विचार मित्र

विनाशकारी है अहंकार की राजनीति

‘‘सत्ता पाय काह मद नाहीं’’ संत तुलसी की ये चौपायी अनादि काल से मानव के वजूद में गहरे समायी है। जनसेवा का भाव रखने वाले भी सत्ता से जुड़ते ही सामंती मानसिकता के मुरीद हो जाते हैं। सेवा भाव गौण होने लगाता है। सत्ता से जुड़े लोगों में वर्चस्व का भाव इस कदर हावी होने लगता है कि वे अपने सहयोगियों की ख्याति से भी जलने लगते हैं। इसका फायदा उठाते हुवे विपक्षी पार्टियाँ भी सत्ता के गलियारे में सेंघमारी करने में जुट जाती हैं। तात्पर्य ये कि सत्ता पाते ही उसे बचाने एवं वर्चस्व बनाने वालों के जेहन से सेवाभाव तिरोहित होने लगता है और जनहित के कामों की खानापूर्ति प्रारंभ हो जाती है। जाहिर सी बात है कि संकल्प एवं खानापूर्ति में जमीन आसमान का अंतर होता है, और यही अंतर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आयी मोदी सरकार की उल्टी गिनती का सबब बनने लगा है। स्वयं को प्रधान सेवक कहने वाले मोदी की कर्मठता और राष्टï्रवाद आम जनता के दिलोदिमाग पर छाा गया और वे प्रचंड बहुमत से सत्ता में आये। इसमें संदेह नहीं कि श्री मोदी व्यक्तिगत हितों की तिलाँजलि देते हुवे पूर्ण समर्पण भाव से देश सेवा में लगे हैं। विदेशों में गिरती हुई भारत की साख को जितना सशक्त मोदी जी ने किया है उतना किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं किया। किन्तु इन्हीं उपलब्धियों के चलते मोदी ही नहीं भाजपा का अदना सा कार्यकर्ता भी विरोधियों पर जमकर भड़ास निकालने से नहीं चूकता। वे भूल जाते हैं कि आलोचनाओं की बजाय काम के बलबूते स्थापित होने में ही स्थायित्व है। लोकतंत्र में सत्ता किसी की जागीर नहीं होती किन्तु भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले श्री अमितशाह अति उत्साह में भरकर कार्यकर्ताओं को पचासवर्षों तक सत्ता कायम रहने का भरोसा दिलाते हैं। वे भूल जाते हैं कि चाणक्यनीति अपने इरादों को इस प्रकार सार्वजनिक रूप से उजागर करने की पक्षधर नहीं है। कर्नाटक की बता करें तो निसंदेह मोदी मैजिक सरचढ़ कर बोलता नजर आया। सत्तारूढ़ काँग्रेस, क्षेत्रीय पार्टी एवं निर्दल जितनी कम सीटों पर सिमट गये उसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। ऐसे में सिर्फ भाजपा को रोकने की मंशा से दोनों धुर-विरोधी पार्टियों ने गठजोड़ किया वो जनादेश के विरुद्घ था ये माना जा सकता है किन्तु संविधान सम्मत होने के कारण ठुकराने योग्य भी न था। बावजूद इसके राज्यपाल से अंतरंगता का लाभ उठाते हुवे येदुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाने एवं मीडिया के बार-बार कुरेदने पर भी निराधार तर्कों पर सरकार गठन का दावा पेश करते रहे। जो मोदी के अंधभक्तों को भले ही रास आया हो किन्तु किसी भी बुद्घिजीवी के गले न उतर सका। भ्रष्टाचार मिटाने एवं स्वस्थ लोकतंत्र का दावा करने वाली भाजपा सत्ता की हबस के चलते खरीद फरोख्त एवं जोड़-तोड़ की राजनीति पर उतर आयी। और इसी मानसिकता को बल प्रदान करते हुवे माननीय राज्यपाल महोदय ने भी 7 की बजाय सरकार बनाने हेतु 15 दिन की मोहलत दे दी। सत्ता की हबस एवं अहंकार के चलते नीति-अनीति का विचार किये बिना इस तरह के निर्णय लेने का आम जनता में क्या संदेश जायेगा इसे दर किनार कर दिया गया। ये माना जा सकता है कि धर्म निरपेक्षता के नाम पर देश द्रोहियों से गठजोड़ करने वालों को शठे-शाठ्यं समाचरेत की तर्ज पर जवाब देना आवश्यक है। किन्तु सत्ता के लिये लोकतंत्र की गरिमा को ताक पर रख देना कहाँ की बुद्घिमत्ता है?
