विचार मित्र

आखिर कब मांगेंगे हम इंग्लैण्ड से उसके अमानवीय कृत्यों का हिसाब

डॉ.दीपकुमार शुक्ल

बीते सत्तर वर्षों से हम 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाते चले आ रहे हैं। आगे भी मनाते रहेंगे। आजादी के नब्बे वर्षीय संघर्ष में देश को अनगिनत बलिदान देने पड़े, अनेक त्रासदियों को झेलना पड़ा, वर्षों बरस तक अंग्रेजों के अमानवीय कृत्यों को जुल्म की इम्तहाँ तक सहना पड़ा। इस लड़ाई में किसी ने अपना बेटा खोया, किसी ने भाई तो किसी का पूरा परिवार ही आज़ादी की भेंट चढ़ गया। जिन्होंने खोया आजादी के बाद उन्हें कुछ नहीं मिला और जिन्होंने कुछ नहीं खोया उन्हें आजादी के बाद सत्ता सुख प्राप्त हुआ। अब तक देश में अनेक सरकारें आयीं और चली गयीं लेकिन किसी ने भी अंग्रेंजों द्वारा भारतियों पर ढाए गए क्रूरतम जुल्मों और लूटपाट का हिसाब इंग्लैण्ड से मांगने का साहस आज तक नहीं किया। उलटे समय के साथ सब कुछ भुलाने की कोशिश हो रही है। ऐसा लगता है जैसे भारत को आजादी इंग्लैण्ड की गुलामी से नहीं बल्कि किसी प्राकृतिक आपदा से प्राप्त हुई है। जिसके परिप्रेक्ष्य में चाहकर भी कोई कुछ नहीं कर सकता है।
भारत में प्लासी के युद्ध से आजादी तक का काल औपनिवेशक राज्य का काल था। जिसकी स्थापना व काम करने का तरीका ही शोषण और लूटपाट करने का था। इस पूरे कार्यकाल में अंग्रेजों ने भारत के श्रम और धन का उपयोग सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ के लिए ही किया। यही कारण है कि सत्रहवीं शताब्दी तक दाने-दाने को मोहताज रहा ब्रिटेन आज ग्रेट ब्रिटेन बन चुका है।

प्रसिद्ध इतिहासविज्ञ उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में समूचा ब्रिटेन अध्र्यसभ्य किसानों का उजाड़ देश था। उनकी झोपड़ियाँ नरसलों और सरकंडों की बनी होती थीं। जिनके ऊपर मिटटी या गारा लगा रहता था। घास-फूस जलाकर घर में आग तैयार की जाती थी। उनकी खुराक जौ, मटर, उड़द, कन्द और दरख्तों की छाल तथा मांस हुआ करती थी। शहरों की हालत गाँवों से बहुत अच्छी न थी।

शहरवालों का बिछौना भुस से भरा एक थैला होता था तथा लकड़ी के गोल टुकड़े को तकिये की जगह प्रयोग में लाया जाता था। गरीब लोग हाथ-पैरों में पुआल लपेट कर और अमीर लोग चमड़े का कोट पहन कर सर्दी से जान बचाते थे। न सड़कें थीं, न अस्पताल थे और न साफ सफाई का ही कोई इन्तजाम था। लन्दन इतना गन्दा और भद्दे मकानों वाला नगर था कि बमुश्किल ही उसे शहर कहा जा सकता था।

शाम होने के बाद लन्दन की अँधेरी गलियां सूनी और डरावनी हो जाती थीं। चोर-लुटेरों और दुराचारियों का चारो ओर आतंक व्याप्त था। उस समय इंग्लैण्ड की कुल आबादी पचास लाख के आसपास थी। अब यदि हम भारत की बात करें तो ब्रिटिश राज की स्थापना से पूर्व भारत विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक उत्पादक देश था। मसाले, नील, चीनी, रेशमी व सूती वस्त्र, दवा, कीमती पत्थर, तथा हस्तशिल्प का भारत से बड़ी मात्रा में निर्यात होता था। आयात कम था और निर्यात अधिक था। जिससे आर्थिक सन्तुलन पूरी तरह से भारत के पक्ष में था। देश स्वर्ण तथा रजत भण्डारों से परिपूर्ण था। इसीलिए भारत सोने की चिड़िया कहा जाता था। लेकिन प्लासी तथा बक्सर के युद्ध के बाद देश की आर्थिक दशा एकदम से बदल गयी। अब भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर न रहकर औपनिवेशक शासन का शिकार हो गयी थी।

