विचार मित्र

भ्रष्टाचार-विलासिता और राजनीतिक जी हुजूरी का ’काॅकटेल’ बनी ब्यूरोक्रेसी!

आनन्द उपाध्याय ‘सरस‘
उत्तर प्रदेश के भारतीय प्रशासनिक सेवा संवर्ग के अफसरों की वार्षिक चार दिवसीय ’आई0ए0एस0 वीक’ की शुरूआत राजधानी लखनऊ में 14 दिसम्बर से हो रही है। इस ’एरिस्ट्रोक्रेटिक सेलीब्रेशन’ की विविध गतिविधियाॅं 17 दिसम्बर तक जारी रहेंगी। पारंपरिक रूप से मुख्यमंत्री का उद्बोधन, प्रजेन्टेशन, राजभवन में स्वल्पाहार, विविध सांस्कृतिक आयोजन, मेल-मिलाप के बीच यह आयोजन अपने पूरे शिद्दत और शवाब के साथ पूर्ण हो जायेगा। प्रदेश की आम जनता को प्रशासन फिर अपने मूल और मौलिक ढर्रे पर संचालित होता नजर आयेगा।
प्रशासनिक सेवा के गौरवशाली अतीत की ओर दृष्टिपात किया जाये तो नजर आता है कि अंग्रेज शासकों ने गुलाम भारत में दृढ़ता के साथ शासन करने के लिए न्याय व्यवस्था और नौकरशाही की मौलिक शक्ल का सूत्रपात किया था। वर्ष 1860 में ’भारतीय दण्ड विधान’ और फिर कालांतर में 1872 में ’भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ अस्तित्व में लाया गया था। वर्ष 1861 में ही अंग्रेज शासकों ने आई0सी0एस0 (इम्पीरियल सिविल सर्विसेज) एक्ट लागू किया। इस एक्ट को आॅफिसर्स की कर्तव्यनिष्ठा, सेवा भावना और निष्पक्षता के चलते ’स्टील फ्रेम सर्विस’ के तौर पर आंकलित किया गया। इस सेवा में शुरूआती दौर में इंग्लैण्ड से ही अफसर आते थे शनैः-शनैः होनहार भारतीयों को भी इस सेवा में शामिल होने का मौका दिया गया। स्वतन्त्र भारत के लौह पुरूष कहे जाने वाले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आगे चलकर इस सेवा की महत्ता और उपादेयता के दृष्टिगत इसे ’स्टील फ्रेम आॅफ इंडिया’ की संज्ञा भी प्रदान की।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1947 में देश के स्वतन्त्र होने पर पूर्ववत आई0सी0एस0 की जगह इण्डियन सिविल सर्विस का सूत्रपात हुआ जिसके तहत आई0ए0एस0, आई0पी0एस0 के चयन के लिए पहली बार वर्ष 1947 में अखिल भारतीय परीक्षा सम्पन्न हुई। आगे चलकर इन सेवाओं की महत्ता के दृष्टिगत देश के तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इन सेवाओं को अनुच्छेद 312 के अन्तर्गत अंगीकृत कराते हुए संवैधानिक दर्जा दिलाकर ’अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 1951’ को संसद से स्वीकृति दिलवाई। उक्त तारतम्य में वर्ष 1966 में इस परीक्षा के साथ अखिल भारतीय विदेश सेवा, अखिल भारतीय वन सेवा और अन्य एलाइड सर्विसेज भी समाहित होती गयीं। इस परीक्षा को सम्पादित कराकर अन्तिम चयन की जवाबदेही संघ लोक सेवा आयोग को प्रदान की गयी। ज्ञातव्य है कि उपर्युक्त अखिल भारतीय सेवाओं और अन्य केन्द्रीय सेवाओं की प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा के उपरान्त साक्षात्कार में चयनित अभ्यर्थियों को सर्वप्रथम सम्मिलित प्रशिक्षण (फाउंडेशनल कोर्स) का प्रावधान लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में प्रदान करने के बाद आगे अपनी-अपनी सेवाओं से संबंधित प्रशिक्षण संस्थानों में यथा सरदार वल्लभ भाई पटेल नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद अथवा नेशनल अकादमी आफ डायरेक्ट टेक्सेज, नागपुर अथवा इन्दिरा गांधी नेशनल फाॅरेस्ट अकादमी, देहरादून या फिर फाॅरेन सर्विस इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली इत्यादि में गहन प्रशिक्षण प्रदान किया जाना प्रावधानित है।
