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मंगल पांडे स्वतन्त्रता आन्दोलन के सशक्त और शाश्वत योद्धा थे: डाॅ सुनील तिवारी

मंगल पांडे स्वतन्त्रता आन्दोलन के सशक्त और शाश्वत योद्धा थे: डाॅ सुनील तिवारी
झांसी। स्थानीय लक्ष्मी बाई पार्क में शहीद स्तम्भ पर क्रांतिवीर सेवक संघ के तत्वावधान में स्वतन्त्रता की अमर गाथा के यज्ञ में, अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर क्रांतिवीर मंगल पाण्डेय की जयन्ती पं बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव डाॅ प्रमोद अग्रवाल के मुख्य आतिथ्य और डाॅ सुनील तिवारी की अध्यक्षता में मनायी गई।
डाॅ सुनील तिवारी ने अध्यक्षीय उद्बबोधन में कहा कि मंगल पाण्डेय स्वतन्त्रता आन्दोलन के एक सशक्त और शाश्वत योद्धा थे ।देश को स्वतंत्र कराने और अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले पहले क्रांतिकारी मंगल पांडे का आज जन्मदिन है। मंगल पांडे ने ही अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ देशवासियों का जोश जगा दिया था। क्रांतिकारी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे तथा माता का नाम अभय रानी था। वे कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे। 
मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुये डाॅ प्रमोद कुमार अग्रवाल ने कहा कि भारत की आजादी की पहली लड़ाई 1857 के संग्राम की शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई थी। 'मेरठ क्रांति’ जिसे भारत की 1857 कि विद्रोह क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। भारतीयों का यही प्रथम आंदोलन था जिसने अंग्रेजों को पहली बार हिला दिया था। स्वतंत्रता सेनानियों ने सही मायने में देश की आजादी की जमीन यहीं से तैयार कर दी थी। बाद में मेरठ से शुरू हुई आजादी की चिंगारी अंग्रेजों को देश से भगाने में शुरुआत हो गई थी। मेरठ से आजादी के पहले आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जो बाद में पूरे देश में फैल गया। सैनिकों के विद्रोह से एक छोटी चिंगारी निकली और ज्वाला बन गई थी। यहां हम आपको बता दें कि अंग्रेज अफसर कर्नल माइकल स्मिथ ने चर्बी लगे कारतूस भारतीय सैनिकों को देने के आदेश दिए। इन कारतूसों को मुंह से खोलना पड़ता था। तीसरी रेजीमेंट लाइन गैलरी के 90 में से 85 सैनिकों ने इस कारतूस के खिलाफ बगावत कर दी। मंगल पांडे ने 29 मार्च, 1857 को बंगाल की बैरकपुर छावनी में ब्रिटिश के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। मंगल पांडे ने इस क्रांति नायक थे। दरअसल जो बंदूक सिपाही इस्तेमाल करते थे, उसमें कारतूस भरने के लिए दांतों का इस्तेमाल करना पड़ता था ।‌ पहले कारतूस को काटकर खोलना पड़ता था और उसके बाद उसमे भरे हुए बारूद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने गाय और सुअर की चर्बी का कारतूस दिया था, सैनिकों ने चलाने से मना कर दिया, क्योंकि इन सैनिकों में हिंदू और मुस्लिम दोनों समाज के लोग थे। ऐसे में सिपाहियों को लगा की अंग्रेज उनका धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं । अंग्रेजों ने ये जानबूझकर किया था, जिसके बाद इन सैनिकों ने विद्रोह कर दिया तो उनका कोर्ट मार्शल हुआ और उन्हें विक्टोरिया के पास एक जेल थी, जहां रखा गया था और जब धीरे-धीरे आंदोलन पूरे देश मे शुरू हो गया और यही वजह है कि आज भी इतिहास में वो तारीख दर्ज है। यही विरोध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बुनियाद बना था। बैरकपुर छावनी से शुरू हुआ विद्रोह पूरे देश में फैल गया, जिसके बाद देशभर में लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया। छावनी के परेड ग्राउंड में मंगल पांडे ने लेफ्टिनेंट बाग और सार्जेंट मेजर ह्यूसन की हत्या कर दी थी। इसके बाद में मंगल पांडे ने खुद को गोली मार ली, लेकिन वे सिर्फ घायल ही हुए थेे। बाद में 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी दे दी थी ।
इस अवसर वी एन तिवारी, डाॅ रविकांत शुक्ला,अजीत राय, डाॅ अनिल शर्मा, अजय सक्सेना, पं रवि तिवारी, अशोक तिवारी गुरू, जय प्रकाश विरथरे, अशोक भल्ला, मीनाक्षी जैन, आनन्द विरथरे, सुषमा यादव, भूषण शर्मा, पं राजेश दुबे, अनूप बुधरानी,अतुल दाॅगें, अजय सिसौदिया, बल्देव आहूजा,लखन महाराज, आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन और आभार पं दिनेश मिश्रा ने किया।

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