हरदोई

नगरपालिका हरदोई के चुनाव में भाजपा सपा में दिलचस्प मुकाबला

पारुल के सारथी डॉ अशोक बाजपाई तो मधुर को जिताने में नरेश अग्रवाल लगा रहे सभी जतन कांग्रेस बसपा प्रत्याशी भी लगा रहे पूरी ताकत
हरदोई /19नवम्बर नगर निकाय चुनाव : आपकी व अपनी नज़र से विश्लेषण तारीख़ ज्यों ज्यों नज़दीक आ रही है, हरदोई नगरपालिका के लिए अध्यक्षी का रण रोचक और रोमांचक होता जा रहा है। कभी ‘शब्बीर’ और ‘मधुर’ के बीच रोचक प्रतिस्पर्धा रही थी, जिसमें मधुर विजयी हुए थे, लेकिन उसके बाद लगभग एकतरफ़ा मुक़ाबले ही दिखे हैं। परिवर्तन की धारा में सत्ता पाई बीजेपी आज उत्तर प्रदेश सहित लगभग सभी मुख्य प्रदेशों में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सत्तासीन है। उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव उसके लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कुछेक महीने पहले विधान सभा चुनावों में मिली प्रचंड जीत पर मुहर लग सके और लोकसभा चुनाव 2019 से पूर्व संदेश दिया जा सके कि जनता ‘जीएसटी के दंश’ के बावज़ूद अभी भी उसके साथ है। दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश में सत्ता गंवा चुकी समाजवादी पार्टी कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है, उसे भी ख़ुद को प्रूव करने के लिए और लोकसभा चुनावों में मज़बूती से उतरने के लिए नगर निकाय चुनावों में अच्छे प्रदर्शन का ही सहारा है। काँग्रेस का अपना जनाधार तो कब का उससे दूर जा चुका है, ऐसे में इन चुनावों में उसे जो मिल जाए, प्लस ही है क्योंकि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों की रणनीति उसको मिले कुल वोट प्रतिशत से ही तय होगी। सबसे अधिक नुक़सान बसपा का हुआ है, इसी कारण पिछले चुनावों में अपरोक्ष चुनाव लड़ने वाली बसपा इस बार सिम्बल के साथ मैदान में है। बहरहाल लोकसभा चुनावों के पूर्व ये चुनाव लिटमस टेस्ट ही हैं सभी दलों के लिए।
हरदोई के रण की बात करें तो मुख्य मुक़ाबला भाजपा व सपा के मध्य ही दिख रहा है। दोनो दलों ने ब्राह्मण प्रत्याशियों पर ही दांव खेला है, मज़े की बात ये है कि पूर्व में दोनों ही प्रत्याशी एक दूसरे का साथ देते रहे हैं, चाहें राजनीतिक मंच दोनों के फ़र्क़ रहे हों लेकिन व्यक्तिगत और सामाजिक मंचों पर दोनों एक साथ ही दिखते रहे हैं। भाजपा के मंचों से दहाड़ते हुए आज जो भी चेहरे दिखते हैं, उनमें कई चेहरे तो ‘ठेठ समाजवादी’ रहे हैं, कभी कभी तो संशय सा होने लगता है कि क्या ये लड़ाई सपा के ही दो गुटों की है! ख़ैर ये राजनीति है, और कहते हैं यहां सब जायज़ है! कल नारायण धाम में भाजपा के वक्ताओं ने जिस तरह से एक ‘कद्दावर’ को केंद्र में रखा व विभिन्न उक्तियों से नवाज़ा तो इससे संकेत तो साफ़ है ही, लड़ाई की दिशा और दशा क्या है? प्रतिउत्तर में सपा के ‘कद्दावर’ ने कल शाम वैश्यों के सम्मेलन में अपनी पार्टी के ‘पूर्व कद्दावर’ को भी विभिन्न उक्तियों से नवाज़ दिया! दोनों कद्दावरों की ‘विकास’ की तुलना भी की गई, उपस्थित जनसमूह को ‘दोनों कद्दावरों’ के हरदोई को लेकर किए गए प्रयासों को भी गिनाया गया। बाकी, जनता सब कुछ देख रही है, समझ रही है। अब जनता का मूड तो जनता ही जाने, लेकिन चुनाव की दिशा व दशा शनैः शनैः रोमांचक होती जा रही है, देखिए ऊंट किस करवट बैठता है। आख़िर में सवाल ये भी उठता है, परिवर्तन की बयार या फ़िर पूर्ववर्ती व्यवस्था पर भरोसा ? जवाब संतुलित भाषा मे ही दें, कल भाजपा ज़िलाध्यक्ष ने भी एक वक्ता को उनके भाषण के बीच में ‘उचित शब्द चयन व मुद्दे पर ही केंद्रित’ रहने की सलाह दी थी, जो स्वागतयोग्य थी।
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