Friday, December 3, 2021 at 6:20 AM

सम्पादकीय: ममता के तेवर

पश्चिम बंगाल विजय के बाद यह साफ हो चुका था कि अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र में नरेंद्र मोदी का विकल्प बनने के लिए जुगत लगाना शुरू करेंगी। ममता ने हाल में कांग्रेस के 12 विधायकों को तोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल कर इस संदेश को और स्पष्ट कर दिया है कि वे मिशन 2024 की तैयारियों में जुटीं हैं और इसके लिए उन्हें कांग्रेस को भी प्रतिद्वंद्वी मानने में कोई हर्ज नहीं है। ममता बनर्जी ने हाल ही में पूर्व भाजपा नेता और क्रिकेटर कीर्ति आजाद, कांग्रेस के बड़े नेता और राहुल गांधी के करीबी अशोक तंवर, वरिष्ठ कांग्रेसी सुष्मिता देव, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कमलापति त्रिपाठी के पोते राजेश त्रिपाठी सहित अनेक बड़े नेताओं को भी तृणमूल कांग्रेस में शामिल कर पार्टी को भी मजबूती देने के संकेत दिए हैं। ममता  बनर्जी के इन कदमों को उनके महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय राजनीति के हिसाब से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर ही देखा जा रहा है।
ममता बनर्जी को अब अच्छी तरह समझ में आ चुका है कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में राष्ट्रीय स्तर पर भी वो पश्चिम बंगाल की तरह ही सफल हो पाएंगी।  बंगाल में ममता बनर्जी की लड़ाई भले ही लेफ्ट के खिलाफ रही और जीत भी कांग्रेस की मदद से ही मिली, लेकिन जीत को बरकरार रखने के लिए कांग्रेस को बर्बाद करना जरूरी था। ममता बनर्जी ने वही किया और अब दिल्ली पर नजर टिकी हुई है, हालांकि ममता ये भी जानती हैं कि दिल्ली बहुत दूर है। ममता के लिए सुभीते की बात यह भी है कि उन्हें दिल्ली में आप पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का खुला समर्थन है। शरद पवार भी उनके प्रति नरम भाव रखते हैं और यशवंत सिन्हा तो तृणमूल का हिस्सा हो ही गये हैं, भाजपा के पूर्व नेता और एक्टर शत्रुघ्न सिन्हा भी उनके साथ खड़े हैं। उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी नेता अखिलेश यादव ने बंगाल चुनाव के समय ममता को खुला समर्थन दिया था। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ममता को बंगाल में भाजपा के खिलाफ ठोस रणनीति के जरिए सत्ता दिलाई ही है और अब भी वे ममता से दूर नहीं हैं।
हालांकि दिल्ली की गद्दी की लड़ाई ममता बनर्जी के लिए तब तक असंभव है, जब तक कांग्रेस उनके रास्ते का रोड़ा बनी रहेगी, इसीलिए ममता बनर्जी अब बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ कर चैलेंज करने से पहले कांग्रेस को ही किनारे लगाने में जुट गयी हैं।
कांग्रेस का 12 विधायकों को गंवाना सोनिया गांधी के लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसा ही एक नया सबक है। ममता बनर्जी तो अखिल भारतीय मिशन पर निकली ही हैं जो भी हाथ बढ़ा रहा है खुल कर गले लगा रही हैं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के दरवाजे सभी के लिए खोल रखे हैं। नजर तो बीजेपी के असंतुष्टों और हाशिये पर भेज दिये गये नेताओं पर भी है, लेकिन प्राथमिकता सूची में कांग्रेस नेता ऊपर हैं।
कांग्रेस के 12 विधायक मिलना तृणमूल कांग्रेस के लिए जैकपाट जैसा है लेकिन पार्टी ऐसे छिटपुट नेताओं को भी साथ लेने की कोशिश कर रही हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व को ये समझने में मददगार हो कि ममता बनर्जी को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा।  मतलब विपक्ष के नेतृत्व का ठेका अनंत काल के लिए कांग्रेस के पास ही नहीं रहने वाला है। ममता बनर्जी को ये तो अच्छी तरह समझ में आ चुका है कि कांग्रेस की जिद के चलते विपक्ष एकजुट नहीं हो सकता।
हो सकता है ममता बनर्जी को लगता हो कि शरद पवार से मुलाकात न हो पाने की वजह भी कांग्रेस की ही कोई चाल रही हो।
साफ है मोदी सरकार और बीजेपी से दो-दो हाथ करने से पहले ममता बनर्जी कांग्रेस को किनारे लगाने में जुट चुकी हैं।