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Today's Paper

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वक्त गुल्शन पे पड़ा तब खून हमने दिया, जब बहार आई तो कहते हैं --- तेरा काम नहीं !

वक्त गुल्शन पे पड़ा तब खून हमने दिया, जब बहार आई तो कहते हैं --- तेरा काम नहीं !
यह पंक्ति है संगीत की सभी विधाओं के गायक एवं बिरहा सम्राट मानिक चन्द्र मिश्र पर
चुनाव आते ही प्रदेश में बढ़ जाती थी ख्याति, पूर्वांचल के बड़े नेताओं के जनसम्पर्क एवं सभाओं में लगाते थे चार-चाँद
आज वृद्धावस्था के चलते कई रोगों से हैं पीडि़त, पाई-पाई मोहताज के चलते नहीं हो पा रहा उपचार, मदद की दरकार
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं क्षेत्रिय नेताओं से पत्र के माध्यम से बयां की अपनी पीड़ा पर नहीं हुई सुनवाई
जौनपुर। आज की भारतीय जनता पार्टी का पुराना नाम था, भारतीय जनसंघ। इमर्जेन्सी के बाद गैर कांग्रेसी दलों की देश स्तर पर नई पार्टी बनी। जनता पार्टी, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से नाराज कांग्रेसी, समाजवादी तमाम प्रान्तीय दल और जनसंघ के लोग भी जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में एकजुट हुए। परिस्थितियां बदली और 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस धराशायी हो गयी तथा जनता पार्टी के प्रथम और अंतिम प्रधानमंत्री बने मुरार जी भाई देसाई। विभिन्न विचार धारा वाले दलों की यह सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई। लगभग डेढ़ साल के बाद ही सरकार गिर गयी। जनता पार्टी की सरकार में जनसंघ के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सरकार में विदेश और सूचना मंत्री रहे। जनता सरकार के धराशाई होने के बाद जनसंघ के स्थान पर दक्षिण पंथी नेताओं का नया दल बना भारतीय जनता पार्टी। इस दल के प्रमुख नेता बने अटल, आडवाणी और जोशी। इन्हीं तीन नेताओं के कंधे पर भारतीय जनता पार्टी का दारोमदार आया। अकेले पार्टी का जनाधार पूर्ण बहुमत के रूप में आने के कारण बहुदलीय एकीकरण का नव प्रयोग फिर हुआ। जिसका नाम पड़ा राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) इसी के बैनर तले अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व में सरकार बनी। अटल, आडवाणी, जोशी आदि का महती भूमिका सरकार में रही। कई दलों की खींचतान के बावजूद अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में यह सरकार सफलता पूर्वक चली फिर इन्हीं में से कुछ लोग कांगे्रस से मिलकर डा0 मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री की सरकार में आए और दस वषों तक यह सरकार चली किन्तु अच्छी और साफ न्याय वाले मनमोहन सिंह की सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता रहा। प्रधानमंत्री तो डा0 मन मोहन सिंह रहे किन्तु नेपथ्य में सत्ता की बागडोर सोनिया गांधी के हाथ में रही।
 भाजपा के सूत्रधार अटल बिहारी वाजपेई की दीर्घकालीन बीमारी के फलस्वरूप जोशी और आडवाणी की दली स्थिति कमजोर होने लगी और इसी बीच राजग के अछूत समझे जाने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी के नेतृत्व में 2014 में लड़े गए लोकसभा चुनाव में पार्टी आजाद भारत के इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई। पुन: 2019 के आम चुनाव में राजग को 2014 से भी अच्छा बहुमत मिला।
 कश्मीर से धारा 370 हटाने और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अयोध्या से भगवान राम के मंदिर निर्माण के फैसले से पार्टी का जनाधार और कद भी देश में बढ़ा। मात्र देश में ही नहीं दुनिया में मोदी को एक वैश्विक नेता के रूप में देखा गया। देश में नरेन्द्र मोदी के बढ़ते जनाधार को देखते हुए घबराए अन्य सभी राजनैतिक दल एक होकर हर मुद्दे का विरोध पर उतर आए फिर भी आमजन में पार्टी और नेतृत्व की साख पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा किन्तु पार्टी के पुराने नेताओं की उपेक्षा से लोगों के चलते मन में एक अनुतरित प्रश्र अवश्य उठ रहा है कि देश के बड़े प्रदेश उत्तर-प्रदेश के पूर्वांचल तें तमाम बड़े नेता जैसे राजा यादवेन्द्र दत्त, राजनीति सिंह, ब्रह्मजीत सिंह, माधव प्रसाद त्रिपाठी, राजा सिंगरामऊ, हरीश चन्द्र, उमानाथ सिंह, राम सागर, जगन्नाथ राव, जंग बहादुर, सीताराम यादव आदि ऐसे नाम हैं जिन्हें विस्मित किया जाना उचित नहीं है। इस पीढ़ी के समर्पित नेताओं के साथ एक लोकगीत गायक का नाम लेना उचित होगा। जिन्होंने अपनी लोकगीतों से इन नेताओं और पार्टी के नेताओं के जन सम्पर्क व सभाओं में चार चाँद लगा दिया था। यह सज्जन है 85 वर्षीय मानिक चन्द्र मिश्र। (निवासी करमहीं, किरतापुर, जौनपुर) आप ऐसे लोग संगीत की सभी विधाओं के गायक थे किन्तु इन्हें बिरहा में महारत हासिल थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जब भी चुनाव आता था मानिक चन्द्र मिश्र की ख्याति के चलते इनकी हर जिले में मांग बढ़ जाती थी। कोई भी पार्टी की जनसभा हो, पहले सभा बनाने के लिए मानिक चन्द्र का ही बिरहा होता था। आज मानिक चन्द्र मिश्र वृद्धावस्था के चलते कई रोगों से पीडि़त हैं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय नेताओं के यहां उन्होंने रजिस्टर्ड पत्र के माध्यम से अपनी पीड़ा की जानकारी देकर निवेदन किया कि जिन्दगी के थोड़े दिन और बचे हैं इनकी मदद की जाए। सरकार अपनी हैं। जब विरोधी पार्टी की सरकार थी तब तो किसी प्रकार की सहायता का प्रश्र ही नहीं था। अब तो अपने ही लोग प्रदेश और देश की सत्ता पर विराजमान हैं। कहा भी गया है कि वक्त गुल्शन पे पड़ा, तब तो खून हमने दिया। जब बहार आई तो कहते हैं-तेरा काम नहीं।

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