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कांग्रेस का ' हनक ' विहीन नेतृत्व

Navjot
कांग्रेस का ' हनक ' विहीन नेतृत्व 
नयी दिल्ली (राकेश अचल)। पंजाब कांग्रेस की कमान अंतत:नवजोत सिंह सिद्धू को सौंपकर कांग्रेस ने एक बार फिर जाहिर कर दिया है कि पार्टी नेतृत्व की ' हनक 'अब समाप्त हो गयी है। कहने को ये कांग्रेस का अंदरूनी संगठनात्मक मामला है लेकिन जब ये मामला खुल्ल्मखुल्ला अखबारों की सुर्खी बन चुका है तो इस पर लिखने का हक सभी को मिल जाता है। आम धारणा बन गयी है कि कांग्रेस हाई कमान के पास अब बागियों से निबटने की कूबत नहीं रही। 
राजनीतिक दलों में ' बगावत ' कोई नयी बात नहीं है‌। आजादी के पहले की कांग्रेस से लेकर आज की सत्तारूढ़ भाजपा में ' बगावत ' होती रही है, लेकिन अधिकाँश मामलों में मुंह की बागियों को ही पड़ती है। पिछले कुछ सालों से कांग्रेस में बगावत एक स्थायी राजनीतिक भाव बन गया है। कांग्रेस के केंद्रीय संगठन से लेकर जिला इकाइयों तक में ये बीमारी फ़ैल चुकी है ,और ये सब हो रहा है कांग्रेस के नेतृत्व की हनक ' समाप्त होने की वजह से। नेतृत्व की ' हनक ' ही वो चीज है जो किसी पार्टी को ताकतवर या कमजोर बनाती है। 
अतीत में झांकिए तो आप पाएंगे कि जिस पार्टी के नेतृत्व ने जब-जब ' हनक' खोई है,तब, तब उसे बगावत का सामना करना पड़ा है। इस बगावत की वजह से पार्टियां टूटी हैं, दो फाड़ हुई हैं। यहाँ तक कि बिखर कर अनेक टुकड़ों में बंट चुकी हैं‌। आज भाजपा और वामदलों को छोड़कर देश के राजनीतिक फलक पर जितने भी दल आप देख रहे हैं वे किसी न किसी दल की बगावत का उत्पाद हैं। सबसे ज्यादा बिखराव कांग्रेस में हुआ, दूसरे नंबर पर समाजवादी दल आता है। आज हालात ये हैं कि आपको भाजपा समेत हरेक पार्टी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के ये उत्पाद मिल जायेंगे। 
बहरहाल बात पंजाब की हो रही है। कल का ' उड़ता पंजाब ' आज फिर से उड़ता दिखाई दे रहा है। यहाँ कांग्रेस सत्तारूढ़ दल है और इसी में अब बगावत को पंख लग चुके हैं। पार्टी हाईकमान ने बाग़ी नवजोत सिंह सिद्धू के सामने समर्पण करते हुए उन्हें पार्टी की पंजाब इकाई का अध्यक्ष बना दिया है। ये बात अलग है कि पार्टी की निर्जीव होती संगठनात्मक काया का बोझ उठाने के लिए चार कार्यवाहक अध्यक्ष भी नत्थी कर दिए हैं। 
आपको याद होगा कि बीते दो साल में कांग्रेस ने हिंदी पट्टी में मध्यप्रदेश, राजस्थान में इसी तरह की बगावत का सामना किया था और लम्बे चले नाटकों के बाद जहां मध्य प्रदेश में अपनी जनादेश से बनी सरकार गंवा दी थी वहीं राजस्थान में बगावत को जैसे तैसे थाम लिया था, लेकिन पंजाब में बगावत कामयाब हो गयी। लगता है कि कांग्रेस हाईकमान मध्यप्रदेश की तरह अपनी सरकार को गंवाना चाहता था,लेकिन राजनीतिक नजरिये से देखें तो कांग्रेस ने सरकार तो गंवा दी है। जिस चेहरे को लेकर उसे आगामी विधानसभा चुनाव में उतरना था उसे खुद कांग्रेस हाईकमान ने अविश्वसनीय और कमजोर बना दिया। 
