विचार मित्र

जातीय संघर्ष की बनती पृष्ठभूमि

डॉ.दीपकुमार शुक्ल

‘जात पर न पांत पर मुहर लगाओ हाँथ पर’ का कभी नारा देने वाली कांग्रेस ने एस.सी/एस.टी. एक्ट के संसोधित स्वरुप का तहेदिल से समर्थन करके यह सिद्ध कर दिया है कि देश को फ़िलहाल जातीय राजनीति से मुक्ति नहीं मिलने वाली है। यह न केवल आश्चर्य जनक है बल्कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा विद्रुप भी है कि देश की सर्वोच्च न्यायायिक संस्था ने जिस कानून के बड़े पैमाने पर बेजा इस्तेमाल के दृष्टिगत इसके कुछ प्राविधानों पर रोक लगा दी हो, उस कानून को पुनः संशोधित करते हुए दोनों सदनों में किसी भी तरह की बहस कराय बिना ही पारित कर दिया गया। क्या उच्च्र्तम न्यायालय का निर्णय तथ्यहीन था या किसी राजनीति से प्रेरित था ? जो राजनीतिक दलों ने इसे बदले की कार्यवाही की तरह अंजाम दिया है।

गौरतलब है कि 19 मई को देश की सर्वोच्च अदालत ने एस.सी./एस.टी. एक्ट के दुर्पयोग का हवाला देते हुए इस एक्ट के तहत शिकायत मिलने पर तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगायी थी। शीर्ष अदालत के पास इस कानून के दुर्पयोग के हजारों उदहारण हैं। जिनके आधार पर ही यह फैसला आया था। क्या सरकार को संशोधन से पूर्व शीर्ष अदालत के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में एक समिति बनाकर इस मामले की तह तक जाने का प्रयास नहीं करना चाहिए था ? सर्वोच्च न्यायालय के तथ्यों को जानने समझने की जरा भी कोशिश किये बिना उसके निर्णय को आनन-फानन में पलटकर क़ानून का रूप दे देना संसदीय अधिकारों का सर्वथा दुर्पयोग ही कहा जायेगा। इससे देश के सवर्ण समाज का नाराज होना स्वाभाविक है।

सवर्णों की नाराजगी का राजनीतिक लाभ किसी को मिले या न मिले परन्तु भारतीय जनता पार्टी को इसका नुकसान अवश्य उठाना पड़ सकता है। इस एक्ट के पारित हो जाने के बाद देश में जातीय संघर्ष की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सोशल मीडिया पर इस सन्दर्भ में जिस तरह के भड़काऊ परन्तु अकाट्य तर्कों वाले संदेश प्रसारित हो रहे हैं उनसे जातीय संघर्ष की पृष्ठभूमि बनते हुए स्पष्ट दिखाई दे रही है।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम सर्वप्रथम 11 सितम्बर 1989 को संसद में तब पारित हुआ था जब केन्द्र में राजीव गाँधी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी। उसके बाद इसे विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के समय 30 जनवरी 1990 को पूरे देश में लागू किया गया था। यहाँ समझना यह है कि डॉ.भीम राव अम्बेडकर से बड़ा न तो कोई दलितों का नेता हुआ है और न ही शुभचिंतक। उन्होंने दलितों की लड़ाई को जमीनी स्तर पर लड़ा था। उन्हें देश के दलित वर्ग की परिस्थितियों का भलीभांति ज्ञान था। उसके बाद वही डॉ.अम्बेडकर संविधान सभा के अध्यक्ष बनाये गए।

उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए संविधान में वे सभी प्राविधान रखवाए जो आवश्यक थे। आखिर तब उन्होंने इस तरह के किसी कानून की आवश्यकता क्यों नहीं महसूस की थी ? जैसी सन 1989 में कांग्रेस ने महसूस की और अब भाजपा भी वही महसूस कर रही है। इन दोनों दलों के साथ देश के अन्य सभी दल भी सुर मिलाये हुए हैं। इससे तो यही सिद्ध होता है कि देश के सभी राजनीतिक दल जातीयता के सहारे ही सत्ता सुख प्राप्त करना चाहते हैं। इससे इतर वे न कुछ करना चाहते हैं और न कुछ सोचना चाहते हैं।

सन 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद देश को यह लगा था कि शायद अब भारत की राजनीति में एक नया युग प्रारम्भ होगा। देश जातिवाद से ऊपर उठकर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ेगा। सवर्णों ने तो आरक्षण जैसी कलुषित व्यवस्था से भी छुटकारा मिलने के स्वप्न संजो लिए थे। लेकिन एस.सी./एस.टी. एक्ट के पुनः पारित होने के बाद वह स्वप्न अब पूरी तरह से टूट गया है। ऐसा नहीं है कि देश का दलित समाज इस सबके राजनीतिक निहितार्थ न समझ रहा हो। उसे भी प्रत्येक वस्तुस्थिति का भलीभांति ज्ञान हो चुका है। इसके बाद भी यदि सरकार को यह लगता है कि देश का दलित वर्ग अठारवीं शताब्दी की तरह सवर्णों द्वारा अभी भी सताया जा रहा है तो उसे अब समाज का मानसिक और कानूनी बटवारा करने के साथ-साथ भौतिक बटवारा भी कर देना चाहिए।

सरकार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति के लिए बिलकुल अलग आवास, विद्यालय और अस्पताल आदि बनवा देना चाहिए। साथ ही इन विद्यालयों में चपरासी से लेकर प्रधानाध्यापक तक तथा अस्पतालों के कर्मचारियों से लेकर चिकित्साधिकारी तक के सभी पद पूरी तरह से दलितों के लिए ही अरक्षित कर देने चाहिए। क्योंकि सरकारी विद्यालयों के अनेक अध्यापक तथा सरकारी अस्पतालों के अनेक चिकित्सक सवर्ण जाति के ही हैं। आगे भले ही न रहें। ऐसे में सवर्ण अध्यापकों द्वारा दलित छात्रों का तथा सवर्ण डॉक्टरों द्वारा दलित मरीजों का शोषण और उत्पीड़न होने की प्रबल सम्भावना सदैव बनी रहेगी। ऐसा ही लगभग हर क्षेत्र में होगा। यहाँ तर्क दिया जा सकता है कि इस तरह के उत्पीड़न को रोकने के लिए ही एस.सी./एस.टी. एक्ट बना है। कानून तो और भी बहुत से हैं देश में। फिर भी सब कुछ निर्वाध गति से चल रहा है। एस.सी./एस.टी. एक्ट के भय से यदि सवर्ण जाति के लोग दलितों का कथित उत्पीड़न बन्द कर देते तो अदालतों में इस एक्ट के तहत एक भी मुकदमा दर्ज न होता। सरकार यदि दलितों की सौ प्रतिशत सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है तो उसे कुछ अलग करना चाहिए। क्योंकि एस.सी./एस.टी. एक्ट के लागू होने के बाद सरकार दावे के साथ यह नहीं कह सकती है कि अब देश के किसी भी दलित को सवर्णों द्वारा सताया नहीं जायेगा।

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