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जैविक खेती का रास्ता अपनाया...

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बस्ती। बस्ती जनपद के कप्तान गंज क्षेत्र के फेरसहन गांव निवासी आत्मा प्रसाद पाठक ने जैविक खेती का रास्ता अपनाया है। नाम मात्र की लागत से वह रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से होने वाली खेती की तुलना में अधिक पैदावार लेकर लोगों के बीच चर्चा में बने हुए हैं। प्राकृतिक जैविक उर्वरक के माध्यम से आज उनके खेतों में पैदा होने वाली अजवाइन, मेंथी, धनिया सरसों, चना, मटर, आलू, सौंफ को देखने के लिये लोग दूर-दूर से आते हैं। पाठक बताते हैं कि जैविक उर्वरक प्रयोग करने में एक बीघे में मुश्किल से पच्चीस रुपये की लागत आती है। 120 दिनी फसलों में चार से पांच बार जैविक खाद का प्रयोग करना होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। यह फास्फोरस नाइट्रोजन पोटाश जिक आदि पोषक तत्व की भरपाई करता है। जैविक खाद का निर्माण गोमूत्र, दूध, दही, घी,गोबर व नारियल का पानी मिलाकर किया जाता है। यदि खेतों में पोटाश की विशेष कमी नजर आती है तो बिल्व रसायन का प्रयोग करते हैं। यदि नाइट्रोजन की कमी देखती है तो अलग से गाजर की घास का स्वरस उपयोग करते हैं। इसी उर्वरक के बल पर हम लगभग एक क्विंटल प्रति बीघा मेथी एक से डेढ़ क्विंटल प्रति बीघा अजवाइन लगभग इतना ही धनिया जैसे मसाले की खेती करते हैं जो सौ से 120 दिन में 10 से 15000 प्रति क्विंटल का लाभ दे जाते हैं। गेहूं व धान की पैदावार सामान्य खेती से डेढ़ गुना प्राप्त करते हैं ।

 जैविक खाद जैविक खाद बनाने के लिए 10 किलोग्राम देसी गाय के गोबर को 500 ग्राम घी के साथ मिलाते हैं। पूर्णरूपेण मिल जाने पर एक टब में रखकर छाया में रख देते हैं । 10 लीटर गोमूत्र को छानकर धूप में रखते हैं फिर ढाई लीटर दूध में 50 ग्राम हरे नारियल का पानी डालकर छाये में रख देते हैं फिर इसी में ढाई लीटर दही उसमें ढाई सौ ग्राम मधु एक दर्जन खूब पका केला मिलाकर छाये में रखते हैं। 48 घंटे बाद उपरोक्त सभी चीजों को एक में अच्छी तरह से मिला देते हैं,फिर इन्हे 200 लीटर पानी में इन्हें मिला देते हैं। एक सप्ताह तक हर 24 घंटे में इस घोल को एक बार 2 मिनट चलाते रहते हैं। सप्ताह पूरा हो जाने पर 100 लीटर पानी में 10 लीटर घोल को मिलाकर किसी भी फसल में छिड़काव करते हैं। 

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