विचार मित्र

समाज की ’इस’ विलुप्त होती प्रजाति का संरक्षण नितान्त अपरिहार्य!

आनन्द उपाध्याय ‘सरस‘
विगत दिनों समाचार पत्रों में प्रकाशित एक खबर ’ईमानदार लोग विलुप्त प्रजाति की तरह, संरक्षण की जरूरत’ ने देश के भीतर भ्रष्टाचार के भयावह एवं बेलगाम हो चुके संक्रमण को इंगित करते हुए सर्वथा दो-टूक टिप्पणी की है। मौजूदा भारतीय सामाजिक परिदृश्य के दृष्टिगत बढ़ती बेईमानी और भ्रष्टाचार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निश्चय ही तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट के समक्ष सूचीबद्ध एक सरकारी विभाग से जुड़े प्रकरण पर कोर्ट ने कहा, ’’भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है। देश में निष्ठावान लोगों की संख्या घटती जा रही है। ईमानदार लोग विलुप्त प्राणी बनते जा रहे हैं इनके संरक्षण की आवश्यकता है’’। कोर्ट ने सरकार को ईमानदारों और निष्ठावान लोगों को प्रोत्साहित करने की योजना पर अमल करने व भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने की कार्यवाही करने का निर्देश दिया है।
     इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मेरठ विकास प्राधिकरण से संबंधित प्लाट आवंटन से जुड़े प्रकरण में आवंटन की कार्यवाही को निरस्त करते हुए इसकी जांच विजिलेंस से कराये जाने का आदेश देते हुए पूर्वोक्त टिप्पणी व्यक्त की। इससे पूर्व भी देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के स्तर से भी अलग-अलग मामलों की सुनवाई के दौरान भ्रष्टाचार के परिप्रेक्ष्य में ऐसे ही अथवा इससे भी तीखे कटाक्ष व्यक्त किये जाते रहे हैं। न्यायपालिका के निर्देशों के चलते ही देश में अनेक गंभीर प्रकरणों में बरते गये करोड़ों रूपये के भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो पाये हैं। जब विधायिका और कार्यपालिका की दुरभिसंधि के चलते पूरे देश में नैतिकता को बेहयाई के साथ तिलांजलि देते हुए आम जनता की गाढ़ी कमाई को भ्रष्ट आचरण के जरिये लूटा जाता रहा है तो आखिरकार न्यायपालिका के हस्तक्षेप के जरिये इनमें से कुछ प्रकरणों का ही जनता के सामने रहस्योद्घाटन हो पाया है। इस पर भी राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को न्यायायिक सक्रियता का आरोप मढ़ने से कोई गुरेज नहीं होता।
इतिहास गवाह है कि देश के युवा प्रधानमंत्री स्व0 राजीव गांधी तक को अपने सार्वजनिक भाषण में यह कहना पड़ा था कि देश के संशाधन का 15 प्रतिशत लाभ ही आम जनता तक पहुॅंच पाता है। आशय यह था कि भ्रष्टाचार और कदाचार में आकंठ डूबे देश और प्रदेशों के सिस्टम के हिस्से में 85 प्रतिशत आर्थिक संसाधनों की निर्लज्जतापूर्वक बंदरबांट सम्पन्न हो जाती है। आज भारत भ्रष्टाचार में विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की श्रेणी में शर्मनाक तरीके से जिस रैंकिंग में सूचीबद्ध नजर आता है उसे देखकर सचमुच लज्जा का अनुभव होता है।
    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, डा0 राजेन्द्र प्रसाद, डा0 राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश नारायन जैसे अनेक राजनीतिक पुरोधाओं ने स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रीय राजनीति में जिस शुचिता और आदर्श तथा नैतिकता का सुनहरा सपना संजोया था उस पर शनैः-शनैः तुषारापात होता चला गया। औद्योगिक मूल्य सूचकांक, जी0डी0पी0 के आंकड़ों के प्रतिशत में आने वाली उछाल को दशमलव में आंककर अपनी पीठ ठोंकने वाले मौजूदा राजनीतिज्ञों ने राष्ट्रीय शुचिता और मानवीयता के इंडेक्स की सर्वथा अनदेखी ही की है। करोड़ों के वारे-न्यारे कर अन्ततः जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालकर भारतीय तंत्र को अंगूठा दिखाकर रातोंरात देश से फरार होकर आज अनेक धन्ना सेठ इंग्लैंड और यूरोप की वादियों में खुलेआम तफरीह कर मुॅंह चिढ़ा रहे हैं। भारत सरकार प्रत्यार्पण संधि की संाप-सीढ़ी में उलझकर इनके सम्मुख लाचार और दयनीय दिखाई पड़ती है।