ज्ञातव्य है कि देश के विविध क्षेत्रों के नौकरशाहों को उपजाने वाली इन प्रशिक्षण नर्सरियों में आई0ए0एस0 सहित सभी चयनित अधिकारियों को राष्ट्रीय अखण्डता, ईमानदारी, सदाशयता, जवाबदेही, आम जनता के प्रति संवेदनशीलता, निष्ठा जैसे विषयों पर बाकायदा लम्बे-लम्बे व्याख्यानों के जरिये उन्हें एक आदर्श और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की शपथ दिलाई जाती है। उल्लेखनीय है कि लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (1959 में स्थापित) का सूत्र वाक्य भी अपने में विस्तृत भाव सन्निहित किये हुए है जो कि ’शीलं परम भूषण’ है। यह सूत्र वाक्य उच्च मूल्यों और आदर्शों की याद दिलाता है। इस अकादमी का मूल लक्ष्य कार्य कुशल और सर्वथा जवाबदेह लोक सेवक तैयार कर सुशासन की स्थापना में सहयोग प्रदान करना है।
अब यदि मौजूदा वास्तविक धरातल पर आकर इस लब्ध प्रतिष्ठित अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त होनहारों की कारगुजारियों पर विहंगावलोकन किया जाये तो जाये तो तस्वीर विभिन्न समाचार पत्रों में छपे शीर्षकों के साथ कुछ इस तरह नजर आती है:-
’भ्रष्टाचार में आई0ए0एस0 बर्खास्त (म0प्र0), ’करोड़ों के प्रिंटिंग घोटाले में वरिष्ठ आई0ए0एस0 गिरफ्तार’ (असम), ’बलात्कार के आरोपी पूर्व आई0ए0एस0 ने किया सरेण्डर (राजस्थान), ’चारा घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव को कैद’ (झारखण्ड), ’निलंबित आई0ए0एस0 दंपति के 80 बैंक खाते सीज’ (मध्य प्रदेश), नकल करते पकड़ा गया ’आई0पी0एस0 अफसर’ (तमिलनाडु), ’शराब पीकर हुड़दंग आई0जी0 निलंबित’ (केरल), इन्ही बानगियों के बीच उत्तर प्रदेश संवर्ग के नौकरशाहों ने भी अकादमी की दी गयी सीख को ठेंगा दिखाते हुए पूरी शिद्दत के साथ अपनी काली करतूतों का परचम बखूबी फहराया है। सूबे का आम नागरिक गवाह है कि कथित भ्रष्टाचार के चलते आई0ए0एस0 संवर्ग के कनिष्ठ अधिकारी ही नहीं अपितु मुख्य सचिव जैसे सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर नियुक्त रहे कई अधिकारी, सी0बी0आई0 की गिरफ्त में आकर बकायदा आरोपसिद्ध होने के चलते गिरफ्तार होकर लम्बे समय जेल के सीखचों में रहकर इस गौरवशाली सेवा को तिलांजलि देते नजर आये हैं। अपने आला हुक्मरानों से सीख लेकर भ्रष्टाचार और कदाचार का गान करते उ0प्र0 संवर्ग के और भी कई नौकरशाह अभी जेलों में बंद हैं अथवा जमानत पर बाहर हैं।
