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सम्पादकीय: जितिन प्रसाद का जाना

सम्पादकीय: जितिन प्रसाद का जाना

बुधवार को कांग्रेस नेता और भावी कांग्रेस अध्यक्ष माने जा रहे राहुल गांधी की किचन कैबिनेट के एक और अहम सदस्य जितिन प्रसाद उनका साथ और पार्टी छोड़ कर भाजपा का हाथ पकड़ लिए हैं। जितिन प्रसाद भी कांग्रेस की उस चांडाल चौकड़ी से परेशान थे जो कांग्रेस को धीरे धीरे नेस्तनाबूद करने में जुटे हैं। जितिन की २०१९ में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने की चर्चा थी लेकिन बताया जाता है कि उस समय वे प्रियंका गांधी की मान मनौव्वल पर रुक गये थे लेकिन इस बार उन्होंने किसी की नहीं सुनी। बताया जा रहा है कि उन्होंने दो दिन से अपना फोन भी बंद कर रखा था ताकि कांग्रेस छोड़ने में कोई अड़चन न आए। बुधवार को उन्होंने पीयूष गोयल के साथ भाजपा कार्यालय जाकर पार्टी ज्वाइन की। उससे पहले वे भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई भाजपा नेताओं से भी मिले थे। बहरहाल जितिन प्रसाद के कांग्रेस छोड़ने से राहुल की यंग ब्रिगेड से एक और सदस्य कम हो गया। इस ब्रिगेड के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी छोड़ कर इस सिलसिले की शुरुआत की थी। फिर सचिन पायलट भी लगभग पार्टी छोड़ कर जा ही चुके थे लेकिन वे भी प्रियंका के मनाने पर रुक गये और उन्हें राजस्थान का उप मुख्यमंत्री बनाया गया। जितिन प्रसाद भी उस G -23 के सदस्य थे जो कांग्रेस में जल्द प्रभावी अध्यक्ष की मांग कर रही है। जितिन के पिता जितेंद्र प्रसाद भी कांग्रेस के कोर कमेटी के सदस्य रहे हैं और शाहजहांपुर से आते हैं। उनकी छवि एक निर्विवाद और साफ सुथरे, ईमानदार नेता की है। उनके पार्टी छोड़ कर जाने से कांग्रेस को बड़ा नुक़सान उठाने के साथ राहुल को भी व्यक्तिगत रुप में निजी क्षति भी होगी क्योंकि जिस युवा शक्ति को राहुल आगे कर भविष्य की पार्टी और देश की कल्पना कर रहे हैं वह उन्हें एक -एक कर छोड़ती जा रही है। दरअसल राहुल स्वयं भी राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं है और इसे कई बार वे सार्वजनिक रुप से जाहिर भी कर चुके हैं लेकिन कांग्रेस निरंतर उन्हें अध्यक्ष बनाने के प्रयास में है। राहुल चाहते हैं कि जब वे अध्यक्ष बनें तो उन्हें इस बात की स्वतंत्रता मिले कि वे कांग्रेस की अपने मुताबिक टीम बना सकें और इसमें युवाओं की भारी भूमिका हो। लेकिन दिक्कत ये है कि पार्टी के वरिष्ठ कांग्रेसी इसके लिए तैयार नहीं हैं और वे निरंतर सोनिया गांधी को ये जताते रहते हैं कि राजनीति में अकेले चलने के लिहाज से राहुल अभी अपरिपक्व हैं। सोनिया की मजबूरी है कि वे राहुल के अलावा किसी गैर गांधी परिवार के सदस्य को अध्यक्ष बनाना नहीं चाहतीं और राहुल की नेतृत्व क्षमता उनके संदेह के घेरे में है। ऐसे में राहुल की टीम हताश हो रही है। जहां युवा कांग्रेसी मेहनत, मशक्कत कर पार्टी को जिंदा करते हैं, जीत दिलाते हैं, पार्टी के शक्तिशाली होते ही बुजुर्ग कांग्रेसी उच्च पदों पर आसीन हो जाते हैं। हालिया समय में मप्र और राजस्थान उदाहरण हैं जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट ने मेहनत की और उन्हें आशा थी कि सफलता प्राप्त होने पर पार्टी इसका इनाम देगी तो कमलनाथ और गहलौत को मुख्यमंत्री बना दिया गया। असम में भी हेमंत विस्व शर्मा के कांग्रेस छोड़ने का यही कारण था। भाजपा ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और नतीजा उन्होंने दो बार लगातार भाजपा के असम में सत्ता में आने का रास्ता साफ किया। कांग्रेस जबरदस्त अंतर्विरोधों से जूझ रही है और यही उसकी असफलता का कारण है। सोनिया की निर्णय क्षमता भी अब संदेह के घेरे में है। प्रियंका को चाहने वालों की भी एक अलग लाबी है जो उन्हें शक्तिशाली होते देखना चाहती हैं। हालांकि प्रियंका सार्वजनिक रुप से इस बात को नकार चुकी हैं और कह चुकीं हैं कि राहुल ही कांग्रेस और देश के भावी नेता हैं और वे उनके पीछे खड़ी हैं। लेकिन उनके बच्चों और पति राबर्ट वाड्रा का सार्वजनिक रैलियों और कार्यक्रमों में मौजूद रहना काफी कुछ कहता है। माना यही जा रहा है कि  यूपी में प्रियंका गांधी के आने के बाद से जितिन प्रसाद को साइड लाइन कर दिया गया। पार्टी के कार्यक्रमों में भी उनको कम तवज्जो मिलती थी। हालांकि जितिन ने कभी खुलकर इसको जाहिर नहीं किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव और पार्टी को ज्यादा सजीव बनाने के लिए पत्र लिखा था। यह जरुरी है कि कांग्रेस अपने बड़े नेताओं की भूमिका तय करें और अगर राहुल की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी होनी है तो उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार दिए जायें। वरना कल सिंधिया थे, आज जितिन, कल कांग्रेस मेधावी नेताओं को खोती जाएगी और भाजपा मप्र, असम आदि की तरह अपनी झोली भरती जाएगी।


 

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