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Today's Paper

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जीवन बचाने में असफल सरकार चिता की लकड़ी ही मुहैय्या करा दे ?

Should the government fail to save lives, make the wood of pyre clean?

-निर्मल रानी

 

देश इस समय जिन प्रलयकारी परिस्थितियों का सामना कर रहा है उसकी तो शायद वर्तमान पीढ़ी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मंहगाई, बेरोज़गारी, कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था के इस दौर में ही जिस तरह नामुराद कोविड-19 ने भी हमारे देश में अपना पैर पसारा है इस स्थिति ने तो गोया करोड़ों लोगों के लिए जीते जी रोज़ाना मरने जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। लोगों का काम-धंधा-रोज़गार-नौकरी आदि तो चौपट हो ही चुका है साथ साथ कोरोना के तेज़ी से होते होते जा रहे प्रसार ने भी आमजन को बुरी तरह भयभीत कर दिया है। देश का मीडिया जहां प्रायः रोज़ाना के कोरोना संक्रमितों के बढ़ते आंकड़े पेश करता है वहीं कोविड से रोज़ाना होने वाली मौतों की सरकारी व ग़ैर सरकारी संख्या भी बताता रहता है। इनमें दो तरह के दृश्य प्रायः सबसे भयावह व मानव संवेदनाओं को झकझोर कर रख देने वाले होते हैं। एक तो अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे बेड, ऑक्सीजन, दवा तथा उपयुक्त देखभाल के अभाव के चलते लोगों के दम तोड़ने के दृश्य व उनके परिजनों का ग़ुस्सा व उनकी लाचारगी । दूसरे, देश के शमशानों व क़ब्रिस्तानों में शवों की लंबी क़तारें तथा एक साथ दर्जनों चिताओं के जलने जैसे हृदय विदारक दृश्य। प्राप्त समाचारों के अनुसार कोरोना के प्रकोप ने कई ऐसे घरों में अपना क़हर ढाया जहां कहीं पूरा परिवार काल की गोद में समा गया तो कहीं किसी को विधवा या किसी को अनाथ कर गया। कहना ग़लत नहीं होगा कि देश कोरोना लहर की समाप्ति के बाद इस तरह के बड़े संकट का सामना भी करने वाला है जबकि ऐसे लाखों लोग बेसहारा, मजबूर व बेबस दिखाई देंगे जिनके परिवार के मुखिया या कमाई करने वाले सदस्य कोरोना की भेंट चढ़ गए।

 

बहरहाल केंद्र व विभिन्न राज्यों की सरकारें अनुकंपा के आधार पर आम लोगों के आंसू पोछने की कोशिश कर रही हैं। कहीं लोगों को कुछ राशन सामग्री देने की घोषणा की गयी है तो कहीं गुज़र बसर करने की ग़रज़ नक़द धनराशि देने की बात कही गयी है। निश्चित रूप से सांत्वना स्वरूप अनुकंपा के आधार पर दी जाने वाली सहायता मंहगाई के इस दौर में भले ही ऊंट के मुंह में ज़ीरा की मानिन्द क्यों न हो फिर भी यह स्वागत योग्य है। परन्तु ज़रा कल्पना कीजिये कि एक मध्यम या निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में कोरोना का शिकार व्यक्ति या व्यक्तियों के मंहगे इलाज व मुंह मांगे दामों पर ख़रीदे गए ऑक्सीजन व दवाइयों के ख़र्च से ही वह परिवार टूट चुका हो ऊपर से उसी परिजन के मरणोपरांत उसे दाह संस्कार के लिए चार-छः गुना मंहगी क़ीमत पर लकड़ियां भी ख़रीदनी पड़ें और संस्कार संबंधी सामग्रियों को भी अत्यधिक मंहगे मूल्यों पर ख़रीदना पड़े ऐसे में परिवार का भुक्तभोगी सदस्य स्वयं को भी मृतप्राय ही समझेगा। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस प्रलयकारी वातावरण में जहाँ हर ओर मौत का सन्नाटा पसरा हुआ है, शमशानों में चिताओं के जलने के निरंतर दृश्य सामने हों। और इस भयावह घड़ी में पीड़ित लोगों से सहानुभूति रखने वाले तमाम मददगार हाथ उठ खड़े हुए हों, कोई अपनी ज़मीन बेचकर तो कोई अपनी मंहगी कार बेचकर कोरोना संकट से प्रभावित लोगों की मदद कर रहे हों वहीं कुछ दुष्ट प्रवृति के ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने इस आपदा को अपने लिए अवसर समझ लिया है। शायद उन्हें यह मुग़ालता है कि वे मरेंगे भी नहीं, उनका कोरोना कुछ बिगड़ेगा भी नहीं और यदि मरे भी तो पैसा शायद उनकी चिता के साथ ही जाएगा।

