Monday, December 6, 2021 at 4:09 AM

दशहरा से लेकर शरदपूर्णिमा तक चलने वाला अनोखा प्रेम विवाहोत्सव

झांसी। लोक कलाओं, लोक कथाओं और लोक संस्कृति के मामले में अत्यंत समृद्ध बुंदेलखंड क्षेत्र त्योहारों खासकर नवरात्रि में उत्सवी वातावरण में रहता है। इसी अवसर पर बुंदेलखंड के सुआटा और टेसू जैसे लोकोत्सव पूरे 9 दिन धूम मचाए रहते हैं।  किसी को नहीं मालूम कि टेसू और झेंझीं( झिंझिया ) के विवाह की लोक परंपरा कब से पड़ी, पर यह अनोखी, लोकरंजक और अद्भुभुत परंपरा बुंदेलखंड को अलग पहचान दिलाती है,जो बृजभूमि और राजस्थान के कुछ इलाकों में भी उसी उत्साह से होती है जैसे बुंदेलखंड में।
 इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह परंपरा महाभारत के बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई होगी। क्योंकि यह लोकजीवन में प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित हुई थी इसलिए यह इस समाज की सरलता और महानता प्रदर्शित करती है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो युद्ध के दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई।यह महा पराक्रमी भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की कहानी है जो टेसू के रूप में मनाई जाती है। नाक, कान व मुंह कौड़ी के बनाए जाते हैं जिन्हें लड़कियां रोज सुबह पानी से उसे जगाने का प्रयास करती हैं। विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं। कहते हैं कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं।
विजयादशमी के दिन से शुरू होकर यह शादी का उत्सव यद्यपि केवल पांच दिन ही चलता है और कार्तिक पूर्णिमा को शादी सम्पन्न हो जाने के साथ ही समाप्त हो जाता है किंतु बच्चे इसकी तैयारी पूरी साल करते हैं। कानपुर से लेकर झांसी तक और कानपुर से उरई होते हुए इटावा तक और बृजभूमि से राजस्थान के कुछ गांवों में होती हुई मुरैना में यह प्रथा घुसती है और भिण्ड होते हुए दोनों ओर से बुंदेली धरती पर परंपरागत रूप से टेसू गीत गूंजने लगता थे। अपने कटे सिर से महाभारत को देखने वाले बर्बरीक की अधूरी प्रेम कहानी को पूरा कराकर भविष्य के नव जोड़ों के लिए राह प्रशस्त करने की ब्रज क्षेत्र में प्रचलित टेसू झांझी की परंपरा को मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की धरती सहेज रही है। कहीं बाकायदा कार्ड छपवाकर लोगों को नेह निमंत्रण दिया जाता है तो कहीं बैंड बाजा के साथ बारात पहुंचती है और टेसू का द्वारचार के साथ स्वागत किया जाता है। कहीं झांझी, कहीं झेंझी तो कहीं झिंझिया या झूंझिया, अलग-अलग नाम से जानी जाने वाली इस परंपरा का भाव समान है। टेसू-झांझी के विवाह के बाद ही इस क्षेत्र में शहनाई बजने की शुरुआत होती है।
एक दौर था जब गांव में छोटे छोटे बच्चे – बच्चियां टेसू-झांझी लेकर घर-घर से निकलते थे और गाना गाकर चंदा मांगते थे। इसके लिए टेसू झांझी समिति बनाई जाती थी। हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए जनाती बनता और एक परिवार टेसू की तरफ से बराती। कुछ इलाकों में शरद पूर्णिमा के दिन बृहद स्तर पर आयोजन होते । गांव-कस्बा, हर जगह आयोजन होता है। ट्रैक्टरों से बारात निकलती है। शहर में रथ व कारों के काफिले की बारात होती है। लोग यह भी मानते हैं कि अगर किसी लड़के की शादी में अड़चन आ रही है तो तीन साल झांझी का विवाह कराए, लड़की की शादी में दिक्कत आ रही है तो टेसू का विवाह कराने का संकल्प लेते हैं। कुंभकार ही टेसू झांझी बनाते हैं और लोग उनसे ले जाते हैं। इसके बाद शरद पूर्णिमा को झांझी की शोभायात्रा निकाली जाती है। दशहरा पर रावण के पुतले का दहन होते ही, बच्चे टेसू लेकर निकल पड़ते हैं और द्वार-द्वार टेसू के गीतों के साथ नेग मांगते हैं, वहां लड़कियों की टोली घर के आसपास झांझी के साथ नेग मांगने निकलती थे।
इधर “टेसू अटर करें, टेसू मटर करें, टेसू लई के टरें… यह गाना गाते हुए लड़कों की टोली उधर झांझी के विवाह की तैयारियों में जुटे किशोरियाँ भी झांझीं गीत गातीं। प्रयास किये जाते कि शादी से पहले झेंझी के एक झलक किसी भी प्रकार से टेसू को मिल जाएं।पर मजाल क्या की लड़कियां यह सब होने देतीं। दशहरा मेला में लड़कियां झांझी और लड़के टेसू के नाम की मटकी खरीदकर लाते थे। झांझी कन्या के रूप में टेसू को राजा के रूप में रंग कर टेसू वाली मटकी में अनाज भर कर एक दीया जलाते थे और घर घर जाकर अनाज और धन इकट्ठा करते थे। लोग बच्चों को इस आयोजन में खुले दिल से सहयोग करते और विवाह की रात पूरा साथ देते थे।
ऐसे होता है विवाह :- टेसू-झेंझी नामक यह खेल बच्चों द्वारा नवमी से पूर्णमासी तक खेला जाता है। इससे पहले 16 दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेलती हैं। वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियों में लग जाती हैं। पूर्णमासी की रात को टेसू-झेंझी का विवाह पूरे उत्साह के साथ बच्चों द्वारा किया जाता है। वहीं मोहल्ले की महिलाएं व बड़े-बुजुर्ग भी इस उत्सव में भाग लेते थे। प्रेम के प्रतीक इस विवाह में प्रेमी जोड़े के विरह को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया जाता है।