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी की एक कथित रिपोर्ट में कहा गया है कि, ’अधिकारियों के भ्रष्ट होने की धारणा व्यापक है। नौकरशाही को आज शोषकों का संगठित गिरोह माना जाता है वे भ्रष्टाचार के प्रति इसलिए प्रेरित होते हैं क्योंकि सेवा में जवाबदेही का अभाव है’। सूबे के मुख्य सचिव व राज्यसभा के महासचिव रहे श्री योगेन्द्र नारायण जिनकी गिनती प्रदेश ही नहीं अपितु देश के कुशल व दक्ष प्रशासक की है ने समाचार पत्र में छपे वक्तव्य में निश्चय ही सही कहा कि ’आई0ए0एस0 अफसर को शक-शुबहा के परे होना चाहिए उससे गलत उदाहरण की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती उम्मीद की जाती है कि वह आदर्श पेश करेगा उसे मार्गदर्शक की भूमिका निभानी होती है तभी नीचे वाले से हम उत्कृष्ट की अपेक्षा कर सकते हैं’। सार्वजनिक जीवन में सुचिता को प्राथमिकता मानने वाले प्रदेश के कृषि उत्पादन आयुक्त रहे आई0ए0एस0 अधिकारी श्री आर0के0 मित्तल का समाचार पत्र में प्रकाशित उद्धरण, ’व्यक्ति को ईमानदारी, बुद्धिमता और आवश्यकता की कसौटी अपने पर लागू करनी होती है इस पर चूक की कोई गुंजाइश नहीं है’।
उ0प्र0 के मुख्य सचिव पद पर रहते कथित अवैधानिक प्रस्ताव को अनुमोदन दिये जाने के बलात् राजनीतिक दबाव के चलते स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले लेने वाले नितान्त ईमानदार, आध्यात्मिक और दृढ़ छवि के अधिकारी श्री प्रशान्त कुमार मिश्रा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के गौरवशाली अतीत और मौजूदा विवादास्पद व भ्रष्टाचार से ओतप्रोत वर्तमान की ओर संजीदगी के साथ अपनी अंग्रेजी में नव प्रकाशित पुस्तक ’इनक्वेस्ट आॅफ अॅ मीनिंगफुल लाईफ’ (आटोबायोग्राफी आॅफ अॅ सिविल सर्वेन्ट) में बखूबी से वास्तविकता को रेखांकित किया है। वी0आर0एस0 लेने के बाद संघ लोकसेवा आयोग में पांच साल नियुक्त रहकर वर्तमान में श्री मिश्र पुस्तक में उल्लिखित कथ्य के अनुसार नोएडा में 125 वर्ग मीटर एरिया के अपने तीन कमरों के मकान में सम्मानजनक जिन्दगी जी रहे हैं। जगह के अभाव में कथित रूप से उन्हें अपनी संग्रहित प्रिय 400 से ज्यादा किताबों को  नोएडा पब्लिक लाइब्रेरी को डोनेट करने पर विवश होना पड़ा है। श्री मिश्र का समूचा प्रशासनिक जीवन यू0पी0 संवर्ग के ही नहीं अपितु भारत के विशेषकर आई0ए0एस0 बिरादरी के सामने एक जीता जागता उदाहरण है।
उ0प्र0 के ही मुख्य सचिव रहे एक अन्य स्वच्छ और दृढ़ प्रशासनिक छवि वाले अधिकारी रहे श्री टी0एस0आर0 सुब्रमणियन् ने अपनी पुस्तक ’बाबूराज और नेतांचल’ (मूल अंग्रेजी में लिखित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद) में भी बखूबी अपनी प्रशासनिक सेवा का उल्लेख करते हुए तत्कालीन कार्यप्रणाली से अवगत कराते हुए  वर्तमान ब्यूरोक्रेसी को एक नूतन संदेश देने का सद् प्रयास किया है। पुस्तक के प्राक्कथन में  श्री सुब्रमणियन् ने उद्धृत किया है कि, ’नई दिल्ली के धौलपुर हाउस में आई0ए0एस0 के साक्षात्कार में शामिल होने पर उन्हें लन्दन में रहकर एक वरिष्ठ वैज्ञानिक पद की अपनी नियुक्ति को छोड़कर प्रशासनिक सेवा में आने का कारण पूछे जाने पर उनके द्वारा यह कहने पर कि मैं भारत के लोगों की