    देश के आर्थिक संसाधनों पर राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के संगठित गिरोह के चलते जिस प्रकार निजी व पारिवारिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु अनगिनत भ्रष्टाचार के प्रकरण विभिन्न प्रान्तों की आर्थिक अपराध शाखाओं की धूल भरी फाईलों में मरणासन्न पड़े हैं उससे तो स्थिति कदापि आशावादी प्रतीत नहीं होती। उ0प्र0 जैसे राज्य में दर्जन भर से ज्यादा महकमें आर्थिक अपराध और रिश्वतखोरी की रोकथाम या जांच के लिए कार्यरत हैं। सरकारी अधिकारियों के आर्थिक काले कृत्यों की जांच के लिए सतर्कता अधिकरण खिलौना बनकर रह गये हैं। इतिहास गवाह है कि उ0प्र0 के गठन से लेकर आजतक इन संगठनों को संदर्भित कितनी जांचों के निष्कर्ष के जरिये यू0पी0 कैडर के आई0ए0एस0/आई0पी0एस0 अथवा पी0सी0एस0/ पी0पी0एस0 अधिकारियों को सजा मिली अथवा गिरफ्तारी का मॅंुह देखना पड़ा? हाॅं केन्द्र सरकार की एजेन्सी सी0बी0आई0 (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का तोता तक संबोधित किया है) ने जरूर कतिपय भ्रष्टाचार के प्रकरणों पर (वह भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद) कई महत्वपूर्ण आर्थिक स्कैण्डलों का बखूबी पर्दाफाश कर भ्रष्ट राजनीतिज्ञों व नौकरशाहों को जेल की सलाखों के पीछे पहुॅचाने में मदद कर आम जनता के मन में कदाचित आशा की एक किरण जरूर दिखाई है। देश में इन भ्रष्ट तत्वों ने जिस निर्लज्जता से अपने खजाने भरकर अपने व अपने कुनबे को अरबपति बनाकर समूची आर्थिक संरचना को खोखला करके रख दिया है उसने आम जनता की आशाओं पर कुठाराघात ही किया है।
मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के ’न खाऊॅंगा न खाने दूॅंगा’ के संकल्प ने देश की आम जनता को एक आशावादी संदेश दिया है। प्रदेश के युवा और जुझारू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरेन्स का दावा आम जनता को समझ में आया है। जनता को यह दरकार है कि प्रधानमंत्री के अधीनस्थ अन्य विभागों के केन्द्रीय मंत्री और उनके अधीन काम कर रहे नौकरशाह भी पी0एम0 के इस संकल्प का वास्तव में प्रयोगात्मक अनुसरण कर आम जनता के समक्ष परिवर्तन को प्रस्तुत करने में सक्षम सिद्ध हों। यही बात सूबे के विभिन्न विभागों के मंत्रियों और नौकरशाहों तथा मण्डल और जिले में तैनात प्रशासनिक अधिकारियों को भी आत्मसात करके प्रदेश की आम जनता को मुख्यमंत्री के संकल्प को चरितार्थ करने का जतन करके दिखाना चाहिए। अन्यथा यह सिर्फ कोरी बयानबाजी का शिगूफा बनकर रह जायेगा। जागरूक नागरिकों, स्वयंसेवी संगठनों, बुद्धिजीवियों, मीडिया तथा युवा वर्ग को भी पूरी शिद्दत और संजीदगी से आगे आकर भ्रष्टाचार के खिलाफ सघन और सम्मिलित अभियान चलाने का प्रयास पुरजोर तरीके से करना ही होगा। अन्यथा भ्रष्टाचार का कैंसर हमारी समूची सामाजिक व्यवस्था को खोखला और निर्जीव बनाकर रख देगा।
       बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों द्वारा जिस तरह सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने रूबरू होकर अपना स्यापा अलापा गया है उसने इस स्वतन्त्र राष्ट्र के सात दशक से ज्यादा के समयकाल में आम जनता की सुप्रीम कोर्ट के प्रति रहने वाली अगाध, अप्रतिम और अथाह विश्वास और श्रद्धा को जो चोट पहुॅचाई है इसके जख्म लम्बे समय तक भरे नहीं जा सकते हैं। कहीं न कहीं न्यायायिक क्षेत्र में दबी जुबान से व्याप्त होने वाली संदिग्धता की बात को ऐसे कृत्यों से और बल मिला है। यह राष्ट्रहित में एक निराशाजनक घटना कही जा सकती है।
समय की मांग है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी कि, ’’भ्रष्टाचार दैनिक कामकाज का हिस्सा बन गया है। देश में निष्ठावान लोगों की संख्या घटती जा रही है। ईमानदार लोग विलुप्त प्राणी बनते जा रहे हैं इनके संरक्षण की आवश्यकता है’’। को पर्याप्त गंभीरता से लेकर भारतीय लोकतंत्र के सभी स्तम्भों यथा व्यवस्थापिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता को आत्ममंथन और विश्लेषण कर समाज के भ्रष्ट तत्वों, संगठनों और ऐसी अनैतिक ताकतों को प्रोत्साहित करने वाले समाज के अवयवों को नितान्त हतोत्साहित कर समाज के ईमानदार और नैतिक मूल्यों के पोषक वर्ग को आगे बढ़ाने के प्रयास फौरी तौर पर करने चाहिए। व्हिसिल ब्लोवर को संवैधानिक रूप से बाध्यकारी संरक्षण प्रदान किये जाने से यह अभियान ताकत प्राप्त कर सकेगा। यदि भ्रष्टाचार के इस घुन को समय रहते नियंत्रित नहीं किया जाता है तो भारत के विश्व गुरू या तीसरी शक्ति बनने का सपना एक ख्याली पुलाव या फिर दिवाःस्वप्न बनकर रह जायेगा।
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