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दान सात्विक ही सर्वोत्तम - स्वामी मुक्तिनाथानंद

दान सात्विक ही सर्वोत्तम - स्वामी मुक्तिनाथानंद 
जीवो पर दया, भक्तों की सेवा व नाम संकीर्तन सर्वोपरि-स्वामी 
लखनऊ।राजधानी में सतसंग  के दौरान बुधवार के प्रातःकालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ  के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि भगवान श्री रामकृष्ण ने एक गृहस्थ भक्त से कहा कि 'तुम्हारे लिए चैतन्यदेव ने जो कहा था वह पालनीय है' अर्थात जीवों पर दया, भक्तों की सेवा और नाम संकीर्तन। उन्होंने कहा कि जीवों पर दया एक मानसिक संवेदना है जिसको क्रियान्वयन करने के लिए दूसरों की सहायता करनी चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि दान के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि दान तीन प्रकार का होता है- उनमें से सात्विक दान ही श्रेष्ठ है। सात्विक दान में दान करना उचित है, इस कारण से ही दान किया जाता है और उसके बदले में कुछ प्रत्याशा नहीं रहती है और वह दान सही जगह पर सही समय पर एवं सही पात्र में दान देना चाहिए। स्वामी ने बताया कि जब कुछ फल प्राप्ति की इच्छा से हम दान करते हैं अथवा बहुत कष्ट सहते हुए भी नाम कमाने के लिए दान करते हैं तो वह राजसिक दान होता है, वह हमारे बंधन का कारण होता है और जो दान हम अश्रद्धा सहकार, अवज्ञा के साथ,अशुभ समय पर जहां दान नहीं करना चाहिए वहां पर एवं अपात्र में दान करते हैं तो वह तामसिक दान होता है, और वह हमारे पतन का कारण होता है अर्थात जीवन में आनंद लाभ करने के लिए हमारे सामर्थ्य अनुसार, श्रद्धा के साथ, सही समय पर सही व्यक्ति को सही जगह पर बिना कोई प्रत्याशा हम अगर दान करें तब हमारा जीवन सात्विक हो जाएगा और आनंद मे भरपूर हो जाएगा। 

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