Thursday, September 23, 2021 at 5:35 AM

चुनाव आते ही आरक्षण का जिन्न बाहर

 

-डा. अंजनी कुमार झा-

अखिल भारतीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा में ओबीसी को केंद्र सरकार ने 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर चुनावी बिगुल फूंक दिया। इससे पूर्व केंद्र सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार में ओबीसी को अप्रत्याशित प्रतिनिधित्व देते हुए 27 को मंत्री की ताज दी जिसमें पांच को कैबिनेट का दर्जा दिया। हिंदी भाषी क्षेत्रों विशेष रूप से उत्तरप्रदेश और बिहार जबकि दक्षिण में तमिलनाडु और कर्नाटक में संख्या कहीं ज्यादा होने के कारण मोदी सरकार ने यह पत्ता खेला। उन्हें अब ओबीसी पीएम भी कहा जाने लगा है। उत्तरप्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा और उसके दो वर्ष बाद लोकसभा चुनाव की पूर्व तैयारी है। यूपी और बिहार में ओबीसी की राजनीति करने वाली कई पार्टियों के पास अब भड़काने वाले मुद्दे समाप्त हो गए। जातिगत राजनीति के अड्डे बिहार में भी जदयू के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार और राजद के किंग लालू यादव ने जाति आधारित जनगणना की मांग फिर दुहराई। देश में जाति के आधार पर टिकट, नौकरी देने को लेकर सभी दलों में मची होड़ का ही परिणाम है कि हर पार्टी जातिगत संख्या के आधार पर सियासी शतरंज की बिसात पर कभी इसे तो कभी उसे आगे-पीछे करती रहती है। हवा के रुख को देखकर भाजपा ने ओबीसी मतदाताओं को रिझाने का काम अभी से शुरू कर दिया। इन दो हिंदी राज्यों के अलावा मध्यप्रदेश में भी ओबीसी आबादी के लिहाज से तीन-चौथाई हैं। विधानसभा चुनाव दो साल बाद होंगे। वैसे में एक तीर से कई निशाने। इस ताजे फैसले से हर साल ओबीसी श्रेणी के लगभग डेढ़ हजार छात्रों को एमबीबीएस में जबकि पीजी में ढाई हजार छात्रों को लाभ मिलेगा। विदित है कि वर्ष 2016 तक राष्ट्रीय स्तर पर आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट अखिल भारतीय मेडिकल कालेजों के लिए होता था, जबकि राज्य सरकार अलग और अपने स्तर पर परीक्षा आयोजित करती थी। वर्ष 2003 में पहली बार नीट अस्तित्व में आया। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2016 में इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट के सेक्शन 10 के तहत सभी मेडिकल कालेजों के लिए एक समरूप प्रवेश परीक्षा कराने की व्यवस्था दी। तबसे यह प्रणाली शुरू हो गई। वर्ष 2020 में 15 लाख 97 हजार छात्रों ने अपनी किस्मत आजमाई। वर्ष 2016 तक बिना किसी आरक्षण के फार्मूले के इम्तिहान होते थे। 31 जनवरी 2017 को अभय नाथ बनाम दिल्ली यूनिवर्सिटी की सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया कि अनुसूचित जाति के वर्गों के लिए 15 प्रतिशत जबकि अनुसूचित जनजाति के लिए साढ़े सात फीसदी आरक्षण दिए जाएं। मद्रास उच्च न्यायालय ने ओबीसी के आरक्षण को लेकर लंबित मामले में इस वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला सुना दिया।

इसी तर्ज पर सलोनी कुमारी के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2019 में निर्णय सुनाया था कि अब केंद्र को इसमें विलंब नहीं करना चाहिए। यह दीगर है कि मोदी सरकार ने आसन्न चुनाव की आहट के समय यह झुनझुना थमाया जिसमें ओबीसी वर्ग को चार हजार जबकि आर्थिक रूप से पीछे रह गए सामान्य वर्ग को 1550 सीटों का लाभ मिलेगा। अब केंद्र 102वां संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के मराठा आरक्षण फैसले में परिवर्तन कर सामजिक और शैक्षणिक रूप से पीछे रह गए लोगों को आगे लाना चाहती है। इसी के सहारे भाजपा महाराष्ट्र में खोए जनमत पर कब्ज़ा करना चाहती है। केवल केंद्र के आठ विभागों में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षित पद रिक्त हैं। सरकार के इस तरह के फैसलों का प्रतीकात्मक महत्त्व ज्यादा है। केंद्र ही नहीं, वरन राज्यों में भी हजारों पद रिक्त हैं। अनेक विभागों में भर्तियां तो निकलती हैं, किंतु आरक्षण के पेंच, नियुक्ति में भेदभाव, भ्रष्टाचार, प्रक्रिया में शिथिलता के कारण आवेदन पर आवेदन निकलते हैं। लिखित और मौखिक परीक्षा भी हो जाती है, किंतु नियुक्ति कितनी हो पाती है? वैसे भी उदारीकरण की आंधी ने सबसे अधिक सरकारी नौकरियों की गुंजाइश को रोका है। अब सरकारी नियम भी प्राइवेट की तरह हो रहे हैं। जैसे पेंशन को समाप्त करना और सुविधाओं में कटौती करते जाना। देश में प्राइवेट नौकरियों के साथ-साथ स्वरोजगार को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। केवल आयातित वस्तुओं, खासकर चीनी माल को नहीं खरीदने की पहल करने भर से आत्मनिर्भर भला हम कैसे हो सकते हैं? स्वाभिमान और स्वत खुद के सृजनात्मक कार्य से आ सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत जी ने तो अपने संबोधन में भी आरक्षण अत्यंत जरूरी हो, तभी देने की बात कही है। जाति के आधार पर भारत के बंटने का इतिहास लंबा है। विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपनी राजनीति चमकानी थी, इसलिए वह मंडल कमीशन को लागू कर केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो गए।

पूरे देश में खून-खराबे और करोड़ों की क्षति को भला कौन भूल सकता है? आखिरकार दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को भी इस पर मुहर लगनी पड़ी। फिर तो तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, राजस्थान समेत कई सूबों में आरक्षण सत्ता तक पहुंचने का एक सशक्त माध्यम बन गया। कभी भी संसद से लेकर विधानसभा के पटल पर यह बहस नहीं हो पाती है कि ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति तथा सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से रुग्ण परिवारों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन के क्या कारण हैं? भला ये कैसे दूर होंगे? जीवन स्तर को हमने केवल अर्थ अर्थात धन से जोड़ रखा है। क्या सभी समस्याओं का समाधान पैसों से है? उत्तर नहीं होगा। सामाजिक जड़ता को दूर करने में सरकार, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की कोई रुचि नहीं है। केवल और केवल आरक्षण समाधान नहीं है। यह आई वाश है। निरर्थक झुनझुने का कहां इस्तेमाल होगा सरकारी में जहां अवसर कम कर आउटसोर्सिंग पर काम कराए जा रहे हैं। ऐसे में हमें बांटने वाला समाज चाहिए या भेदभावरहित समाज जहां सभी को सम्मान और काम मेधा के आधार पर प्राप्त हो। आजाद भारत में डा. राम मनोहर लोहिया ने जात तोड़ो आंदोलन चलाया था। कबीर, तुलसी, दयानंद, विवेकानंद, अरविंद, चैतन्य महाप्रभु, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले, डा. अंबेडकर सहित लाखों संत, समाजसेवी, शिक्षाविदों की लंबी श्रृंखला है जिनके अनथक प्रयत्नों से भारत, भारत रह सका। इस थाती को सहेज कर रखने की आवश्यकता है।

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