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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का हाथ फिर खाली

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का हाथ फिर खाली
नई दिल्ली। पांच राज्यों के चुनाव में एक बार फिर खाली हाथ रही कांग्रेस अपनी हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम साबित हो रही है। विशेषकर असम और केरल जैसे राज्यों में तमाम संभावनाओं के बावजूद पार्टी की शिकस्त से साफ हो गया है कि कांग्रेस अपनी रणनीति व नेतृत्व की चूकों से अब भी कोई सबक नहीं ले पाई है।
कांग्रेस नेतृत्व सत्ता विरोधी माहौल के बाद भी जनमत को लुभाने में नहीं हुआ कामयाब 
इन चुनाव नतीजों से यह भी साफ झलक रहा है कि कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व सत्ता विरोधी माहौल के बाद भी जनमत को लुभाने में कामयाब नहीं हो पा रहा है।
कांग्रेस के लचर चुनावी प्रदर्शन से पार्टी में बढ़े उठापटक के आसार
कांग्रेस के नए अध्यक्ष के चुनाव से ठीक पहले इस लचर चुनावी प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी में एक बार फिर उठापटक के आसार बढ़ गए हैं, क्योंकि पार्टी के असंतुष्ट समूह (जी-23) के नेताओं की ओर से कांग्रेस के लगातार सिकुड़ते आधार को लेकर जो सवाल उठाए गए थे, वे अब कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।
कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं की पांच राज्यों के चुनाव में कोई भूमिका नहीं थी
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए पार्टी के मौजूदा हालात को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देना भी इन नतीजों के बाद आसान नहीं होगा। खासतौर पर इसलिए भी पार्टी की कमजोर हालत और नेतृत्व की दुविधा को लेकर सवाल उठाने वाले असंतुष्ट नेताओं की पांच राज्यों के चुनाव के दौरान कोई भूमिका नहीं थी।
कांग्रेस असम और केरल में सत्ता की दावेदार होने के बावजूद जीत से बहुत दूर रह गई
चुनावी रणनीति का संचालन पूरी तरह कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व और उनके करीबी पार्टी रणनीतिकारों के हाथ में ही रहा। इसके बावजूद कांग्रेस असम और केरल जैसे दो अहम राज्यों में सत्ता की दावेदार होने के बावजूद जीत से बहुत दूर रह गई। ऐसे में असम में बदरूदीन अजमल की पार्टी से गठबंधन करने का रिस्क लेने से लेकर केरल में केरल कांग्रेस मणि जोसेफ को एलडीएफ गठबंधन में जाने देने का सियासी खामियाजा भुगतने जैसी चूक की जवाबदेही को लेकर अंदरखाने सवाल उठाने पर ¨चतन-मनन शुरू हो गया है।
कांग्रेस नेतृत्व का सबसे ज्यादा जोर केरल और असम पर ही था
हकीकत यह भी है कि इन पांच राज्यों के चुनाव के दौरान कांग्रेस नेतृत्व का सबसे ज्यादा जोर केरल और असम पर ही था। राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने इन दोनों सूबों में सबसे ज्यादा चुनावी सभाएं भी कीं। कांग्रेस के असंतुष्ट समूह के एक वरिष्ठ नेता का इस बारे में कहना था कि केरल और असम में तो गांधी परिवार की राजनीतिक अपील अब तक रही थी फिर भी एलडीएफ चार दशक का रिकार्ड तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता में वापस लौट आई है।
कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने में असफल रहा
असम में भाजपा ने भी यही कहानी दोहराई है। इससे साफ झलकता है कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने में सक्षम साबित होता नजर नहीं आ रहा। द्रमुक के साथ गठबंधन के कारण तमिलनाडु में वह सत्तारूढ़ खेमे की साझेदार भले बन जाए मगर सियासी हकीकत तो यही है कि पांच राज्यों के चुनाव में राजनीतिक रूप से कांग्रेस की झोली में कुछ भी नहीं आया है।
कांग्रेस का सूबों में सियासी आधार लगातार घट रहा
इतना ही नहीं कांग्रेस को अपनी अंदरूनी राजनीतिक चुनौती में भारी इजाफे के साथ अब ज्यादा मजबूत होकर उभरे क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को थामने की दोहरी चुनौती होगी। बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन के मजबूत होने से साफ हो गया है कि एक ओर जहां सूबों में कांग्रेस का सियासी आधार लगातार घट रहा है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय पार्टियां व उनके नेता राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी राजनीति में उसकी जगह के लिए बड़ा खतरा बनते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस के सामने मंडराता दोहरा संकट
कांग्रेस के भविष्य के सामने मंडराते इस दोहरे संकट के चलते पार्टी नेताओं का बेचैन होना स्वाभाविक है। यूपीए सरकार में कानून मंत्री रहे वरिष्ठ पार्टी नेता अश्विनी कुमार का पांच राज्यों के चुनाव नतीजों को कांग्रेस के लिए 2024 के चुनाव के मददेनजर 'एसओएस कॉल' बताया जाना इसी का सबूत है। उन्होंने कहा कि संगठन की खामियों और संवाद की कमी को पाटना अब अपरिहार्य हो गया है।
कांग्रेस को लोगों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाना होगा
उनके मुताबिक कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है तो लोगों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाना होगा और इसके लिए जरूरी है कि पार्टी लोकप्रिय जनभावना की पहचान करते हुए अपना सही संदेश पहुंचाए। हालांकि अश्विनी कुमार ने कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के प्रति पूरा भरोसा भी जताया और कहा कि इस हालत में सोनिया गांधी का नेतृत्व ही पार्टी को एकजुट रखने के लिए जरूरी है। उनकी इस बात से साफ है कि कांग्रेस के नए अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी को फिर से वापस लाने की पहल होगी तो पार्टी की एकजुटता डांवाडोल हो सकती है।

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