एक कड़वी और सच्ची हकीकत ये है कि हिंदी पट्टी में कमजोर होने की वजह से ही कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई है और उसने अभी तक सात साल बाद भी अपने आपको इसी हिंदी पट्टी में मजबूत नहीं किया है। लगता है कि कांग्रेस है कमान को इस बात का भरोसा नहीं रह गया है कि उसके मौजूदा सिपाहसालार जंग के लायक बचे हैं। अपने राज्यों के नेतृत्व के प्रति पार्टी हाईकमान का अविश्वास ही कांग्रेस को कमजोर कर रहा है। कांग्रेस भूल जाती है कि राज्यों के विधान सभा चुनाव उसने जहाँ भी जीते वे पार्टी अध्यक्ष के चेहरे के बूते पर नहीं जीते थे। राज्यों के स्थानीय चेहरों ने ही भाजपा से सत्ता छीनी थी। 
पंजाब में मुख्यमंत्री के खिलाफ लामबंद हुए नवजोत सिंह सिद्धू के सामने समर्पण कर चुके कांग्रेस हाईकमान को अब एक बार फिर से राजस्थान और मध्यप्रदेश के बारे में भी सोचना पडेगा। इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के भीतर असंतोष बरकरार है। मध्यप्रदेश में सरकार गंवाने के बावजूद कांग्रेस ने वहां नेतृत्व परिवर्तन नहीं किया है। बूढ़े कमलनाथ मध्यप्रदेश में पार्टी की प्रदेश इकाई के भी अध्यक्ष हैं और प्रतिपक्ष के नेता भी। कांग्रेस यहां जोखिम लेने की स्थिति में है ही नहीं। मध्यप्रदेश में राहुल गांधी कांग्रेस के कर्णधार नहीं हैं ,और जो हो सकते हैं उन्हें हाई कमान कमान सौंपने को राजी नहीं है। 
मध्यप्रदेश के बाद राजस्थान में भी पंजाब जैसे ही हालात हैं। यहां बगावत कर चुके सचिन पायलट फौरी तौर पर चुपचाप बैठे हैं लेकिन सिद्धू को मिली कामयाबी के बाद मुमकिन है कि पायलट एक बार फिर बगावत से भरा अपना यान लेकर उड़ान भरने की कोशिश करें। हालाँकि सिद्धू और पायलट में जमीन आसमान का फर्क है। पायलट राजस्थान में अपनी संगठनात्मक प्रतिभा का परिचय दे चुके हैं जबकि सिद्धू को ये पराक्रम अब दिखाना है। वे कोरोनाकाल के परीक्षार्थियों की तरह बिना परीक्षा दिए उत्तीर्ण घोषित किये गए हैं। 
आज के हालात देखते हुए पंजाब कांग्रेस के हाथ से उड़ता नजर आ रहा है। यहां आप की राजनीतिक उपस्थिति पहले से है। अकाली दल और बहुजन समाजवादी पार्टी साथ-साथ हैं ही और कोई बड़ी बात नहीं कि विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते भाजपा भी यहां किसी न किसी को अपना साथी बना ले। पंजाब में कांग्रेस के लिए सत्ता की लड़ाई दो तरफा है‌। एक तरफ उसे अपने ही बागियों से लड़ना है और दूसरी तरफ भाजपा,अकाली दल और आप से। सिद्धू अगर कुर्सी के लालच में अभी बगावत नकारते तो मुमकिन था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह और सिद्धू की जोड़ी मैदान मार लेती ,लेकिन अब कांग्रेस की कलई खुल चुकी है। 
कांग्रेस के लिए पंजाब जीतना इसलिए भी कठिन है क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व के पास अब ऐसे विषम समय के लिए कोई संकट मोचक बचा ही नहीं है। सोनिया गांधी जी की टीम के तमाम लोग बूढ़े हो गए हैं या उन्हें भी भाजपा के बूढ़े नेताओं की तरह अघोषित मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया है। कांग्रेस से जितने बाग़ी दूसरे राजनीतिक गिरोहों में शामिल होना था, वे हो चुके हैं,बचे-खुचे चुनावों से दो-चार महीने पहले कांग्रेस का डूबता जहाज छोड़ भागेंगे, क्योंकि उनके सामने भाजपा की राजनीतिक धर्मशाला के दरवाजे चौबीस घंटे खुले हुए हैं। 

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