 

ऐसे ही लोग एम्बुलेंस में रोगी से लेकर शव तक के लाने ले जाने के लिए 5-10 व 15 किलोमीटर की दूरी के 5 हज़ार से लेकर 25 हज़ार रूपये तक मांग रहे हैं। किसी के परिजन का शव चिलचिलाती धूप में लाशों की क़तार में है तो वहां सक्रिय दलाल संस्कार हेतु पहले नंबर लगाने के मोटे पैसे मांगते हैं। कुछ ख़बरें ऐसी भी आती हैं कि कोरोना से मौत होने की वजह से मृतक के परिजन भी या तो दूर रहते हैं या शमशान से ग़ायब ही हो जाते हैं।जहां जहां विद्दयुत शवदाह गृह हैं वहां औसतन एक घंटे में एक लाश को जलाया जा रहा है। निरंतर विद्युत शवदाह गृह चलने की वजह से कहीं कहीं ख़राबी पैदा हो जाती है। ऐसे में मुंह मांगी क़ीमत पर लकड़ी ख़रीदना मजबूरी बन जाती है। वाराणसी जैसी धर्मनगरी से एक समाचार तो यह भी मिला कि बेरोज़गार युवाओं की एक टोली गंगा घाट पर पहुंचने वाले शवों को कन्धा देने के भी पांच हज़ार रूपये तक वसूल रही है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सदस्य कोविड से देहांत होने की वजह से स्वयं साथ नहीं आते ऐसे में अपनी जान हथेली पर रखकर बेरोज़गार लोग कन्धा देते हैं जिसकी वे क़ीमत मांगते हैं।

 

कुल मिलाकर एक तो व्यवसाय चौपट, रोज़गार ख़त्म ऊपर से मंहगाई के इस दौर में कोविड जैसी बीमारी की मार और इन सब के बाद कोविड प्रभावित का देहांत हो जाना ऐसा ही है जैसे मरे हुए व्यक्ति पर बार बार और प्रहार करना। इन हालात में केंद्र व कुछ राज्यों की सरकारें जहां राशन व नक़द पैसे देकर देश के ग़रीबों की मदद करना चाह रही हैं। जहां कोविड वैक्सीन निःशुल्क लगाई जा रही हो। वहीं कोविड प्रभावित ग़रीबों के लिए कोविड का इलाज पूरी तरह निःशुल्क किया जाना चाहिए। ऐसे ग़रीब मरीज़ों या कोविड मरीज़ों के मरणोपरांत उनके शवों को लाने ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था भी सरकारी ख़र्च पर की जानी चाहिए। यहां तक कि ग़रीबों के अंतिम संस्कार लकड़ी, पंडित, चारजी व संस्कार सामग्री आदि का भी पूरा ख़र्च सरकार को ही उठाना चाहिए। दुनिया आज भारत में पसरे अभूतपूर्व कोरोना संकट को सरकार की लापरवाहियों व अदूरदर्शिता का परिणाम बता रही है। लिहाज़ा इस संकटकाल में यदि सरकार ग़रीबों को नौकरी, रोज़गार, मंहगाई से मुक्ति, कोरोना का समुचित इलाज यहां तक कि जीवन की सांसें नहीं दिला सकी तो कम से कम यह सरकार चिता की लकड़ी ही मुहैय्या करा दे ?







 

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