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Thursday, October 21, 2021 at 8:33 PM

सम्पादकीय: परीक्षा प्रणाली

ऐसे समय में जब देश में शिक्षा सम्बन्धी प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की बात हो रही है, नयी रोजगारपरक शिक्षा नीति की बात हो रही है, वहीं अभी भी महत्वपूर्ण परीक्षाओं से पहले प्रश्न पत्र लीक होने की घटनाएं शर्मनाक हैं। तकनीकी विकास के बावजूद देश में परीक्षाएं मजाक बन गई हैं। कुछ वक्त पहले पंजाब में पुलिस भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हुआ तो अब राजस्थान में रीट का पेपर लीक होने से परीक्षार्थी मायूस व परेशान हैं। सभी को यह उम्मीद थी कि इंटरव्यू की शर्त खत्म होने से भ्रष्टाचार से राहत मिलेगी, लेकिन परीक्षा का पेपर लीक होने से अयोग्य परीक्षार्थी नौकरियों पर कब्जा करने के सफल होंगे। ईमानदार और पेपर खरीदने की सामर्थ्य नहीं रखने वाले परीक्षार्थी केवल सरकार को कोस ही सकते हैं।

विगत वर्षों में यही हाल सीबीएसई और विभिन्न राज्यों की दसवीं व बारहवीं की वार्षिक परीक्षाओं में देखा गया, जब कई विषयों के पेपर लीक होने के कारण परीक्षाएं रद्द होती रही। बार-बार परीक्षा होने के कारण विद्यार्थी मानसिक तनाव से गुजरते रहे। स्वतंत्रता के 74 वर्ष बाद भी नकल रहित या पेपर लीक होने की समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सका, उल्टा गैर-कानूनी तरीके से परीक्षाएं करवाने वाले खूब चांदी कूट रहे हैं। दरअसल देश का विकास और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण सामांतर नहीं हो रहा। भौतिक विकास तो हो रहा है लेकिन मानसिक रूप से व्यक्ति बेईमानी, रिश्वतखोरी जैसी कुरीतियों का शिकार होकर दूसरों के अधिकार छीनने पर उतारू है। यह तथ्य है कि बेरोजगारी की समस्या भी भयानक है और नौकरियों की कमी के कारण लोग नैतिकता भी दांव पर लगा रहे हैं। दरअसल वर्तमान समस्याओं को किसी एक पहलू से देखने की बजाय इसका बहुपक्षीय समाधान निकालना होगा। ईमानदारी और संतोष की भावना को बढ़ावा देना होगा, लेकिन यह तब संभव है यदि इसकी शुरूआत उच्च पदों पर बैठे राजनीतिक नेता करें। भ्रष्टाचार के खिलाफ जब भी शिकंजा कसा जाता है तब उसकी जड़ें राजनीति से जुड़ी हुई मिलती हैं। उच्च अधिकारी पैसे लेकर मामले को खुर्द-बुर्द कर देते हैं। ईमानदार नेता और अधिकारियों की कमी के कारण ही देश खोखला होता जा रहा है। यदि दोषी व्यक्तियों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, फिर ही भय पैदा होगा, लेकिन गैर-कानूनी कार्यों को अंजाम देने वालों को कहीं न कहीं यह भरोसा होता है कि वे कानूनी दांव-पेच से बच निकलेंगे। हमारे देश के लिए ‘बेईमानों का देश’ जैसे शब्द इस्तेमाल होना बेहद दु:खद है।वह भी तब जब केंद्र सरकार बेरोजगारी मिटाने और शिक्षा को प्रभावी बनाने की बात कर रही है,
ऐसे में हमारे सिस्टम को ईमानदारी की मिसाल कायम करने के साथ-साथ स्व:रोजगार में वृद्धि के प्रयास करने होंगे।