सन 1746 में भारत आये कर्नल स्मिथ नामक अंग्रेज ने जर्मनी के साथ मिलकर बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा पर आक्रमण करके लूटने की गोपनीय योजना बनाकर यूरोप भेजी थी। उसने फ्रांसिस ऑफ़ लारेन को लिखे पत्र में कहा था कि मुग़ल साम्राज्य सोने तथा चांदी से लबालब भरा हुआ है। यह साम्राज्य निर्बल तथा असुरक्षित है। यहाँ एक आक्रमण करके इतना धन प्राप्त किया जा सकता है जितना कि ब्राजील तथा पेरू की सोने की खानों में भी नहीं होगा। बंगाल के नवाब अलीवर्दी खां के पास तीन करोड़ पाउंड (लगभग पचास करोड़ रुपये) का खजाना है। उसकी सालाना आमदनी कम से कम बीस लाख पाउंड होगी।

कर्नल स्मिथ के इस पत्र से अंग्रेजों के उदेश्य को आसानी से समझा जा सकता है। इसके बाद सन 1757 में प्लासी तथा सन 1764 में बक्सर में हुए युद्ध में विजयी हुए अंग्रेजों ने धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत पर अधिकार कर लिया और यहाँ की अपरिमित सम्पत्ति लूटकर इंगलैण्ड ले गयी। इतिहासकार आर.सी.दत्त ने तो यहाँ तक कहा था कि भारत में अंगेजी शासन निरन्तर लूट तथा आक्रमण के समान है। जो तैमूर, नादिरशाह, अब्दाली तथा ऐसे अन्य आक्रमणकारी के हमले से ज्यादा बुरा है। ये लोग आये लूटा और चले गए किन्तु ब्रिटिश राज हर रोज लूट रहा है।

जिसके कारण भारत अकालों का देश बन गया है। अकाल जो बार-बार अधिक भीषण रूप से पड़ते हैं। सन 1770 में बंगाल में पड़े अकाल में यहाँ की 1/3 आबादी समाप्त हो गयी थी। सन 1868 से 1944 के बीच भारत में दस बड़े अकाल पड़े थे। जिनमें लाखों की जनहानि तथा अर्थव्यवस्था के पतन को ब्रिटिश राज का सबसे अमानवीय परिणाम माना जाता है। आर.सी दत्त ने ऊँचे भूराजस्व को अकाल का सबसे बड़ा कारण माना था।

कालाबाजारी, जमाखोरी तथा जनवितरण व्यवस्था के अभाव ने अकाल की विभीषिका को और अधिक बढ़ा दिया था। अनाज सस्ता था और निर्यात भी होता था लेकिन उसे खरीदने के लिए लोगों के पास पैसे ही नहीं होते थे। अंग्रेजों की कुटिल नीतियों से भारत का आम आदमी पाई-पाई को मोहताज हो गया था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सबसे बुरा शिकार भारत के किसान हुए थे। अंग्रेजों द्वारा लागू किये गए भूराजस्व बन्दोबस्त के बाद से किसानों की दशा एकदम से ख़राब होती चली गयी और उन पर अमानवीय अत्याचार भी होने लगे थे।

इस तरह से सत्रहवीं शताब्दी तक पूरी तरह कंगाल रहा इंग्लैण्ड भारत को क्रूरता की हद तक लूटकर आज विश्व का विकसित और समृद्ध देश बना बैठा है। क्या अब हमें अंग्रजों से उनकी उस क्रूरता और अमानवीय कृत्यों का हिसाब नहीं मांगना चाहिए? दो सौ वर्षों तक भारत को लूटने वाले इंग्लैण्ड से इसकी भरपाई के लिए क्या आज तक भारत के नेताओं ने कभी आवाज उठाई है? ब्रिटिश सरकार की जेलों में बन्द रहे अनगिनत स्वतन्त्रता सेनानियों पर हुए अमानुषिक अत्याचारों के विरुद्ध क्या हमने कभी स्वर ऊँचा किया है? आजादी की लड़ाई में प्राणों की आहुति देने वालों के प्राणों की क्या कोई कीमत नहीं है? इन महान बलिदानियों को केवल शहीद का तमगा देकर क्या देश ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है? अग्रेंजों के साथ मिलकर लूट मचाने वाले भारतीय गद्दारों के विरुद्ध भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

अपनों को लूटकर अंग्रेजों की जेबे भरने के बदले कुछ टुकड़े पाये लोग आज भी देश को लूट रहे हैं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने कुछ खोया होता तो शायद उन्हें आजादी का मूल्य समझ में आता और वे देश के प्रति ईमानदार रहते। ऐसे लोग तो उलटा इस लड़ाई को कमजोर ही करते रहे हैं। क्या देश ने इन गद्दारों को क्षमा कर दिया है या फिर हमारी सरकार के पास इनके विरुद्ध कुछ करने का साहस नहीं है? स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य में खुशियाँ मनाने से पूर्व हमें उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर भी तलाशने चाहिए।

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