सेवा करने का अवसर पाना चाहता हूॅ’ का उल्लेख करते हुए कहा है कि यदि मौजूदा परिवेश में आज कोई ऐसा उत्तर साक्षात्कार में देता है तो इस उत्तर को अभ्यर्थी की, ’’एकदम खोखली, अस्वाभाविक और कपटयोजित बात ही माना जायेगा, इसे सुनकर बोर्ड के एकाध मेम्बर ही अपने चेहरे पर प्रस्तीर्ण व्यंगभरी मुस्कुराहट को बड़ी मुश्किल से प्रच्छन्न रख पायेंगे’’। निश्चय ही श्री सुब्रमणियन् का यह कथ्य आज की नौकरशाही की वास्तविकता को आईना दिखाने का एक श्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है।
देश के विभिन्न राज्यों अथवा यूनियन टेरिटरी संवर्ग के ही नहीं अपितु उ0प्र0 संवर्ग के भारतीय प्रशासनिक सेवा अथवा भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों में भारी संख्या भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कम्पनी सेक्रेट्री व चार्टर्ड एकाउन्टेंट संस्थानों से विशिष्ट योग्यता हासिल करने वालों की ही नहीं है अपितु चिकित्सा सेवा संस्थानों से चिकित्सक बनकर निकले छात्र-छात्राओं की भी सहभागिता है। क्या यह सभी विशेषज्ञ अभ्यर्थी भारतीय प्रशासनिक सेवा में सेवाभावना हेतु आ रहे हैं इस बिन्दु पर विचार करना समय की मांग है।
उ0प्र0 के परिप्रेक्ष्य में यदि दृष्टिपात किया जाये तो वस्तुस्थिति अत्यन्त खेदजनक ही नहीं अपितु शर्मनाक भी है। भारतीय प्रशासिक सेवा के अधिकारी विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारों के आने पर उनके कार्यकर्ता की भांति आचरण करके जो उदाहरण पेश करते हैं वह भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह लगाता है। अपने राजनीतिक आकाओं की जी-हुजूरी कर सेवानिवृत्ति के उपरान्त यह नौकरशाह आयोगों और अन्य संस्थानों में बाकायदा पूरे लाव-लश्कर के साथ पुर्ननियुक्ति की सौगात पाने में सफल हो जाते हैं। राजनीतिक आकाओं, अपराधियों, माफियाओं, पुलिसतंत्र, ठेकेदारों और इंजीनियरों की भ्रष्ट लाबी से इन नौकरशाहों का जो शर्मनाक गठबंधन सूबे में विगत तीन दशकों से सुदृढ़ होकर सामने आया है उसने भारतीय प्रशासनिक सेवा के गौरवशाली अतीत को भ्रष्टाचार-विलासिता और राजनीतिक जी हुजूरी का ’काॅकटेल’ बनाकर रख दिया है। अल्पकाल के सेवाकाल के दौरान ही अनेक नौकरशाह करोड़ों की चल-अचल अकूत सम्पत्ति के मालिक बन जाते हैं। इनकी प्राथमिकता जनहित न होकर अर्थोपार्जन और विधायिका के आकाओं की परिक्रमा कर कमाऊ पोस्टिंग पाना ही रह जाती है। कलेक्टर की पोस्टिंग या फिर जुगाड़ वाले विभागों में नियुक्ति के लिए यह एरिस्ट्रोक्रेटिक जमात निचले हद तक समर्पण करने को आतुर दिखाई देती है। काश चार दिवसीय आई0ए0एस0 वीक में पारंपरिक सेलीब्रेशन के दौरान सूबे के नौकरशाह कुछ समय अपनी सेवा के शर्मनाक पतन और भ्रष्ट स्वरूप से बाहर निकलकर अपनी सेवा के पुराने इकबाल और महत्ता को फिर से एक बार पुर्नस्थापित किये जाने के प्रयास हेतु मंथन और चिन्तन के लिए भी निकालें। प्रदेश की जनता की यही अपेक्षा है।
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