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Today's Paper

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लापरवाही:गांव में प्रशासन को कोरोना विस्फोट का इंतजार

- पंचायत चुनाव के मद्देनजर हर गांव में जुट रही है भीड़

- तहसील व ब्लॉक मुख्यालय पर रहता है जमघट

- ग्रामीण इलाके में रात्रि में चलता है चुनाव प्रचार

- न मॉस्क, न दो गज की दूरी, उम्मीदवारों के साथ साथ वोटर भी बरत रहे भारी लापरवाही

अजय सिंह चौहान

लखनऊ,08 अप्रैल(तरुणमित्र)।लखनऊ में बढ़ते कोरोना संक्रमण को देखते हुए रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाने का निर्णय लिया गया है। यह गुरुवार की रात से प्रभावी होगा। रात में नौ बजे से सुबह छह बजे तक का कर्फ्यू नगर निगम सीमा के लिए ही लागू किया गया है।बुधवार को देर रात बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण की स्थिति की समीक्षा के बाद यह निर्णय जिलाधिकारी अभिषेक प्रकाश द्वारा लिया गया है। फिलहाल 16 अप्रैल तक रात्रिकालीन कर्फ्यू की व्यवस्था रहेगी। इसके अलावा मास्क और कोविड दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन कराने के लिए भी टीमें गठित की गयीं हैं। ग्रामीण इलाकों को त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की वजह से फिलहाल कर्फ्यू से छूट दी गई है। 

        लेकिन यहां पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि कोरोना काल लखनऊ सहित सूबे में लगातार बढ़ रही कोविड संक्रमितों की संख्या को देखते हुए प्रशासन राजधानी के शहरी इलाकों में तो कोविड गाइडलाइंस का अनुपालन करवाने के लिए सख़्ती बरतते हुए रात्रिकालीन कर्फ़्यू लगा रहा है। किंतु गांव की सरकार चुनना कहीं लोगों को भारी ना पड़ जाए, क्योंकि पंचायत चुनाव में सोशल डिस्टेंसिंग और कोविड प्रोटोकॉल सुनिश्चित कराना प्रशासन को एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। क्योंकि गांवों में प्रधान,सदस्य, क्षेत्र पंचायत व जिला पंचायत सदस्य के चुनावों में नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद से चौपाल पर चर्चा,दारू मुर्गा पार्टी व चाय-पानी के साथ प्रचार होना शुरू हो चुका है। लेकिन, यह चुनाव आमजन पर कोरोना महामारी के रूप में भारी पड़ सकता है।क्योंकि नेताजी अपने अपने समर्थकों की फ़ौज के साथ वोटरों के पास घर-घर जा रहे हैं। एक बार नहीं वह अपने वोट पक्के करने के लिए दर्जनों बार एक-एक घर में दस्तक दे रहे हैं। उनमें अगर कोई एक भी संक्रमित हुआ तो अनगिनत लोगों तक वायरस पहुंच सकता है। फिर गावों में तो कई जने मिलकर हुक्का पीते हैं। चाय-पानी से ही चुनावों की चर्चा शुरू होती है। ऐसे में गांवों में चुनावों के समय कोरोना संक्रमण फैलने का सबसे अधिक खतरा हो गया है।

गांव की सरकार' बनाने को लौटने लगे महानगरों में कमाने वाले

पिछले साल आए तो 'लक्ष्मण रेखा' खींची थी। मगर अब ऐसा कुछ नहीं है। चुनाव के चलते गांवों में गहमागहमी का माहौल है। तो वहीं कोरोना संक्रमण को भूलकर गांव की सरकार बनाने के लिए लोगों में खूब जोर आजमाइश शुरू है।लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र के 494 गांवों में पंचायत चुनाव के लिए प्रथम चरण का नामांकन खत्म हो चुका है। समर्थक अपने प्रत्याशी के जिंदाबाद के नारों में मशगूल हैं, लेकिन इस बीच सवाल यह है, कि आखिर प्रदेश में बढ़ते कोरोना को कैसे रोका जाएगा? दरअसल, जानकारों की चिंता इस बात की है कि गांव की सरकार बनाने के लिए जो प्रवासी मजदूर वापस आ रहे हैं।उनको कैसे सरकार ट्रेस करेगी? सवाल यह भी है कि कहीं इनकी वजह से तो कोरोना के आंकड़ों में बढ़ोत्तरी तो नहीं हो रही है? 

 कोरोना संक्रमण अब शहर से गांवों की तरफ रुख कर चुका है। लखनऊ जिले के गांवों में अनेक कोरोना मरीज मिल चुके हैं। इसके बावजूद कोरोना से लड़ने की तैयारी नहीं दिख रही है। स्थानीय प्रशासन जहां उदासीन बना है, वहीं जनता भारी लापरवाही बरत रही है। लोग न मॉस्क लगा रहे हैं, न दो गज की दूरी का पालन कर रहे हैं।उन्होंने यह भी कहा कि पँचायत चुनाव के चलते ब्लॉक व तहसील मुख्यालय पर भीड़ जमा रहती है। नामांकन के लिए लोगों के हुजूम आ रहे हैं। दूसरी तरफ गांव में उम्मीदवार टोली बनाकर अपना प्रचार कर रहे हैं। शाम से देर रात तक गांव में जनसंपर्क चलता है। ऐसे में कोरोना संक्रमण बढ़ने की आशंका है।चुनाव आयोग को चाहिए कि इस पर सख़्ती बरतते हुए उचित कार्रवाई करे।

बृजेश शुक्ला

वरिष्ठ पत्रकार

पंचायत चुनावों का एलान 23 मार्च को हुआ है। जिसके बाद गहमागहमी बढ़ी है। ऐसे में कोरोना के बढ़ते आंकड़े इस ओर ही इशारा कर रहे हैं। हालांकि सरकार ने इनको ध्यान में रखते हुए गांव की निगरानी समितियों को एक्टिव कर दिया गया है। लेकिन जिला प्रशासन संक्रमण को रोकने के लिए गांवों में अभी सिर्फ खानापूर्ति कर रहा है।

रामकुमार सिंह

वरिष्ठ अधिवक्ता लखनऊ

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