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मन के विकारों को हरती है सत्संग- मुक्तिनाथानन्द 

 ईश्वर प्रेम के सागर व अपने हैं-मुक्तिनाथानन्द



’साधुसंग का महत्वपूर्ण प्रयोजनीयता’ -स्वामी 
लखनऊ।राजधानी में सोमवार सत्संग के दौरान  प्रातःकालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने बताया कि जीवन में सही मार्ग पर चलने के लिए सत्संग आवश्यक है। स्वामी ने कहा कि श्री रामकृष्ण ने बताया कि उनके गुरु तोतापुरी कहा करते थे, लोटा रोज रगड़ना चाहिए नहीं तो मैल पड़ जाएगा। वैसे ही सब समय विषय कर्म में लिप्त रहने से मन में विषय की छाप पड़ जाती है। इसलिए श्री रामकृष्ण कहते हैं साधुसंग सदैव ही आवश्यक है साधुसंग से मन में जो विषय की छाप पड़ती है वह मिट जाती है, मन साफ हो जाता है, हमारी दृष्टि साफ हो जाती है और हम अपनी सही दिशा देख पाते हैं। स्वामी जी ने बताया कि श्री रामकृष्ण ने कहा है कि कामिनी- कंचन का त्याग सन्यासी के लिए है, गृहस्थो के लिए नहीं गृहस्थगण का बीच-बीच में  निर्जनवास होना चाहिए। जब हम एकांतवास करते हैं तब हमारे मन में कौन वस्तु स्थायी है और कौन बदलने वाली, वह हम स्थिर कर पाते हैं। तब वह अस्थायी वस्तुओं के प्रति हमारी आसक्ति घट जाती है और स्थाई वस्तु, नित्य वस्तु, अपरिवर्तनशील भगवान के लिए हमारा मन व्याकुल हो जाता है। श्री रामकृष्ण ने भक्त गणों को कहा कि तुम लोग मन में त्याग करना अर्थात जो परिवर्तनशील जगत है, जो बदलने वाला हमारा रिश्ता है उससे आसक्ति त्याग करना चाहिए। जब हम भगवान के प्रति व्याकुल होकर प्रार्थना करेंगे तब भगवान की कृपा से हमारे मन में आनंद और तृप्ति भरपूर हो जाएगी। 

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