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सम्पादकीय: छवि की चिंता

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कोविड वैक्सीनेशन की लहर अब हालांकि कमजोर हो गई है लेकिन इसके कारण लोकतंत्र की कमजोरियां अवश्य उजागर हुई जिनमें से एक केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय और सामंजस्य की कमी शामिल हैं। एकजुट होकर लड़ने की बजाय केंद्र और राज्यों ने कोविड से लड़ाई को अपने तरीकों से लड़ा जरुर लेकिन अनेक बार यही सामने आया कि इस लड़ाई में दोनों के बीच अपनी छवि बचाने और विरोधी की गिराने की मंशा थी। यह कोविड वैक्सीनेशन नीतियों को लेकर भी सामने आया। हालांकि अब प्रधानमंत्री ने वैक्सीनेशन की समस्त जिम्मेदारी केंद्र द्वारा उठाने सम्बंधित घोषणा कर इस विवाद का पटाक्षेप कर दिया कि वैक्सीनेशन कौन करेगा, लेकिन प्रधानमंत्री के बयानों में भी राज्यों की इस बारे में निभाई गई भूमिका पर तल्खी झलकी। टीकाकरण नीति पर लग रहे आरोपों पर खामोश बैठे पीएम मोदी ने टीकाकरण की तमाम उलझनों और दिक्कतों के लिए परोक्ष रूप से राज्यों को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। पीएम ने बड़ा वक्त राज्यों की नाकामी गिनाने में खर्च किया। कई राज्य सरकारों ने पहले कहा कि वैक्सीन का काम डी-सेंट्रलाइज किया जाए और राज्यों पर छोड़ दिया जाए। तरह-तरह के स्वर उठे। जैसे कि वैक्सिनेशन के लिए एज ग्रुप क्यों बनाए गए? दूसरी तरफ किसी ने कहा कि उम्र की सीमा आखिर केंद्र सरकार ही क्यों तय करे? कुछ आवाजें तो ऐसी भी उठीं कि बुजुर्गों का वैक्सिनेशन पहले क्यों हो रहा है? भांति-भांति के दबाव भी बनाए गए, देश के मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंपेन के रूप में भी चलाया। पीएम मोदी ने ऐसे समय में राज्यों को घेरा, जब तमाम राज्य सरकारें मिलकर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश कर रही थीं। पीएम मोदी ने परोक्ष रूप से कहा कि राज्य सरकारों ने खुद दबाव बनाकर टीकाकरण कार्यक्रम अपने जिम्मे तो ले लिया, लेकिन वे इसे लागू करने में विफल रहीं।

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि चूंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए वे अधिक अधिकार की मांग कर रहे थे। जबकि केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगा कि सुप्रीम कोर्ट के कड़े तेवर ने उनको टीकाकरण नीति पर यू-टर्न लेने को मजबूर किया, मोदी ने इसे भी यह कहकर नकारा कि 1जून को नीति में बदलाव पर सहमति हो चुकी थी और इसका सुप्रीम कोर्ट की फटकार से कोई मतलब नहीं है। विपक्ष के ऐसे आरोपों के बाद अब पार्टी अगले कुछ दिनों में लोगों को बताएगी कि किस तरह मोदी सरकार ने हर कोशिश की और विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों के कारण कोविड की लड़ाई में अड़ंगा लगा। बीजेपी ने आंकड़ा जारी कर यह भी आरोप लगाया कि टीके की सबसे अधिक बर्बादी विपक्ष शासित राज्यों में ही दिखी। लेकिन बीजेपी और केंद्र सरकार को पता है कि सिर्फ राज्यों पर जिम्मेदारी थोपने से चीजें ठीक नहीं होंगी। वह भी तब, जब अधिकतर राज्यों में बीजेपी की ही सरकार है।

वहीं राज्य सरकारें कोविड प्रबंधन में मिली विफलता का बोझ अकेली उठाने को तैयार नहीं हैं। खासकर विपक्ष शासित राज्यों का तर्क यह है कि अगर सफलता का क्रेडिट मोदी सरकार को दिया गया, तो विफलता का श्रेय भी उन्हें ही मिले। दूसरी लहर जब चरम पर थी, तब राज्यों ने ऑक्सिजन और दवा की कमी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। वहीं जब टीकाकरण उनके जिम्मे आया, तब टीके की आपूर्ति में असमानता का आरोप लगाकर इसमें आ रही सुस्ती-गड़बड़ी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। राज्यों के केंद्र को जिम्मेदार ठहराने के दांव को कहीं न कहीं मोदी सरकार की छवि को प्रभावित करने में सफलता भी मिली। कोविड के बाद सी-वोटर के देश के मिजाज पर आधारित सर्वे में अधिकतर लोगों ने कोविड से लड़ने में विफलता के लिए राज्य सरकार से अधिक केंद्र सरकार को जिम्मेदार माना। मोदी सरकार के सात सालों में पहली बार सरकार से असंतुष्टों की तादाद संतुष्टों से अधिक हो गई।

शायद यही कारण है कि अमूमन एनडीए में नहीं रहने के बावजूद उससे अब तक मित्रवत रहने वाले राज्य, मसलन नवीन पटनायक की अगुवाई में ओडिशा और जगन रेड्डी के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश ने भी टीकाकरण में राज्यों की मांगों का साथ दिया। नवीन पटनायक ने तो इस मामले में पीएम मोदी को चिट्ठी लिखने के साथ सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी चिट्ठी लिखी। यह एक बड़ा संकेत माना गया कि सभी राज्य कोविड त्रासदी में किस तरह अपनी छवि बनाए रखने के लिए केंद्र के पाले में जिम्मेदारी की गेंद फेंक रहे हैं। हालांकि कोविड की पहली लहर के दौरान इतनी उलझन नहीं थी। महामारी एक्ट के अंतर्गत होम मिनिस्ट्री ने तब तमाम निर्देशों में एकरूपता रखने में सफलता पाई थी। हालांकि तब भी कभी-कभी राज्यों ने अपने स्तर पर केंद्र की गाइडलाइंस के विपरीत अपने आदेश निकाले थे, जिस पर केंद्र-राज्य के बीच अधिकार का मसला उठा था। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वैक्सीनेशन हो या पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि या अन्य कोई मसला। केंद्र और खासकर गैर भाजपाई शासित राज्यों में तालमेल नहीं है जो स्वस्थ्य लोकतंत्र की निशानी नहीं है। एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र केन्द्र और राज्यों के समन्वय के बीच ही आगे बढ़ सकता है, केन्द्र और राज्य को यह ध्यान रखना ही होगा।

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