिक सहिष्णुता को कभी न तो त्यागा और न इस क्रूरता का हिंसक प्रतिकार किया, अपितु सामाजिक चेतना, एकता और शौर्य के जरिये संगठित तरीके से समय-समय पर इन ताकतों के कुप्रयासों को विफल कर अपनी मौलिक शांत हिन्दू मनोवृत्ति को पूरे विश्व के समक्ष प्रकट भी किया। इस देश ने अपनी राजधानी में औरंगजेब रोड का नामकरण भी पूरी सहिष्णुता से बर्दाश्त किया। औरंगजेब की जयन्ती पर इस देश के प्रमुख अखबारों के संपादकीय पृष्ठ पर छपे लेख को भी सहिष्णु जनता ने बर्दाश्त किया है। इस शांत हिन्दू मनोवृत्ति को राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण भगवा आतंकवाद की श्रेणी में आंकने का यह दुष्प्रयास कमल हासन को राजनीतिक रूप से भी कदाचित मंहगा ही पड़ेगा। कमल हासन को यह अहसास होना चाहिए कि देश की जनता चाहे वह दक्षिण भारत की हो, उत्तर भारत की हो अथवा सुदूर पूर्वोत्तर राज्यों की हो वह अब जागरूक हो चुकी है।

थोथे धार्मिक नारों, उन्मादी तरीकों, जातिगत या सम्प्रदायगत दलीलों के जरिये भावनायें भड़काने के बजाय जरूरत इस बात की है कि कमल हासन जैसे एक जिम्मेदार फिल्मी कलाकार को अपनी सामाजिक जवाबदेही के तहत जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों और विशेषकर अपने राज्य तमिलनाडु की आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं को आधार बनाकर अपना राजनीतिक एजेन्डा तय कर जनता के सामने आना चाहिए। मुस्लिम तबके का वोट हासिल करने के लिए उत्तर भारत के राजनीतिक आकाओं यथा मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती, आजम खाॅं, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, अरविन्द केजरीवाल, ममता बनर्जी आदि की तर्ज पर उनका पिछलग्गू बनने से कमल हासन को अपने को बचाना होगा, जो कि उनकी दीर्घकालीन राजनीतिक यात्रा का आधार बन सकेगा। तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक शुरूआत के लिए हिन्दुओं को उपेक्षित, तिरस्कृत अथवा मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के प्रयासों के जरिये भगवा आतंकवाद या हिंसक हिन्दू मानसिकता का विशेषण देकर कलम हासन आज अपने वामपंथी और कथित प्रगतिशील शुभचिन्तकों की जमात को भले ही संतुष्ट करने में सफल हो जायें परन्तु राजनीति में अपने को स्थापित करने का यह घटिया और तुच्छ प्रयास कालांतर में कमल हासन को राजनीतिक पराभव की ओर ही ले जाने में सहायक सिद्ध होगा। सर्वेजनाः सुखिनो भवन्तु, वसुधैव कुटुम्बकम और सत्यमेव जयते तथा अहिंसा परमोधर्माः जैसे कालजयी हिन्दू सिद्धान्तों ने ही इस राष्ट्र को सदियों से मौलिक पहचान दी है। हिन्दुत्व को एक धर्म विशेष के संकीर्ण दायरे में न रखकर एक सम्पूर्ण जीवनपद्धति और जीवन दर्शन के रूप में देखने की व्यापक अवधारणा को आत्मसात कर ही भारत का अवलोकन किया जाना प्रासंगिक है। तात्कालिक थोथे राजनीतिक लाभ के लिए गौरवशाली हिन्दू संस्कृति, परंपरा और मनोवृत्ति को कोसने अथवा गाली देने का जतन आत्मघाती ही सिद्ध होगा, इतिहास इस बात का गवाह है।
आनन्द उपाध्याय ‘सरस‘                           सम्पर्क: 9839611982

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