मोदी जैसा वाकपटु एवं मर्म पर प्रहार करने वाला अद्वितीय वत्ता-भी घटिया स्तर पर उतर आया इसे उनकी राजनीति का काला अध्याय कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। सभी जानते हैं कि आज के चुनाव जातिवादी सोच एवं धनबल व बाहुबल के सहारे लड़े जाते हैं। जिसे लोकतंत्र का कोढ़ कहना सर्वथा प्रासंगिक है। आवश्यकता है इसे दूर करने की, किन्तु सत्ता की अंधी दौड़ में मोदी सरकार एवं भाजपा के क्षत्रपों ने इस कोढ़ को दूर करने के बजाय फैलाने का ही काम किया है। देश की अर्थ व्यवस्था में सुधार उसके विकास के लिये परमआवश्यक है, किन्तु वही धन पार्टी के विकास एवं सत्ता को कायम रखने हेतु खर्च किया जाता है तो वो सरासर लूट है। टैक्स चोरी रोकने हेतु जी.यस.टी. की सोच काबिले तारीफ है किन्तु वर्तमान प्रणाली बड़े व्यापारियों एवं उद्योगपतियों के बस की ही है छोटे व्यापारी एवं उद्योगपति तो इसकी चक्की में इस तरह पिस रहे हैं कि व्यापार आधा रह गया है। आम आदमी की क्रय शक्ति भी इसलिये घट रही है कि सरकारीतंत्र को वैभव से संपंन्न करने हेतु आम जनता पर टैक्स दर टैक्स लाद दिये गये हैं। उद्योगों के नाम पर ऋण देने की प्रथा का लाभ सत्ता के चहेतों ने उठाया। इसका लाभा हर्षद मेहता, विजय माल्या नीरव मोदी एवं मेहलु चौकसी जैसी हस्तियों ने ही उठाया आम जनात के तो कई जोड़ी जूते ऋण लेने की कवायद में घिस जाते हैं। सौभाग्य से कोई सफल भी हुआ तो भागदौड़ एवं घूस के चक्रव्यूह में कम से कम चौथाई रकम तो स्वाहा हो ही जाती है और मिली हुई तीन चौथाई रकम भी बिलंब के चलते उïद्देश्य को पूरा नहीं कर पाती। प्रश्न ये उठता है कि क्या भ्रष्टïाचार के बल पर अकूत संपत्ति बटोरने वाले चंद उद्योगपति एवं राजनेता ही भारत की अर्थ व्यवस्था के रोल-मॉडल हैं? इस सत्य को स्वीकार किये जाने का सीधा सा अर्थ है भारतीय राजनीति में भ्रष्टïाचार सिर चढक़र बोल रहा है। जो पूवर्ती सरकारों से लेेकर वर्तमान सरकार में भी न केवल कायम है, वरन दिनों दिन विस्तार पा रहा है।
प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी विकास एवं भष्टाचार मिटाने का संकल्प लेकर सत्ता में आये पर चंद सहयोगियों एवं इने-गिने शार्षस्थ नेताओं के अलावा अधिकाँश किसी न किसी रूप में भ्रष्टïाचार एवं व्यभिचार में लिप्त हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब भ्रष्टïाचार में लिप्त इन माननीयों का बचाव ये कहकर किया जाता है कि पिछली सरकारों के मुकाबले हम कम भ्रष्टïाचारी हैं। रातों-रात भ्रष्टïाचार नहीं मिटाया जा सकता, ये दलीलें भी दी जती हैं किन्तु भ्रष्टïाचारियों को त्वरितगति से कड़े से कड़ा दंड देने की बजाय रंगे हाथो पकड़े जाने पर भी जाँच कमेटी बैठाकर लम्बा खींचा जाता है फिर कोर्ट-कचहरी के मकडज़ाल में इतना उलझा दिया जाता है कि फैसला आने के पूर्व ही वे सम्मान पूर्वक इस दुनियाँ से विदायी ले लेते है। ईमानदार को हाशिये पर रखने की प्रथा बदस्तूर चालू है। ‘‘खायेंगे न खाने देंगे’’ ‘‘भ्रष्टïचारियेां को जमीन में गाड़ देंगे’’ जैसे जुमले भ्रष्टïाचार पर से ध्यान हटाने हेतु ही उछाले जाते हैं। अंतर्राष्टï्रीय बाजार मेंक्रूड आयल सस्ता होने के बावजूद रोज दामों मे बढ़ोत्तरी एवं जी.यस.टी. के दायरे में न लाना धन की हबस की मानसिकता से पे्ररित है। बात विकास की करें तो बुलेट ट्रेन, लम्बे-लम्बे हाईवे रेलवे एवं प्लेनों के फ्लेक्सी किराये, तत्काल टिकट में माँग के अनुसार बढ़ोत्तरी से उद्योगपतियों एवं नेताओं को ही लाभ पहँुच सकता है। आम जनता के लिये ये मृगमरीचिका ही सिद्घ हुई हैं। गरीबी व अमीरी की खाई निरंतर बढ़ रही है व देश का अधिकाँश धन एवं समय सत्ता एवं सत्ताधीशों के संरक्षण एवं संवर्धन में ही खर्च हो रहा है। क्रीमी-लेयर दिनोंदिन विकास के पथ पर अग्रसर हो रही है और गरीब विनाश के पथ पर। विकास की कोई भी परिभाषा रोटी-कपड़ा, मकान और सुरक्षा के बाद ही मायने रखती है। इसके अलावा आम जनता से छलावा एवं लूट के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
श्याम सुन्दर मिश्र,
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mob. 8005107299

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